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उत्तर प्रदेश के लिए राजनीतिक सरगर्मियों से भरा रहा साल 2016, कानपुर ट्रेन हादसा सबसे दुखद अनुभव

वर्ष के मध्य में यादव परिवार का घमासान सार्वजनिक हो गया जब उसके सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने माफिया से नेता बने मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के सपा में विलय का ऐलान किया।

Author लखनऊ | December 18, 2016 4:14 PM
कानपुर देहात क्षेत्र में क्षतिग्रस्त पटान-इंदौर एक्सप्रेस। (File Photo)

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसे लेकर साल 2016 में पूरे वर्ष राजनीतिक सरगर्मियां रहीं। कानपुर का ट्रेन हादसा इस वर्ष का सबसे दुखद अनुभव रहा, जिसमें करीब डेढ़ सौ यात्रियों की जान चली गयी। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव को इस वर्ष अप्रत्याशित रूप से पारिवारिक अंतर्कलह देखनी पड़ी। एक बार तो ऐसा भी लगा कि सपा में विभाजन हो जाएगा। वर्ष के मध्य में यादव परिवार का घमासान सार्वजनिक हो गया जब उसके सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने माफिया से नेता बने मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के सपा में विलय का ऐलान किया। इस फैसले से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नाखुश थे। तीन दिन बाद ही मुख्यमंत्री के दबाव में विलय रद्द कर दिया गया। उसके बाद सपा में कुछ ना कुछ गड़बड़ी होती रही। हालांकि मुलायम ने सबको एकजुट रखने की पूरी कोशिश की।

‘मिस्टर क्लीन’ की छवि को बनाये रखने के प्रयास में अखिलेश ने दागी खनन मंत्री गायत्री प्रजापति सहित दो मंत्रियों को राज्य कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसकी प्रतिक्रिया में मुलायम ने पुत्र अखिलेश को सपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और उनकी जगह चाचा शिवपाल यादव को नया प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। ‘जैसे को तैसा’ की तर्ज पर अखिलेश ने मंत्री चाचा के विभाग छीन लिये। नाराज चाचा ने मुख्यमंत्री के समर्थक माने जाने वाले कई युवा सपा नेताओं को बर्खास्त कर दिया। मुलायम के चचेरे भाई राम गोपाल यादव पर भी आंच आयी। अखिलेश का समर्थन करने तथा राज्यसभा सांसद अमर सिंह का विरोध करने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी और छह साल के लिए उन्हें सपा से निष्कासित कर दिया गया। हालांकि बाद में उनकी घर वापसी हो गयी।

विपक्षी दलों ने इस अंतर्कलह को लेकर सपा पर लगातार हमले बोले। मुलायम को लगा कि इस घटनाक्रम से सपा की चुनावी संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी तो उन्होंने सभी निष्कासन रद्द कर दिये और सबको एकजुट रहने का संदेश दिया ताकि जनता के बीच भी सही संदेश जाए। बसपा सुप्रीमो मायावती को अंतर्कलह से लगा कि अब मुसलमान वोट सपा से कट जाएगा। तब उन्होंने मुस्लिमों से सपा को वोट नहीं देने की अपील करना शुरू कर दिया और दलील दी कि इससे भाजपा को फायदा होगा। प्रदेश में मुसलमानों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है और उनका वोट किसी भी पार्टी की जीत में महत्वपूर्ण माना जाता है। बसपा के लिए भी हालांकि यह वर्ष चुनौती भरा रहा। मायावती के कई करीबी नेता पार्टी छोड़ गये। इनमें स्वामी प्रसाद मौर्य, आर के चौधरी और ब्रजेश पाठक के नाम प्रमुख हैं। सबको मायावती के काम करने के अंदाज पर आपत्ति थी और कुछ ने उन पर पार्टी के टिकट बेचने का आरोप भी मढ़ा।

मतदाताओं को लुभाने की कवायद में भाजपा ने भी परिवर्तन यात्रा शुरू की। इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कई जनसभाएं कीं। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह सहित केन्द्र के मंत्रियों और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने भी कई जनसभाओं को संबोधित किया। विरोधियों का मुंह बंद करने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने विकास कार्यों और कल्याण योजनाओं का उल्लेख करते रहे और प्रदेश की जनता को समझाने की कोशिश करते रहे कि सपा दरअसल विकास चाहती है। इस कड़ी में उन्होंने लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे और लखनऊ मेट्रो का लोकार्पण किया। उधर उत्तर प्रदेश में जमीन मजबूत करने में जुटी कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने देवरिया से दिल्ली तक ‘किसान यात्रा’ निकाली। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया।

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