किस्से, कहानियां और अफसाने सुनना-सुनाना इंसान की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक है। हर सभ्यता ने अपनी कहानी कही है और हर समाज ने अपनी यादें अगली पीढ़ियों तक पहुंचाई हैं। लेकिन इस बार कुछ अलग है। यहां कोई इतिहासकार, लेखक या पत्रकार आपको उत्तर प्रदेश की कहानी नहीं सुना रहा। इस बार उत्तर प्रदेश खुद अपनी कहानी, अपनी जुबानी सुना रहा है।
अगर आप मुझे सिर्फ भारत के नक्शे पर खोजेंगे, तो मैं आपको एक भौगोलिक आकृति भर दिखाई दूंगा। लेकिन अगर आप मुझे सचमुच समझना चाहते हैं, तो आपको मेरी मिट्टी की गंध महसूस करनी होगी, मेरी नदियों का बहाव सुनना होगा, मेरे गांवों की सुबह और मेरे शहरों की शाम देखनी होगी। आपको मेरी बोलियों में उतरना होगा, मेरे लोकगीतों में छिपे इतिहास को पढ़ना होगा और उन करोड़ों लोगों की आंखों में झांकना होगा, जिनके सपनों, संघर्षों और उम्मीदों ने मुझे गढ़ा है।
मैं उत्तर प्रदेश हूं।
आज पहली बार मैं अपनी कहानी, अपनी जुबानी सुनाने आया हूं।
यह किसी राज्य का सरकारी परिचय नहीं है और न ही पर्यटन विभाग का प्रचार। यह एक ऐसे भूभाग की आत्मकथा है, जिसने हजारों वर्षों से भारत की राजनीति, संस्कृति, आध्यात्म, साहित्य, कृषि, शिक्षा और समाज को दिशा दी है। आने वाले हफ्तों में मैं अपने बारे में आपसे उसी तरह बात करूंगा, जैसे कोई बुज़ुर्ग अपने जीवन के अनुभव सुनाता है – बिना किसी आडंबर के, बिना किसी राजनीतिक आग्रह के और बिना किसी पूर्वाग्रह के। मैं अपने गौरव को भी छिपाऊंगा नहीं और अपनी कमजोरियों से भी मुंह नहीं मोड़ूंगा।
बहुत से लोग मानते हैं कि मेरा जन्म 24 जनवरी 1950 को हुआ, जब भारतीय गणराज्य बनने से ठीक पहले मुझे आधिकारिक रूप से उत्तर प्रदेश नाम दिया गया। यह सच है, लेकिन पूरा सच नहीं। उस दिन मेरा नाम बदला था, जन्म नहीं हुआ था। मेरा जन्म तो तब शुरू हो गया था, जब सरयू के किनारे कोशल की सभ्यता आकार ले रही थी, जब पांचाल ज्ञान और शास्त्रार्थ का केंद्र था, जब काशी दुनिया के सबसे पुराने जीवित नगरों में अपनी पहचान बना रही थी, जब मथुरा और वृंदावन कृष्ण की कथाओं से लोकजीवन को आलोकित कर रहे थे, जब सारनाथ में बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था और जब कबीर, तुलसी, सूर और रहीम की वाणी मेरी धरती पर गूंज रही थी। मैं किसी एक शहर, किसी एक राजा या किसी एक कालखंड की देन नहीं हूं। मैं सदियों से बहती हुई अनेक परंपराओं का संगम हूं।
अंग्रेजों के शासन ने मुझे प्रशासनिक इकाइयों में बांधा। कभी मुझे नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज कहा गया, फिर यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध, और अंततः यूनाइटेड प्रोविंसेज। आजादी के बाद जब भारत ने अपने लोकतांत्रिक भविष्य की नींव रखी, तब 24 जनवरी 1950 को मुझे नया नाम मिला – उत्तर प्रदेश। यह सिर्फ नाम बदलने की घटना नहीं थी। यह उस भूभाग की नई पहचान थी, जिसने स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक सफर में सबसे बड़ी भूमिका निभानी थी।
सियासत मेरी कहानी का एक अध्याय है, पूरी किताब नहीं
आज लोग मेरा नाम लेते ही चुनावों की बात करने लगते हैं। कोई कहता है कि दिल्ली का रास्ता मुझसे होकर जाता है। कोई मेरी पहचान को केवल लोकसभा की 80 सीटों में समेट देता है। कोई मुझे अपराध के आंकड़ों से जोड़ता है, तो कोई आस्था के विशाल आयोजनों से। लेकिन क्या किसी राज्य की पहचान सिर्फ चुनाव, सत्ता और सुर्खियों से तय होती है? अगर ऐसा होता, तो मेरी कहानी इतनी लंबी नहीं होती। मेरे खेतों में उगने वाला अन्न, मेरे बुनकरों के करघे, मेरे कारीगरों के हाथ, मेरे विश्वविद्यालय, मेरे साहित्यकार, मेरे वैज्ञानिक, मेरे खिलाड़ी और मेरे लाखों मेहनतकश लोग मेरी पहचान का उतना ही बड़ा हिस्सा हैं, जितनी मेरी राजनीति।
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अगर भारत को एक आईने में देखना हो, तो वह आईना मैं हूं। मेरी सीमाओं के भीतर आपको हिमालय की तराई भी मिलेगी और बुंदेलखंड की पथरीली धरती भी; गंगा का विशाल मैदान भी मिलेगा और विंध्य की पहाड़ियां भी; काशी की आध्यात्मिक परंपरा भी मिलेगी और नोएडा की तकनीकी दुनिया भी; फिरोजाबाद का कांच, मुरादाबाद का पीतल, भदोही के कालीन, लखनऊ की चिकनकारी, बनारस की साड़ियां और सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी भी मिलेगी। मेरे भीतर जितनी विविधता है, उतनी शायद ही किसी एक भारतीय राज्य में एक साथ दिखाई देती हो।
लेकिन मैं सिर्फ अपनी उपलब्धियों की कहानी सुनाने नहीं आया हूं। मेरे सामने ऐसे सवाल भी हैं, जिनसे आंखें नहीं चुराई जा सकतीं। बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता, किसानों की चुनौतियां, तेजी से बदलते गांव, फैलते शहर, पर्यावरण, कानून-व्यवस्था, पलायन, स्वास्थ्य और सामाजिक असमानताएं – ये सब मेरी वास्तविकता का हिस्सा हैं। मेरी कहानी तभी पूरी होगी, जब मैं अपने उजले और धुंधले दोनों चेहरों को आपके सामने रखूंगा।
इसीलिए आज से यह यात्रा शुरू हो रही है। हर सप्ताह मैं अपने जीवन का एक नया अध्याय खोलूंगा। कभी अपने इतिहास की धूल झाड़ूंगा, कभी वर्तमान की बेचैनियों को समझूंगा और कभी भविष्य की संभावनाओं पर बात करूंगा। मैं किसी सरकार का प्रवक्ता नहीं हूं, किसी दल का घोषणापत्र भी नहीं। मैं उन करोड़ों लोगों की आवाज हूं, जिनकी मेहनत, उम्मीद और संघर्ष ने मुझे बनाया है।
आज मैंने सिर्फ अपना परिचय दिया है। अगले सप्ताह मैं अपने सबसे बड़े सवाल पर बात करूंगा। मेरे युवा आखिर किस मोड़ पर खड़े हैं? क्योंकि अगर मेरी नई पीढ़ी का भविष्य मजबूत होगा, तभी मेरा भविष्य भी मजबूत होगा।
मैं उत्तर प्रदेश हूं। और यह मेरी कहानी का पहला अध्याय है।
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इसे एक शहर कहना आसान है, लेकिन समझना कठिन। दरअसल यह शहर एक साथ कई समयों में जीता है। यहां धर्म भी है, लोकतंत्र भी। यहां अदालत की भाषा भी है और कविता की भी। यहां इतिहास किताबों में कम, लोगों की स्मृतियों में ज्यादा दर्ज है। कई महीने पहले एक बुज़ुर्ग ने मुझसे कहा था -“किसी को प्रयागराज को जानना-समझना हो तो उसके लोगों से मिलिए, इमारतों से नहीं।” पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
