उस नवंबर की सर्दी में लखनऊ की राजनीति कुछ ज्यादा ही गरम थी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान अब इतनी बढ़ चुकी थी कि उसकी गूंज दिल्ली तक पहुंचने लगी थी। मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के सामने केवल विपक्ष की चुनौती नहीं थी, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही थी। सरकार और संगठन के बीच बढ़ती दूरी ने हालात को ऐसा बना दिया था कि लखनऊ की राजनीतिक हलचल पर दिल्ली की नजर टिक गई थी।

इसी बीच 24 नवंबर 1960 को दिल्ली से लखनऊ एक ऐसी चिट्ठी पहुंची, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति के उस दौर को एक नया मोड़ दिया। चिट्ठी लिखने वाले थे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सामने थे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद। नेहरू ने उन्हें कांग्रेस विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा देने के अपने पहले के निर्णय पर कायम रहने की सलाह दी थी।

हालांकि साथ ही यह भी कहा था कि मुख्यमंत्री पद से तत्काल इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है और कुछ दिनों का अंतर रखकर आगे की स्थिति पर विचार किया जा सकता है। मेरी राजनीति में यह कोई सामान्य पत्र नहीं था। इसके पीछे केवल एक नेता के पद छोड़ने का सवाल नहीं था, बल्कि मेरी सरकार, मेरी प्रदेश कांग्रेस और कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान का पूरा संकट खड़ा था।

कहानी शुरू हुई थी कांग्रेस के भीतर

मैं, उत्तर प्रदेश, उस समय भी राष्ट्रीय राजनीति में उतना ही महत्वपूर्ण था जितना बाद के दशकों में रहा। मेरे यहां कांग्रेस की राजनीति का असर केवल लखनऊ तक सीमित नहीं रहता था। दिल्ली में बैठे कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के लिए भी उत्तर प्रदेश की सरकार और संगठन की स्थिति महत्वपूर्ण थी।

डॉ. संपूर्णानंद मेरे दूसरे मुख्यमंत्री थे। विद्वान, पत्रकार और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े इस नेता ने 1955 में गोविंद बल्लभ पंत के केंद्र सरकार में चले जाने के बाद उत्तर प्रदेश की कमान संभाली थी। उनके पहले कार्यकाल के बाद 1957 में वह फिर मुख्यमंत्री बने, लेकिन इस दूसरे दौर में परिस्थितियां पहले जैसी नहीं रहीं।

विधानसभा के भीतर उनकी सरकार को 1957, 1958 और 1959 में लगातार तीन अविश्वास प्रस्तावों का सामना करना पड़ा। सरकार हर बार बच गई, लेकिन इन घटनाओं से यह भी संकेत मिलता रहा कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ सहज नहीं था।

इसी दौरान कांग्रेस के भीतर कई प्रभावशाली नेताओं के अपने-अपने राजनीतिक आधार मजबूत हो रहे थे। चंद्रभानु गुप्त, कमलापति त्रिपाठी और चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं की मौजूदगी ने प्रदेश कांग्रेस की राजनीति को और जटिल बना दिया था।

1960 में चंद्रभानु गुप्त प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने तो सरकार और संगठन के बीच का तनाव और स्पष्ट दिखाई देने लगा। अब सवाल केवल इतना नहीं था कि सरकार कौन चलाएगा। सवाल यह भी था कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा और पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़ों के बीच तालमेल कैसे बनेगा। यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसमें नवंबर 1960 की वे चिट्ठियां लिखी गईं।

मामला दिल्ली पहुंचा

नवंबर आते-आते स्थिति ऐसी हो गई कि मामला प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक पहुंच गया। 22 नवंबर को संपूर्णानंद ने नेहरू को पत्र लिखा और उसके जवाब में 24 नवंबर को नेहरू ने उन्हें विस्तार से पत्र भेजा। यह पत्र केवल औपचारिक राजनीतिक संवाद नहीं था। इसमें उत्तर प्रदेश कांग्रेस के भीतर पैदा हुई स्थिति को लेकर नेहरू की चिंता साफ दिखाई देती है। उनका जोर इस बात पर था कि पार्टी के नेताओं के बीच सहयोग और आपसी विश्वास का वातावरण बनाया जाए और लंबे समय से चल रही खींचतान को किसी तरह खत्म किया जाए।

नेहरू ने संपूर्णानंद से प्रदेश कांग्रेस के नेता पद से इस्तीफा देने की अपनी पहले की घोषणा पर कायम रहने को कहा। लेकिन इस पत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि नेहरू ने उन्हें तत्काल मुख्यमंत्री पद छोड़ने की सलाह नहीं दी थी। उनका सुझाव था कि अगर संपूर्णानंद कांग्रेस विधायक दल के नेता पद से हटते हैं तो नए नेता का चुनाव किया जा सकता है, लेकिन मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा कुछ समय बाद दिया जाए।

इस बीच नई राजनीतिक व्यवस्था और प्रदेश कांग्रेस संगठन में जरूरी बदलाव पर विचार करने का अवसर मिल सकता था। यानी दिल्ली से आया संदेश अपने आप में स्पष्ट था, लेकिन उसमें घटनाओं को तुरंत अंतिम मुकाम तक पहुंचाने की जल्दबाजी नहीं थी। पहले पार्टी के भीतर नेतृत्व का सवाल सुलझे और फिर सरकार के भविष्य पर फैसला हो, यह उस पत्र की एक महत्वपूर्ण बात थी।

उसी दिन एक दूसरी चिट्ठी भी लिखी गई

24 नवंबर का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि नेहरू ने उसी दिन चंद्रभानु गुप्त को भी पत्र लिखा। इसमें उन्होंने संकेत दिया कि यदि संपूर्णानंद कांग्रेस विधायक दल के नेता पद से हटते हैं तो नए नेता के रूप में चंद्रभानु गुप्त का चुना जाना उन्हें उचित लगता है। लेकिन यहां भी नेहरू की चिंता केवल व्यक्ति बदलने तक सीमित नहीं थी। वह चाहते थे कि नई व्यवस्था में कांग्रेस के भीतर सहयोग का वातावरण बने और अलग-अलग नेताओं के बीच काम करने की गुंजाइश पैदा हो।

नेहरू ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी में भी कुछ बदलाव की जरूरत बताई। उनके पास ऐसी शिकायतें पहुंची थीं कि प्रदेश कांग्रेस संगठन के स्तर पर कुछ नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। नेहरू का मानना था कि ऐसे कदम उस समय की स्थिति को और बिगाड़ सकते हैं। इसलिए उन्होंने इस तरह की कार्रवाई को रोकने की बात कही।

इस तरह 24 नवंबर की दो चिट्ठियां उत्तर प्रदेश कांग्रेस के उस संकट की दो दिशाएं सामने रखती हैं। एक चिट्ठी मुख्यमंत्री संपूर्णानंद के नाम थी और दूसरी चंद्रभानु गुप्त के नाम। एक में मौजूदा नेतृत्व को पीछे हटने की सलाह थी तो दूसरी में संभावित नए नेतृत्व की ओर संकेत। और इन दोनों चिट्ठियों के बीच खड़ी थी मेरी यानी उत्तर प्रदेश की कांग्रेस राजनीति, जो उस समय अपने भीतर ही एक नए समीकरण की तलाश कर रही थी।

संपूर्णानंद ने क्या किया?

नेहरू की चिट्ठी के दो दिन बाद घटनाक्रम ने तेजी पकड़ी। 26 नवंबर को संपूर्णानंद ने नेहरू को जवाब लिखा। उन्होंने अपने इस्तीफे की मंशा जाहिर की। अब तक जो संकट चिट्ठियों और बैठकों के बीच चल रहा था, वह धीरे-धीरे राजनीतिक बदलाव की दिशा में बढ़ने लगा था। नेहरू आर्काइव में संपूर्णानंद का यह पत्र भी दर्ज है, जिससे इस पूरे घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने में मदद मिलती है।

इसके बाद घटनाएं ज्यादा तेजी से आगे बढ़ीं। 1 दिसंबर को चंद्रभानु गुप्त उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए और 7 दिसंबर 1960 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इस तरह कुछ ही दिनों के भीतर उत्तर प्रदेश की सत्ता का चेहरा बदल गया। संपूर्णानंद का मुख्यमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल बीच में ही समाप्त हो गया और चंद्रभानु गुप्त ने उनकी जगह ले ली।

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लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक मुख्यमंत्री के इस्तीफे की कहानी मान लेना शायद अधूरा होगा। असल कहानी उस समय की कांग्रेस राजनीति की थी, जिसमें सरकार और पार्टी संगठन के बीच दूरी बढ़ रही थी, अलग-अलग नेताओं के अपने राजनीतिक समीकरण बन रहे थे और अंततः उस संकट को संभालने के लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ा।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बदलाव किसी एक दिन विधानसभा के भीतर हुए मतदान से अचानक नहीं आया था। उसकी जमीन पहले से तैयार हो रही थी और उसके निशान उन चिट्ठियों में दिखाई देते हैं, जो नवंबर 1960 में दिल्ली और लखनऊ के बीच चलीं।

मेरी राजनीति का एक पुराना पन्ना

आज जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री, पार्टी संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के रिश्तों की चर्चा होती है तो 1960 का यह प्रसंग मेरी पुरानी राजनीतिक फाइल का एक दिलचस्प पन्ना खोलता है। उस समय भी सवाल केवल सरकार चलाने का नहीं था। पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाने का सवाल सामने था।

नेहरू के दोनों पत्रों को साथ रखकर देखें तो उनका जोर किसी एक व्यक्ति को हटाने से ज्यादा कांग्रेस के भीतर सहयोग और आपसी विश्वास का माहौल बनाने पर दिखाई देता है। लेकिन राजनीति में फैसले केवल चिट्ठियों से नहीं चलते। चिट्ठियां रास्ता जरूर दिखा सकती हैं, मगर उसके बाद घटनाएं अपने ढंग से आगे बढ़ती हैं।

1960 में भी ऐसा ही हुआ। नवंबर की उन चिट्ठियों के कुछ ही दिनों बाद संपूर्णानंद मुख्यमंत्री नहीं रहे और चंद्रभानु गुप्त ने उनकी जगह ले ली। सत्ता बदल गई, चेहरे बदल गए, लेकिन मेरी पुरानी फाइलों में वे चिट्ठियां आज भी सुरक्षित हैं। वे बताती हैं कि सत्ता में बदलाव हमेशा विधानसभा के फर्श पर दिखाई देने वाले किसी अंतिम फैसले से शुरू नहीं होता।

कभी उसकी शुरुआत पार्टी की किसी बैठक में होती है, कभी नेताओं के बीच चल रही खामोश खींचतान में और कभी दिल्ली से लखनऊ पहुंचने वाली एक चिट्ठी से। 1960 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव की कहानी भी ऐसी ही एक चिट्ठी से खुलती है।

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1962 के चुनाव आते-आते, भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने अपनी कई प्रक्रियाओं को दुरुस्त कर लिया था। उस समय तक चुनाव में मतदाताओं ने सबसे अधिक मतदान किया था – और भले ही कांग्रेस ने निर्णायक रूप से जीत हासिल की, लेकिन पार्टी की राजनीतिक आलोचना के पहले स्पष्ट उदाहरण दिखाई देने लगे। ऐसा तब हुआ जब प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपने दूसरे कार्यकाल में एक सैन्य अभियान में गोवा, दमन और दीव की सफल मुक्ति की देखरेख की, जिसने इन क्षेत्रों पर 400 से अधिक वर्षों के पुर्तगाली शासन को समाप्त कर दिया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक