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फिर गरमाया यूपी के बंटवारे का मुद्दा, मेरठ में हुआ सम्मेलन

वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड के गठन के बाद यह मांग ठंडी पड़ गई थी। सम्मेलन में भावी आंदोलन की रूपरेखा का भी सूत्रपात हुआ। तय हुआ कि 7 जुलाई को दस हजार लोग मेरठ मंडल मुख्यालय के बाहर सामूहिक उपवास करेंगे।

Author नई दिल्ली | June 14, 2017 5:10 AM
यूपी के सीएम योगी आदित्य नाथ। (REUTERS/Jitendra Prakash

देश के सबसे बड़े सूबे के बंटवारे की मांग फिर सिर उठा रही है। पिछले हफ्ते शोषित मुक्ति वाहिनी जैसे गुमनाम संगठन की तरफ से मेरठ में हुए सम्मेलन से इसका संकेत मिला। हालांकि यह मांग नई नहीं है। तो भी वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड के गठन के बाद यह मांग ठंडी पड़ गई थी। सम्मेलन में भावी आंदोलन की रूपरेखा का भी सूत्रपात हुआ। तय हुआ कि 7 जुलाई को दस हजार लोग मेरठ मंडल मुख्यालय के बाहर सामूहिक उपवास करेंगे। इसके लिए विभाजन समर्थकों से संकल्प पत्र भरवाए जाएंगे। यों सम्मेलन पूरी तरह गैर राजनीतिक था। तो भी इसमें भाजपा को छोड़ कई दलों के नेताओं ने शिरकत की। जनता दल (एकी) के महासचिव केसी त्यागी मुख्य वक्ता थे। अध्यक्षता राष्ट्रीय लोकदल के नेता और उत्तरप्रदेश सरकार के पूर्व सिंचाई मंत्री डॉक्टर मेराजुदीन अहमद ने की। सभी वक्ताओं ने एक सुर में सूबे के पिछड़ेपन के लिए इसके विशाल आकार को जिम्मेदार माना। केसी त्यागी ने उत्तराखण्ड और गोरखालैंड जैसा जन आंदोलन किए जाने की जरूरत बताई। सम्मेलन को आयोजकों ने उत्तर प्रदेश विभाजन व पुनर्गठन सम्मेलन नाम दिया था।
इसमें दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश का देश के दूसरे राज्यों की तरह विकास नहीं हो पाने का एक बड़ा कारण इसका विशाल आकार और प्रशासनिक विफलता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को लगता है कि उनके साथ राज्य सरकार सौतेला सलूक करती है। सूबे का हाई कोर्ट इलाहाबाद में है। तो राजधानी लखनऊ में। दोनों ही जगह सूबे के मध्य में न होने से दूरदराज के लोगों को अड़चन होती है। सरकारी अमला और राजनीतिक नेतृत्व लखनऊ में रहता है। इसी वजह से अपराध भी बढ़ रहे हैं और लोगों की शिकायतों को शासन गंभीरता से नहीं लेता।1950 में बना उत्तर प्रदेशमौजूदा उत्तर प्रदेश आजादी के बाद 1950 में अस्तित्व में आया। अंग्रेजी राज में 1937 में इसका गठन हुआ था।

तब नाम था संयुक्त प्रांत। विभाजन की मांग आजादी के बाद से ही उठती रही। अस्सी के दशक में बड़े आंदोलन भी हुए। पर बंटवारे की मांग को पंजाब और कश्मीर के अलगाववादी आंदोलनों के कारण दबा दिया गया। बाद में अजित सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग हरित प्रदेश बनाने का मुद्दा उछाला, लेकिन चुनाव के दौरान ही वे यह मांग उठाते रहे। इसके लिए व्यापक जन आंदोलन का सिर दर्द उन्होंने कभी मोल नहीं लिया। उन्हीं की पार्टी के सांसद रहे हरपाल पंवार ने बाद में इंद्रप्रस्थ राज्य का नारा दिया। यह मांग हालांकि ज्यादा व्यावहारिक लगती है। वे चाहते थे कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शामिल यूपी के इलाकों को दिल्ली के साथ मिलाकर अलग इंद्रप्रस्थ राज्य बना दिया जाए। 2012 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तब की मुख्यमंत्री मायावती ने यूपी को चार राज्यों में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराकर सभी को चौंका दिया था, लेकिन उनके इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने कतई तवज्जो नहीं दी। यूपी में इस समय 75 जिले हैं। लोकसभा की यहां 80 सीटें हैं। इस नाते आजादी के बाद से ज्यादा प्रधानमंत्री इसी सूबे ने दिए, लेकिन पूरे राज्य का अपेक्षित संतुलित विकास नहीं हो पाया। पश्चिमी क्षेत्र के लोगों को लगता है कि पंजाब से अलग होने के बाद हरियाणा ने जिस गति से विकास किया है, वह एक उदाहरण है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भी अगर अलग राज्य बनाकर मेरठ या आगरा को राजधानी बना दिया जाता तो यहां भी विकास की गति बेहतर होती। उनकी निराशा की वजहों में पांच दशक पुरानी इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ की इस इलाके में स्थापना की मांग को गंभीरता से नहीं लिया जाना भी है।

हल्के फुल्के आंदोलन से काम नहीं चलेगा। लोगों को इसके लिए बलिदान भी देना पड़ेगा।

-केसी त्यागी,
जनता दल (एकी) के महासचिव

जब तक 22 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े नहीं होंगे, यह विकास नहीं कर सकता।
-डॉ मेराजुदीन अहमद
नेता, राष्ट्रीय लोकदल

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