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मुजफ्फरनगर: मर्डर ही नहीं, गैंगरेप-दंगों के मामलों में भी बच गए आरोपी, साबित नहीं हो पाए मुस्लिमों पर हमलों के केस

एक केस की पीड़ित ने बताया कि उसकी मेडिकल जांच वारदात के 3 महीने बाद हुई। डॉक्टर ने अदालत को बताया, 'हमें मेडिकल जांच के दौरान शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं मिले। यह पाया गया कि पीड़िता 17 हफ्तों की गर्भवती है।'

Author मुजफ्फरनगर | July 20, 2019 9:12 AM
शामली में दंगा पीड़ितों के घर, जहां तोड़फोड़ की गई। (Express photo: Gajendra Yadav)

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से जुड़े 41 में से 40 मामलों में सभी आरोपी बरी हो गए। आम गवााह ही नहीं, यहां तक कि पुलिसवाले भी बयान से मुकर गए। पीड़ित परिवार धमकाने का आरोप लगाते रहे। गैंगरेप के मामलों में मेडिकल जांच में देरी हुई। एक मामले में तो तीन महीने की देरी से जांच हुई। डॉक्टरों और पुलिसवालों का क्रॉस एग्जामिनेशन तक नहीं हुआ। दंगों से जुड़े मामलों में अनियमितताओं की फेहरिस्त काफी लंबी है।

द इंडियन एक्सप्रेस की ओर से कोर्ट के रिकॉर्ड्स की जांच में शुक्रवार को यह बात सामने आई थी कि मर्डर के 10 मामलों में अभिजोयन प्रक्रिया की खामियों की वजह से आरोपी बरी हो गए। इसी तरह कथित गैंगरेप के 4 मामलों और दंगों से जुड़े 26 केसों का भी यही हालत हुआ है, जिसकी वजह से 168 आरोपी बरी हो गए। ये सभी मामले मुस्लिमों पर हमलों से जुड़े हुए हैं। बता दें कि यूपी सरकार भी आरोपियों के कोर्ट से बरी होने के खिलाफ अपील नहीं करने का फैसला किया है।

2013 के दंगों में कम से कम 65 लोगों की मौत हुई थी। यह सभी केस अखिलेश यादव की सरकार के दौरान दर्ज हुए और इनकी जांच भी शुरू हुई। वहीं, मामले का ट्रायल सपा की सरकार से लेकर हालिया बीजेपी सरकार के दौरान जारी रहा। आइए सबसे पहले यह जानते हैं कि गैंगरेप के मामलों में कोर्ट ने आरोपियों को क्यों बरी किया।

शामली जिले की वो मस्जिद जहां से 65 साल के इस्लाम का पीछा किया गया और हत्या कर दी। यह घटना 8 सितंबर, 2013 की है। (Express Photo: Gajendra Yadav)

एक केस की पीड़ित ने बताया कि उसकी मेडिकल जांच वारदात के 3 महीने बाद हुई। डॉक्टर ने अदालत को बताया, ‘हमें मेडिकल जांच के दौरान शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं मिले। यह पाया गया कि पीड़िता 17 हफ्तों की गर्भवती है।’ बता दें कि मेडिकल जांच में देरी का कोई उल्लेख नहीं है। न ही डॉक्टर और न ही जांच अधिकारी से देरी को लेकर सवाल-जवाब हुए।

एक दूसरे मामले में पीड़िता की ओर से शिकायत दर्ज कराए जाने के एक हफ्ते बाद मेडिकल जांच कराई गई। हालांकि, आरोपी को बरी करने के आदेश में डॉक्टर के फाइनल ओपिनियन का कोई जिक्र नहीं है। आदेश में सिर्फ यह कहा गया है कि डॉक्टर ने कोर्ट के समक्ष मेडिकल जांच की प्रमाणिकता की पुष्टि की। डॉक्टर के निष्कर्षों का कोई जिक्र नहीं है।

गैंगरेप के तीसरे मामले में ‘मेडिकल एग्जामिनेशन रिपोर्ट’ का नाममात्र का जिक्र है। कोर्ट के आदेश में मेडिकल रिपोर्ट के निष्कर्षों पर कुछ नहीं कहा गया है। कोर्ट के दस्तावेज से पता चलता है कि डॉक्टर को गवाह के तौर पर शामिल ही नहीं किया गया। कानूनी एक्सपर्ट्स इसे वैध प्रक्रिया का उल्लंघन मानते हैं।

चौथे मामले में कोर्ट के फैसले में बताया गया है कि पीड़िता की मेडिकल जांच शिकायत दर्ज कराए जाने के 40 दिन बाद हुई। डॉक्टर ने कहा कि पीड़िता ‘पांच बच्चों की मां है और उसकी मेडिकल जांच सही नहीं है। यहां तक कि रेप के भी कोई संकेत नहीं मिलते।’ डॉक्टर से देरी या उसके निष्कर्षों को लेकर कोई सवाल-जवाब नहीं हुए।

सिर्फ हत्या और बलात्कार ही नहीं, दंगे के मामले बताते हैं कि 26 दंगों के मामलों में भी उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। (Express photo: Gajendra Yadav)

कथित गैंगरेप के दो मामलों में पीड़ितों ने कोर्ट को बताया कि उन्हें पुलिस ने आरोपियों का नाम लेने के लिए ‘सिखाया’ था। हालांकि, पुलिस से इसे लेकर सवाल-जवाब नहीं हुए। चार मामलों से जुड़े कुछ 7 गवाहों ने कोर्ट में यूटर्न लेते हुए पुलिस के सामने दिए अपने बयानों से पलट गए। ये गवाह अधिकतर पीड़ितों के रिश्तेदार थे। उनका कहना था कि वे भीड़ से बचने के लिए भाग गए और उन्होंने कुछ नहीं देखा।

दो मामलों में पीड़ितों के रिश्तेदार गवाहों ने बताया कि दंगों के बाद राहत शिविरों में उनसे पुलिस ने नहीं बल्कि ‘किसी और ने’ बयान लिए। दो पीड़ितों ने कहा कि उन्हें आरोपियों का नाम लेने के लिए पुलिस ने सिखाया था ताकि मुआवजा मिल सके। दो अन्य ने माना कि किसी अंजान अधिकारी ने उन्हें राहत कैंपों में कोरे कागज पर दस्तखत कराए थे। सभी चार गैंगरेप केसों में कोर्ट ने माना कि सीआरपीसी के सेक्शन 164 के तहत लिए गए चार पीड़ितों के बयान ‘ठोस सबूत’ नहीं हैं।

2013 के दंगों के दौरान कम से कम 65 लोगों की हत्याएं कर दी गईं। (Express photo: Ravi Kanojia)

हत्या और गैंगरेप के मामले ही नहीं, दंगों के 26 मामलों में भी यह सामने आया है कि सही प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। उदाहरण के तौर पर दो ऐसे केस थे, जिसमें हिंसा के दौरान मौके पर मौजूद पुलिस अफसरों की ओर से मामले दर्ज किए गए थे। बाद में ट्रायल के दौरान इन्हीं अफसरों ने कहा कि वे आरोपियों की पहचान नहीं कर सकते। दंगों के 10 मामलों में एक भी पुलिस अधिकारी को क्रॉस एग्जामिन नहीं किया गया। वहीं, 13 गवाहों ने माना कि ‘कुछ अधिकारियों’ ने कोरे कागज पर उनके अंगूठे के निशान लिए थे। वहीं, 52 गवाह यह कहते हुए अपने बयान से मुकर गए कि वह दंगों से पहले ही मौके से भाग गए थे।

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