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नोएडा: सिगरेट फिल्टर से सामान बना खड़ी कर दी कंपनी, एक साल में कमाए 40 लाख रुपए

पिछले वित्तीय वर्ष में फिल्टर से युवाओं की कंपनी कोड एंटर प्राइसेज एलएलपी ने 40 लाख रुपए का टर्न ओवर हासिल किया। आने वाले दिनों में फिल्टर को एअर प्यूरीफायर, चिमनी आदि में इस्तेमाल करने की योजना है।

Author May 9, 2018 10:46 am
दो साल के भीतर इनके पुनर्चक्रण के जरिए उपयोगी वस्तु बनाने की युवा सोच एक बड़े कारोबार में तब्दील हो गई है।

सिगरेट पीने के बाद उसके पीछे लगे फिल्टर (बट्) से नोएडा में तकिए, सोफे के कुशन और चाबी के लुभावने छल्ले (कीरिंग) तैयार हो रहे हैं। अपनी तरह के इस अनूठे प्रयोग को फरवरी 2016 में नोएडा के दो युवाओं ने शुरू किया था। दो साल के भीतर इनके पुनर्चक्रण के जरिए उपयोगी वस्तु बनाने की युवा सोच एक बड़े कारोबार में तब्दील हो गई है। पिछले वित्तीय वर्ष में फिल्टर से युवाओं की कंपनी कोड एंटर प्राइसेज एलएलपी ने 40 लाख रुपए का टर्न ओवर हासिल किया। आने वाले दिनों में फिल्टर को एअर प्यूरीफायर, चिमनी आदि में इस्तेमाल करने की योजना है। सिगरेट के खत्म होने के बाद सड़कों पर फेंके जाने वाले फिल्टर को चुनने से लेकर नोएडा के सेक्टर-132 की कंपनी में पहुंचाने और उसे उपयोगी सामान में तब्दील कर बेचने के काम में करीब पांच हजार लोग जुडेÞ हैं। 12 राज्यों में सिगरेट के फिल्टर एकत्रित करने के लिए बड़ी पान- सिगरेट की दुकानों पर वी-बिन (सिगरेट की राख और फिल्टर फेंकने वाले डब्बे) रखवाए गए हैं। करीब 250-400 रुपए प्रति किलो के हिसाब से फिल्टर खरीदने और तैयार उत्पादों की बिक्री का चक्र भी इन युवाओं ने तैयार किया है।

नोएडा के 24 साल के नमन गुप्ता ने 2016 में डीयू से बी.कॉम किया। उनके दोस्त 28 साल के विशाल कानत ने उसी साल शारदा विश्वविद्यालय से आइटी में इंजीनियरिंग कोर्स पूरा किया था। नमन ने बताया कि उनके काफी दोस्त सिगरेट पीते थे। कमरे में रखने वाली ऐश ट्रे (सिगरेट की राख और फिल्टर रखने वाली ट्रे) बहुत जल्दी भर जाती थी, जिसे कूड़ेदान में खाली करना पड़ता था। एक दिन कूड़ेदान में इस्तेमाल हो चुकी सिगरेट का फिल्टर फेंकते हुए अनायास उन्हें इनके इस्तेमाल का ख्याल आया। अपने दोस्त विशाल से ख्याल साझा करने पर बात बन गई। दोनों ने कोड एंटर प्राइसेज एलएलपी नाम से एक कंपनी बनाई और काम शुरू कर दिया। शुरुआत में सिगरेट के फिल्टर एकत्रित करने में बहुत परेशानी आई। सिगरेट और पान बेचने वाली बड़ी दुकानों पर टीन के डब्बे रखवाकर लोगों को फिल्टर और राख उसमें फेंकने की जानकारी दी गई। इससे भी बात नहीं बनी तो बड़े शहरों में सिगरेट के फिल्टर एकत्रित करने वालों भुगतान के जरिए जोड़ा गया। कूड़ा बीनने वाले और कबाड़ियों के यहां संपर्क करने पर बात बन गई। बगैर साफ करे सिगरेट के फिल्टर को 250 रुपए प्रति किलो, जबकि तंबाकू और कागज को साफ करने के बाद फिल्टर को 400 रुपए किलो के दाम पर खरीद रहे हैं। छोटी-छोटी जगहों से फिल्टर एकत्रित करने और सफाई करने के लिए बड़े शहरों में एक आदमी को अधिकृत कर रखा है। वहीं, सब लोगों से फिल्टर खरीदकर नोएडा पहुंचा रहे हैं। होटल, क्लब, मॉल आदि के धूम्रपान क्षेत्र में भी उन्होंने वी-बिन रखवाए हैं।

फिल्टर को पहले रसायन से साफ करना पड़ता है। उसके बाद बदबू रहित करने के लिए मशीन से धुलाई करनी पड़ती है। धुले हुए फिल्टर को सुखाने के बाद इसका इस्तेमाल रुई की तरह तकिए, सोफे के कुशन या आकर्षक चाबी के छल्लों के रूप में किया जा रहा है। तैयार होने वाले सामान की अधिकांश मांग ऑनलाइन है। फेसबुक और ट्विटर पर इन उत्पादों का प्रचार किया जा रहा है। इसके अलावा बड़े शहरों से सिगरेट के फिल्टर पहुंचाने वालों से भी उत्पादों की बिक्री का अनुबंध किया है। ब्रांडेड उत्पादों की तरह इन उत्पादों पर अधिकतम बिक्री मूल्य नहीं लिखा गया है। न्यूनतम लागत पर उत्पादों को बेचने से मांग लगातार बनी हुई है। फिल्टर से 2018 में कंबल और रजाई भी बनाने की योजना है। जम्मू, मुंबई, बैंग्लूरू, चैन्नई, पटना, दिल्ली, नोएडा, आदि बड़े शहरों से लगातार सिगरेट फिल्टर यहां पहुंच रहे हैं।

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