पिछले सप्ताह मैंने आपको अपने जन्म की कहानी सुनाई थी। बताया था कि 24 जनवरी 1950 को मुझे नया नाम मिला – उत्तर प्रदेश। लेकिन क्या किसी का परिचय केवल उसके नाम से पूरा हो जाता है? अगर किसी से आपका परिचय कराया जाए और सिर्फ इतना बताया जाए कि उनका नाम क्या है, तो क्या आप उसे जान जाएंगे? शायद नहीं। उसके स्वभाव, उसकी स्मृतियां, उसकी खुशियां, उसके संघर्ष और उसके संस्कार जाने बिना कोई परिचय पूरा नहीं होता। मेरे साथ भी यही है।

मुझे सिर्फ नक्शे पर मत देखिए। मुझे पढ़िए। मुझे सुनिए। मुझे महसूस कीजिए। मैं किसी एक रंग से नहीं बना। मैं अनेक रंगों से मिलकर बनी वह तस्वीर हूं, जिसे भारत कहते हैं। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर मैं इंसान होता, तो शायद मेरे पास एक ही भाषा होती, एक ही पहनावा होता और एक ही तरह की यादें होतीं। लेकिन प्रकृति ने मुझे कुछ अलग बनाया। उसने मुझे सात-आठ अलग-अलग सांस्कृतिक संसारों को एक साथ जीने का सौभाग्य दिया।

मेरे पश्चिम में जाइए, तो लगेगा जैसे बांसुरी अभी-अभी कहीं बजनी बंद हुई है। ब्रज की मिट्टी में कृष्ण केवल मंदिरों में नहीं मिलते, लोकगीतों में भी मिलते हैं। यहां होली सिर्फ खेली नहीं जाती, जी जाती है। बरसाना और नंदगांव में रंगों का जो उत्सव होता है, वह केवल त्योहार नहीं, सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक स्मृति है। यहां की बोली भी मुस्कुराती हुई लगती है।

थोड़ा पूर्व की ओर आइए। अब आप अवध में हैं। यहां लोग केवल बात नहीं करते, अदब से बात करते हैं। यहां ‘पहले आप’ केवल एक वाक्य नहीं, जीवन का संस्कार है। लखनऊ की गलियों में चलते हुए आपको एहसास होगा कि इमारतें भी तहजीब से खड़ी हैं। बड़ा इमामबाड़ा, रूमी दरवाजा, चिकनकारी की महीन कढ़ाई, टुंडे के कबाब, कथक की लय और उर्दू की नफासत – ये सब मिलकर अवध का चेहरा बनाते हैं। लेकिन अवध केवल नवाबों की कहानी नहीं है। यह किसानों का भी इलाका है, लोकगीतों का भी। राम की अयोध्या भी यही है। यानी आस्था और तहजीब यहां एक-दूसरे से टकराती नहीं, साथ-साथ चलती हैं।

बुद्ध ने उपदेश दिया, कबीर ने सवाल पूछे

अब मेरे पूर्वी हिस्से में चलिए। यह पूर्वांचल है। यहां सुबह गंगा के घाटों पर आरती से होती है और शाम बनारसी पान की खुशबू में ढल जाती है। काशी की गलियां जितनी संकरी हैं, उनका इतिहास उतना ही विराट है। यहीं बुद्ध ने सारनाथ में पहला उपदेश दिया। यहीं कबीर ने समाज से सवाल किए। यहीं रविदास ने समानता की बात कही। यहीं शहनाई को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने नया सम्मान दिया। और यहीं बनारसी बुनकरों ने धागों से ऐसी दुनिया बुनी, जिसे पूरी दुनिया ने सराहा।

अब मेरे दक्षिण की ओर आइए। यह बुंदेलखंड है। यहां की धरती कठोर है, गर्मी भी कठिन है। लेकिन यहां के लोगों का हौसला उससे कहीं बड़ा है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तलवार केवल इतिहास की किताब में नहीं, आज भी यहां के लोकगीतों में चमकती है। कालिंजर का किला, चित्रकूट की तपोभूमि, आल्हा-ऊदल की वीरगाथाएं – ये सब बताते हैं कि साहस भी मेरी पहचान का हिस्सा है।

अगर आप उत्तर की ओर बढ़ेंगे, तो तराई मिलेगी। घने जंगल, हरे-भरे खेत, नमी से भरी हवा। नेपाल की सीमा से सटा यह इलाका प्रकृति का उपहार है। दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में जब सुबह की धूप घास पर गिरती है, तो लगता है जैसे धरती ने सोने की चादर ओढ़ ली हो। यहीं बाघ भी है, बारहसिंगा भी और हजारों प्रवासी पक्षियों की उड़ान भी।

मेरे उत्तर-पश्चिम में रोहिलखंड है। इतिहास यहां कई परतों में मिलता है। रामपुर की रजा लाइब्रेरी में सदियों पुरानी पांडुलिपियां आज भी सुरक्षित हैं। बरेली का जरी-जरदोजी उद्योग, पीलीभीत की बांसुरी, शाहजहांपुर का क्रांतिकारी इतिहास – हर शहर अपने भीतर एक अलग कहानी समेटे बैठा है।

और फिर आता है दोआब। गंगा और यमुना के बीच फैली वह धरती जिसने सदियों तक भारत के अन्न भंडार को भरने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। मेरठ से लेकर प्रयागराज तक फैला यह इलाका केवल खेती की भूमि नहीं है। यहीं से 1857 की क्रांति की पहली चिंगारी उठी। यहीं खेतों ने हरित क्रांति का साथ दिया। यहीं गांवों ने भारत के लोकतंत्र को सबसे मजबूत आधार दिया।

बोली से लेकर स्वाद तक, हर कोस पर नया रंग

लोग अक्सर पूछते हैं – तुम्हारी भाषा कौन-सी है? मैं मुस्कुराकर कहता हूं – कौन-सी सुनना चाहते हो? ब्रज बोलूं? अवधी? भोजपुरी? बुंदेली? कन्नौजी? या खड़ी बोली? मेरे यहां भाषा बदलती है, लेकिन अपनापन नहीं। दो जिलों के बीच शब्द बदल जाते हैं, लेकिन नमस्ते का भाव वही रहता है।

मेरे स्वाद भी बदलते रहते हैं। कहीं पेड़ा प्रसिद्ध है, कहीं इत्र, कहीं गुड़, कहीं रेवड़ी, कहीं बनारसी पान, कहीं आगरे का पेठा, कहीं मथुरा का पेड़ा, कहीं मलिहाबाद का आम, कहीं कन्नौज की खुशबू। अगर कोई कहे कि उसने उत्तर प्रदेश का स्वाद चख लिया है, तो मैं उससे पूछता हूं—किस हिस्से का? क्योंकि मेरा स्वाद भी मेरी तरह अनेक है।

यही कारण है कि मुझे समझना आसान नहीं। मैं किसी एक पहचान में बंधा प्रदेश नहीं हूं। मैं राम भी हूं, मैं कृष्ण भी हूं, मैं बुद्ध भी हूं, मैं कबीर भी हूं, मैं रहीम भी हूं। मैं गंगा हूं, मैं यमुना हूं। मैं खेत हूं, मैं करघा हूं, मैं विश्वविद्यालय हूं, मैं मेला हूं, मैं गांव हूं, मैं महानगर भी हूं।

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कई लोग मुझे केवल चुनावों के मौसम में याद करते हैं। उन्हें लगता है कि मेरी पहचान केवल राजनीति है। लेकिन राजनीति मेरी कहानी का एक अध्याय भर है, पूरी किताब नहीं। मेरी असली कहानी मेरे लोगों ने लिखी है – उन किसानों ने, जिन्होंने मिट्टी को अन्न बनाया, उन बुनकरों ने, जिन्होंने धागों को सम्मान दिया, उन कवियों ने, जिन्होंने शब्दों को अमर कर दिया, उन संतों ने, जिन्होंने मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना सिखाया।

इसलिए जब अगली बार आप मेरे बारे में कोई राय बनाएं, तो केवल किसी एक शहर, एक घटना या एक चुनाव के आधार पर मत बनाइए। मैं उससे कहीं बड़ा हूं। मैं कई सभ्यताओं की साझा स्मृति हूं। मैं अनेक संस्कृतियों का घर हूं। मैं विविधताओं का वह संसार हूं, जिसे एक नाम दिया गया है – उत्तर प्रदेश।

अगले सप्ताह मैं आपको अपनी उन नदियों से मिलवाऊंगा, जिन्होंने मुझे जन्म दिया। सरकारें बहुत बाद में आईं, लेकिन गंगा, यमुना, सरयू, घाघरा, गोमती और बेतवा सदियों पहले मेरी आत्मा को आकार दे चुकी थीं। मेरी अगली कहानी उन्हीं की होगी।

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किस्से, कहानियां और अफसाने सुनना-सुनाना इंसान की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है। हर सभ्यता ने अपनी कहानी कही है और हर समाज ने अपनी यादें अगली पीढ़ियों तक पहुंचाई हैं। लेकिन इस बार कुछ अलग है। यहां कोई इतिहासकार, लेखक या पत्रकार आपको उत्तर प्रदेश की कहानी नहीं सुना रहा। इस बार उत्तर प्रदेश खुद अपनी कहानी, अपनी जुबानी सुना रहा है। अगर आप मुझे सिर्फ भारत के नक्शे पर खोजेंगे, तो मैं आपको एक भौगोलिक आकृति भर दिखाई दूंगा। लेकिन अगर आप मुझे सचमुच समझना चाहते हैं, तो आपको मेरी मिट्टी की गंध महसूस करनी होगी, मेरी नदियों का बहाव सुनना होगा, मेरे गांवों की सुबह और मेरे शहरों की शाम देखनी होगी। आपको मेरी बोलियों में उतरना होगा, मेरे लोकगीतों में छिपे इतिहास को पढ़ना होगा और उन करोड़ों लोगों की आंखों में झांकना होगा, जिनके सपनों, संघर्षों और उम्मीदों ने मुझे गढ़ा है। पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक