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जन सुनवाई पोर्टल पर पूछे गए सवाल के जवाब में प्राधिकरण ने दिया तर्क, जहां आमदनी नहीं, वहां शौचालय नहीं

दिल्ली से सटे नोएडा को औद्योगिक महानगर के रूप में विकसित करने की सरकारी पहल अब पूरी तरह से निजी कंपनी के सुपुर्द कर दी गई है।

Author नोएडा, 14 अक्तूबर। | October 15, 2018 5:00 AM
जिन गांवों की जमीन पर शहर को बसाया गया है, वे अब भी स्वच्छ भारत अभियान के तहत मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं।

दिल्ली से सटे नोएडा को औद्योगिक महानगर के रूप में विकसित करने की सरकारी पहल अब पूरी तरह से निजी कंपनी के सुपुर्द कर दी गई है। नोएडा प्राधिकरण अब स्वच्छता जैसे बुनियादी मुद्दे को कमाई बनाम दान के तराजू पर तोल रहा है। इसी वजह से शहर की चुनिंदा जगहों पर चमचमाते शौचालय बनाए गए हैं, जिनसे निजी कंपनी हर महीने लाखों रुपए की कमाई कर रही है। वहीं, प्राधिकरण ने गांवों में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण नहीं किया है। यहां शौचालय नहीं बनाने की वजह विज्ञापन से होने वाली आमदनी न होना बताया गया है। जन सुनवाई पोर्टल में पूछे गए सवाल के जवाब में प्राधिकरण ने यह तर्क दिया है।

जन सुनवाई पोर्टल में समाजसेवी रंजन तोमर की ओर से पूछे गए सवाल के जवाब में प्राधिकरण अधिकारियों ने बताया कि शहर में शौचालय बीओटी (बिल्ट ऑपरेट ट्रांसफर) आधार पर बनाए गए हैं। इन शौचालयों का निर्माण और संचालन एक निजी कंपनी कर रही है। शौचालयों पर लगने वाले विज्ञापनों से आय होती है। विज्ञापन की निर्धारित दर के आधार पर कंपनी को प्राधिकरण में शुल्क जमा करना होता है। ये संभावनाएं ग्रामीण परिवेश में न के बराबर हैं। लिहाजा वहां शौचालय बनाया जाना संभव नहीं है। दीगर है कि जिन गांवों की जमीन पर शहर को बसाया गया है, वे अब भी स्वच्छ भारत अभियान के तहत मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं।

जबकि स्वच्छ भारत अभियान के तहत खुले में शौच मुक्त किए जाने के उद्देश्य से प्राधिकरण सार्वजनिक, सामुदायिक या व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण करा रहा है। कुल 62 सार्वजनिक व 17 सुलभ शौचालय शहर के विभिन्न सेक्टरों में संचालित हैं। 27 व्यक्तिगत शौचालयों के निर्माण के लिए प्रत्येक के बैंक खाते में अनुदान के रूप में 15 हजार रुपए हस्तांतरित किए गए हैं। साथ ही 45 सामुदायिक शौचालय बनाए गए हैं। शहर को खुले में शौच मुक्त किए जाने के लिए 500 मीटर के दायरे में शौचालय की सुविधा देने का दावा किया गया है, लेकिन गांवों में यह सुविधा नहीं दी जा रही है। जन सुनवाई पोर्टल पर पूछे गए सवाल के जवाब से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।

जिन 81 गांवों को मिलाकर नोएडा को बनाया गया है, वहां सार्वजनिक शौचालय बनाने पर प्राधिकरण अधिकारियों ने कहा कि गांवों में सामुदायिक या व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण जन स्वास्थ्य विभाग करता है। लिहाजा गांवों में शौचालय बनाने के लिए जन स्वास्थ्य विभाग से संपर्क करें। जानकारों का मानना है कि स्वच्छता की मुहिम के तहत चमचमाते शौचालय बनाना महज दिखावा साबित हुआ है। ठेका मिलने से पहले निजी कंपनी ने विज्ञापन के लिहाज से चुनिंदा जगह तय कर ली थी। विज्ञापन के लिए प्राधिकरण के निर्धारित शुल्क से करीब 70 फीसद कम दर पर इसे मंजूरी दी गई। इस पूरे खेल में सत्ताधारी दल और प्राधिकरण का एक-एक अधिकारी का अहम किरदार निभा रहा है।

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