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मुलायम-अखिलेश के झगड़े में सपा के संविधान से किसे मिल सकता है फायदा, जानिए

मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और अमर सिंह सोमवार (दो जनवरी) को चुनाव आयोग से मिलने के लिए दिल्ली पहुंच सकते हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव। (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी (सपा) विभाजन की तरफ बढ़ती दिख रही है। पार्टी में राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है। पार्टी के विभाजन की आशंकाओं के साथ ही इस बात को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं कि विभाजन की स्थिति में पार्ट की चुनाव निशान ‘साइकिल’ किस धड़े को मिलेगी। दोनों धड़ों की कोशिश होगी कि सपा का जाना-पहचाना चुनाव निशान उसे मिल जाए।

चुनाव निशान किस धड़े को मिलेगा इसका आखिरी फैसला भारतीय निर्वाचन आयोग करेगा। सूत्रों के अनुसार चुनाव आयोग दोनों पक्षों का पक्ष सुनने के बाद ही इस बारे में कोई फैसला करेगा। भारतीय राजनीति में ये पहली बार नहीं होगा कि किसी राजनीतिक दल के दो धड़े चुनाव निशान को लेकर आपस में आमने-सामने आ जाएं। चुनाव आयोग के सूत्रों के अनुसार चुनाव निशान दिलाने में “पार्टी के संविधान” और “बहुमत के परीक्षण” की अहम भूमिका होगी। 1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी दो धड़ों कांग्रेस (जे) और कांग्रेस (ओ) में बंट गई थी। अगर सपा के संविधान के आधार पर फैसला लेना मुश्किल हुआ तो चुनाव आयोग दोनों धड़ों को अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकता है।

अगर चुनाव आयोग ने सपा के संविधान को तरजीह दी तो मुलायम सिंह यादव के लिए ये फायदे का सौदा होगा। सपा के संविधान के सेक्शन 14 के सब-क्लॉज 2 के अनुसार पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन केवल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बुला सकते हैं। पार्टी अध्यक्ष ये अधिवेशन राष्ट्रीय कार्यकारिणी के प्रस्ताव पर या 40 प्रतिशत राष्ट्रीय प्रतिनिधियों की मांग पर बुला सकते हैं। सेक्शन 14 के सब-क्लॉज 4 के अनुसार राष्ट्रीय अधिवेशन में लिए गए फैसले पर चुने हुए या नामित प्रतिनिधियों द्वारा आपत्ति जताए जाने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष का फैसला आखिरी होगा। सपा के संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष के फैसले को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

सपा के संविधान के सेक्शन 15 के अनुसार राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अध्यक्ष राष्ट्रीय और विशेष अधिवेशनों की अध्यक्षता करेंगे। इसी सेक्शन के एक सब-क्लॉज के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुशासनहीनता के आरोप में किसी पर कार्रवाई कर सकते हैं। इस फैसले को भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

सूत्रों के अनुसार इन नियमों के तहत ही मुलायम का धड़ा चुनाव आयोग में ये साबित करने की कोशिश करेगा कि रविवार (एक जनवरी) को बुलाया गया सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन नियम विरुद्ध था। वहीं अखिलश का धड़ा “बहुमत परीक्षण” पर जोर देना चाहेगा क्योंकि रविवार को अखिलेश के पक्ष में ज्यादा पार्टी नेता, पदाधिकारी, सांसद, विधायक नजर आए। राम गोपाल यादव पहले ही दावा कर चुके हैं कि वो रविवार को उनके अधिवेशन में आए सभी पार्टी पदाधिकारियों से दस्तखत ले चुके हैं।

राम गोपाल ने कहा है कि वो जल्द ही इस मामले में चुनाव आयोग जाएंगे। वहीं मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव और अमर सिंह सोमवार (दो जनवरी) को चुनाव आयोग जाने के लिए दिल्ली पहुंच गए हैं। सूत्रों के अनुसार मुलायम पहले ही चुनाव आयोग को पार्टी का संविधान और अन्य जरूरी दस्तावेज पहले ही भेज चुके हैं। कहा जा रहा है कि मुलायम ने रविवार को हुई पार्टी की संसदीय समिति की बैठक के ब्योरा भी चुनाव आयोग को भेजा है। सपा संसदीय समिति की बैठक में राम गोपाल द्वारा बुलाए गए राष्ट्रीय अधिवेशन को “असंवैधानिक” माना गया। माना जा रहा है कि मुलायम चुनाव आयोग से कहेंगे कि राम गोपाल द्वारा बुलाया गया राष्ट्रीय अधिवेशन कानूनी नहीं है और वो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और शिवपाल यादव अभी भी पार्टी के यूपी प्रदेश अध्यक्ष हैं।

विशेषज्ञों की मानें तो अगर चुनाव आयोग दोनों पक्षों में से किसी की भी दलील से फिलहाल सहमत नहीं हुआ तो वो सपा के चुनाव निशान को फ्रीज कर सकता है यानी जब तक चुनाव आयोग कोई फैसला न सुना दे, कोई भी धड़ा इसका प्रयोग नहीं कर सकेगा।

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