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मायावती का इस्तीफा मंजूर: 2004 में लोकसभा छोड़ राज्यसभा पहुंची थीं, अब बिन बैसाखी इंट्री असंभव

उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती राज्य के करीब 22 फीसदी दलित मतदाताओं की अकेली सिरमौर हैं।
बसपा अध्यक्ष मायावती और पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा। (फोटो-PTI)

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती का इस्तीफा राज्यसभा के सभापति ने मंजूर कर लिया है। इससे पहले उन्होंने सभापति हामिद अंसारी से मुलाकात की और इस्तीफा मंजूर करने की गुजारिश की। हालांकि, इसके लिए मायावती को दोबारा एक लाइन का इस्तीफा तय प्रारूप में देना पड़ा। मंगलवार (18 जुलाई) को उन्होंने तीन पन्ने का इस्तीफा सौंपा था, जिसे सभापति ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इस्तीफा तय प्रारूप में नहीं है। हालांकि, राज्यसभा के उप सभापति पी जे कुरियन ने उनसे इस्तीफा वापस लेने का आग्रह भी किया था लेकिन मायावती नहीं मानीं। बता दें कि सहारनपुर हिंसा पर मंगलवार को सदन में बोलने नहीं देने पर आक्रोशित मायावती ने सदन में ही इस्तीफे का एलान कर दिया था।

61 साल की मायावती फिलहाल अपने राजनीतिक जीवन के कठिनतम दिनों से गुजर रही हैं। लोकसभा चुनाव 2014 में करारी हार के बाद 2017 के यूपी विधान सभा चुनावों में भी मायावती की पार्टी की करारी हार हुई है। उन्हें सिर्फ 19 सीटों से संतोष करना पड़ा। चुनाव से पहले और बाद में भी मायावती के कई राजनीतिक साथी उनका साथ छोड़ते चले गए। धीरे-धीरे मायावती संख्या बल के लिहाज से कमजोर हो गईं। हालांकि, 2017 के विधानसभा चुनाव में वोट शेयरिंग के हिसाब से मायावती की पार्टी, भाजपा (39.7%) के बाद 22.2 फीसदी वोट के साथ अभी भी दूसरे नंबर की पार्टी बनी हुई है।

उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती राज्य के करीब 22 फीसदी दलित मतदाताओं की अकेली सिरमौर हैं। साल 2007 में अपनी सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत मायावती ने 403 सदस्यों वाली विधानसभा में अकेले 206 सीटें जीती थीं। तब कहा जा रहा था कि मायावती का हाथी अब दिल्ली की ओर कूच कर गया है लेकिन तमाम आरोपों में फंसने के बाद उनका विजय अभियान 2012 में थम गया, जब अखिलेश यादव ने हाथी से तेज साइकिल को यूपी में दौड़ाया और लखनऊ की गद्दी पर सत्तासीन हो गए।

संसद के ऊपरी सदन राज्य सभा में मायावती फिलहाल अपना तीसरा कार्यकाल पूरा कर रही थीं लेकिन इस कार्यकाल के पूरा होने से नौ महीने पहले ही उन्होंने दलित उत्पीड़न के मुद्दे पर इस्तीफा देकर ना केवल अपने मजबूत इरादों का प्रदर्शन किया है बल्कि देश में बन रहे तमाम सियासी समीकरणों की ओर भी इशारा किया है। एक समय ऐसा था कि मायावती ने साल 2004 में लोकसभा से इस्तीफा देकर राज्यसभा की ओर रुख किया था लेकिन मौजूदा परिस्थितियां ऐसी हैं कि वो अपनी पार्टी के विधायकों के बल पर चाहकर भी राज्यसभा नहीं पहुंच सकती हैं। संभव है कि वो अगले साल अप्रैल में होने वाले राज्यसभा चुनाव में बैसाखी के सहारे फिर से संसद में पहुंच जाएं क्योंकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उन्हें अपनी पार्टी राजद की तरफ से ऊपरी सदन में लॉन्च कराने का एलान कर दिया है।

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