मेरी सीमाएं राजाओं ने खींचीं, मेरा नाम संविधान ने दिया, लेकिन मेरा स्वभाव मेरी नदियों ने बनाया। गंगा, यमुना, सरयू, घाघरा, गोमती, बेतवा और केन केवल जलधाराएं नहीं हैं, बल्कि मेरी सभ्यता की जीवित स्मृतियां हैं। सदियों से मैं इन नदियों से संवाद करता आया हूं। हर सुबह जब सूरज की पहली किरण गंगा की लहरों पर पड़ती है, तो ऐसा लगता है जैसे कोई मां अपने बच्चे के सिर पर स्नेह से हाथ फेर रही हो। यमुना की धारा में शांति है, सरयू के किनारे आस्था सांस लेती है, बेतवा चट्टानों से टकराकर साहस सिखाती है और घाघरा हर बरसात में याद दिलाती है कि प्रकृति किसी सत्ता से नहीं डरती।

मेरी असली जन्मतिथि किसी संविधान ने नहीं लिखी

लोग कहते हैं कि मेरा जन्म 24 जनवरी 1950 को हुआ, लेकिन वह केवल मेरे नामकरण की तारीख थी। मेरा वास्तविक जन्म तो तब हुआ, जब मेरी धरती पर पहली बार किसी नदी ने अपना मार्ग बनाया। मेरी पहली राजधानी कोई नगर नहीं, बल्कि नदी का किनारा था। उस समय न जिले थे, न तहसीलें, न सचिवालय और न ही राजधानियां। केवल नदियां थीं और उन्हीं के किनारे जीवन ने अपने पहले कदम रखे। जहां पानी मिला, वहीं मनुष्य ठहरा, खेती की, गांव बसाए, कस्बे बने, नगर विकसित हुए और अंततः सभ्यताओं का जन्म हुआ। यदि मेरी नदियां न होतीं, तो शायद मैं भी आज का उत्तर प्रदेश न होता।

मेरी सबसे बड़ी पहचान गंगा है। बहुत लोग उसे केवल एक नदी मानते हैं, लेकिन मेरे लिए वह स्मृति भी है, मां भी और शिक्षक भी। गंगोत्री से निकलकर जब वह मेरी धरती में प्रवेश करती है, तो केवल जल नहीं लाती, बल्कि हिमालय की मिट्टी, पहाड़ों का धैर्य और सदियों का इतिहास भी साथ लेकर आती है। प्रयागराज, वाराणसी, मिर्जापुर, कन्नौज और कानपुर जैसे अनेक नगर उसकी गोद में पले-बढ़े हैं। इन शहरों ने गंगा से व्यापार, संस्कृति, कविता और आस्था पाई है और बदले में उसे अपनी जीवनधारा का हिस्सा बनाया है।

लेकिन मेरी पहचान केवल गंगा तक सीमित नहीं है। मैं यमुना भी हूं, जिसका स्वभाव गंगा से बिल्कुल अलग है। यदि गंगा गंभीर मां है तो यमुना चंचल बहन। उसने केवल मथुरा और वृंदावन की धरती को सींचा ही नहीं, बल्कि कृष्ण की बाल लीलाओं की साक्षी भी बनी। उसके तट पर प्रेम ने दर्शन का रूप लिया, भक्ति संगीत में ढली और लोककथाएं अमर हो गईं। इसी तरह सरयू केवल अयोध्या की नदी नहीं, बल्कि भारतीय मानस की निर्मात्री है। रामकथा यदि भारत की आत्मा है तो सरयू उसकी मौन साक्षी है। लाखों लोग वहां केवल दर्शन करने नहीं, बल्कि अपने भीतर की शांति खोजने जाते हैं।

मेरी गोमती लखनऊ की धड़कन है। किसी शहर को समझना हो तो उसकी नदी को समझना चाहिए। गोमती ने लखनऊ को केवल पानी नहीं दिया, बल्कि उसका सौंदर्य, उसकी तहजीब और उसकी सांस्कृतिक पहचान भी गढ़ी। नवाबी दौर की शामें, इमामबाड़ों की परछाइयां और किनारों की रौनक कहीं न कहीं गोमती की ही देन हैं। दूसरी ओर घाघरा शांत भी है और उग्र भी। हर बरसात में वह यह सिखाती है कि प्रकृति का सम्मान करना ही मनुष्य की सबसे बड़ी समझदारी है। वह खेतों को काटती भी है और उन्हीं खेतों को नई उपजाऊ मिट्टी भी देती है। इस तरह वह विनाश और सृजन का पाठ एक साथ पढ़ाती है।

मेरे दक्षिण में बहने वाली बेतवा और केन बुंदेलखंड की कठोर धरती में जीवन का संचार करती हैं। झांसी, महोबा, हमीरपुर और चित्रकूट की कहानियों में इनका जल भी बहता है। जिसने बेतवा के किनारे सूर्योदय देखा है, वह समझ सकता है कि नदी केवल जलधारा नहीं होती, वह कविता भी होती है। मेरी नदियों ने केवल खेतों को नहीं सींचा, बल्कि विचारों को भी जन्म दिया। गंगा किनारे कबीर ने प्रश्न उठाए, सारनाथ के निकट बुद्ध ने करुणा का संदेश दिया और प्रयागराज के संगम ने यह सिखाया कि अलग-अलग धाराएं मिलकर भी अपनी पहचान खोती नहीं हैं। शायद यही कारण है कि मैं विविधताओं को स्वीकार करना जानता हूं।

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मेरे यहां कुंभ वहीं लगता है जहां नदियों का संगम है। करोड़ों लोग बिना किसी निमंत्रण के वहां पहुंच जाते हैं, क्योंकि नदी केवल पानी नहीं, विश्वास भी होती है। मेरे तीर्थ वहीं बने जहां नदियां थीं, व्यापार वहीं फला जहां घाट थे और नगर वहीं विकसित हुए जहां नावें रुकती थीं। आज पुल, एक्सप्रेसवे और रेलवे ने दूरियां कम कर दी हैं, लेकिन मेरी पहली सड़कें मेरी नदियां ही थीं। मेरे पहले व्यापारी, पहले यात्री और पहली डाक व्यवस्था भी इन्हीं जलमार्गों के सहारे चलती थी।

आज मेरी नदियां मुझसे रूठी हुई हैं

आज मेरी नदियां मुझसे कुछ नाराज भी हैं। कहीं प्रदूषण है, कहीं अतिक्रमण, कहीं अत्यधिक रेत खनन और कहीं मेरी सहायक नदियां सूख रही हैं। जब मैं यह सब देखता हूं तो ऐसा लगता है जैसे कोई अपने ही घर की दीवारें टूटती हुई देख रहा हो। नदियां केवल पर्यावरण का विषय नहीं हैं, वे मेरी स्मृति और मेरी पहचान हैं। यदि स्मृतियां धुंधली पड़ जाएं तो पहचान भी कमजोर हो जाती है।

इसलिए जब अगली बार आप किसी नदी के किनारे जाएं, तो केवल उसकी तस्वीर लेकर लौट मत आइए। कुछ देर उसके पास बैठिए, उसकी धारा की आवाज सुनिए। वह आपको मेरे बारे में वह सब बताएगी, जो किसी इतिहास की पुस्तक में नहीं मिलेगा। मैं उत्तर प्रदेश हूं। मेरी सीमाएं बदल सकती हैं, मेरे जिले बढ़ सकते हैं और मेरे शहर आधुनिक हो सकते हैं, लेकिन जब तक मेरी नदियां बहती रहेंगी, मेरी आत्मा जीवित रहेगी। क्योंकि मुझे सरकारों ने नहीं बनाया, मुझे मेरी नदियों ने गढ़ा है।

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मुझे सिर्फ नक्शे पर मत देखिए। मुझे पढ़िए। मुझे सुनिए। मुझे महसूस कीजिए। मैं किसी एक रंग से नहीं बना। मैं अनेक रंगों से मिलकर बनी वह तस्वीर हूं, जिसे भारत कहते हैं। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर मैं इंसान होता, तो शायद मेरे पास एक ही भाषा होती, एक ही पहनावा होता और एक ही तरह की यादें होतीं। लेकिन प्रकृति ने मुझे कुछ अलग बनाया। उसने मुझे सात-आठ अलग-अलग सांस्कृतिक संसारों को एक साथ जीने का सौभाग्य दिया। पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक