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इटावा: मृत परिजनों को दफनाने के लिए नहीं है कब्रिस्तान, घर में ही बन रही है कब्र

सुशीला बेगम अपने घर मे बनी कब्रों के बारे में बताते हुए वे फूट-फूट कर रोते हुए बताती हैं कि वैसे तो कोई अपना मर जाता है तो इंसान कुछ दिन रोता है, फिर उसकी यादें धुंधली होती जाती हैं लेकिन इन कब्रों के हमेशा सामने होने के कारण हमेशा अपनों के मरने की ही घटना दिखती है।
Author इटावा | August 9, 2017 08:05 am
बेगू के कब्रिस्तान की तस्वीर। (एक्सप्रेस फोटो)

विधानसभा चुनाव के दरम्यान उत्तर प्रदेश मे कब्रिस्तान और शमशान का मुददा बड़े जोर शोर से उछाला गया था लेकिन इस पर अब पूरी तरह से चर्चा बंद हो चुकी है । उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में चंबल नदी के किनारे बसे चकरगनर मे एक ऐसी मुस्लिम बस्ती है जहां के लोग अपने मृत परिजनों को अपने घरों में ही दफनाने मे लगे हैं। चकरनगर के बारे मे कहा जाता है कि महाभारत काल के दौरान पांडवों ने अज्ञातवास यहीं बिताया था  जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित चकरनगर इलाके में एक बस्ती है तकिया। यहां रहने वाली सुशीला बेगम काफी दुखी होकर कहती हैं कि हमें न धन चाहिए , न दौलत, न ही कुछ और। हमें तो सिर्फ दो गज़ जमीन चाहिए लेकिन हम इतने दुर्भाग्यशाली हैं कि हमें वो भी मयस्सर नहीं । यह तकलीफ सिर्फ सुशीला बेगम की नहीं है । बस्ती में रहने वाले करीब 70-80 मुस्लिम परिवारों को भी यही परेशानी है। वे अपने छोटे से घरों या यों कहें कि घरनुमा कमरों में ही अपने पुरखों की कब्र बनाने के लिए मजबूर हैं।

सुशीला बेगम अपने घर मे बनी कब्रों के बारे में बताते हुए वे फूट-फूट कर रोते हुए बताती हैं कि वैसे तो कोई अपना मर जाता है तो इंसान कुछ दिन रोता है, फिर उसकी यादें धुंधली होती जाती हैं लेकिन इन कब्रों के हमेशा सामने होने के कारण हमेशा अपनों के मरने की ही घटना दिखती है। हम जब भी कब्रों को देखते हैं, बातें ताजा हो जाती हैं। यही नहीं, इस बस्ती में कई ऐसे भी घर हैं, जहां कमरे में एक ओर कब्र है तो दूसरी ओर सोने का बिस्तर लगा है। यानी शयन कक्ष और कब्रिस्तान एक साथ हैं ।इसी बस्ती के ही यासीन अली बताते हैं कि हम सभी मजदूरी करते हैं। किसी के पास ज़मीन है ही नहीं । सालों पहले ग्राम समाज से घर के लिए जो जमीन मिली थीं, परिवार बढ़ने के साथ वो कम पड़ने लगीं । पहले हम खाली जमीन पर शव दफनाते थे, लेकिन बाद में जगह नहीं मिलने के कारण घरों में ही दफनाना पड़ रहा है । ऐसा नहीं है कि इस बात की किसी को जानकारी न हो। ये समस्या नई नहीं बल्कि सालों पुरानी है। ये बस्ती फकीर मुसलमानों की है। बस्ती के लोगों का कहना है कि इसके लिए हमने हर जगह दरख्वास्त दी, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।

इटावा के प्रशासनिक अधिकारी भी तकिया में कब्रिस्तान न होने की बात से वाकिफ हैं लेकिन वे भी यही समस्या बता रहे हैं जो कि ग्राम प्रधान राजेश यादव ने बताई। इटावा की जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी जे कहती हैं कि आस-पास खाली जमीन है ही नहीं। किसी की निजी जमीन दी नहीं जा सकती है। कुछ दूर पर जमीन मुहैया कराई गई थी लेकिन वहां ये लोग कब्रिस्तान बनाने को राजी नहीं है। सेल्वा कहती हैं कि डेढ़ किलोमीटर दूर चांदई गांव में कब्रिस्तान के लिए उपलब्ध जमीन पर शव दफनाने के लिए लोगों को मनाने की कोशिश हो रही है। तकिया बस्ती की कुछ महिलाएं बताती हैं कि बच्चे अक्सर रात में जग जाते हैं क्योंकि कई घरों में कब्रें बिस्तर के बिल्कुल पास में ही बनी हुई हैं। बहरहाल, प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि तकिया बस्ती के लोगों के लिए आस-पास ही किसी कब्रिस्तान के इंतजाम में लगे हैं लेकिन अभी तो इनकी यही मांग है कि मरने के बाद अपनी मातृभूमि में दफन होने के लिए इन्हें कम से कम दो गज जमीन तो मिल जाए ।

 

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