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सीबीआइ जांच की तलवार के बाद दो मंत्री बर्खास्त

राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को वापस लेने के लिए अर्जी दी थी, मगर न्यायालय ने गत नौ सितंबर को उसे खारिज कर दिया था।

Author लखनऊ | September 13, 2016 01:06 am
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोमवार को अपने दो मंत्रियों गायत्री प्रसाद प्रजापति और राजकिशोर सिंह को बर्खास्त कर दिया। प्रदेश में बीते कई वर्षों से लगातार आ रही अवैध खनन की शिकायतों को संज्ञान में लेते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कुछ समय पहले मामले की जांच सीबीआइ से कराने का आदेश दिया था। प्रदेश सरकार ने सीबीआइ जांच से बचने के लिए याचिका दायर की थी जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था। गायत्री प्रसाद प्रजापति की बर्खास्तगी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के इसी फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है।  इस सिलसिले में राजभवन को सोमवार को ही पत्रावली भेजी गई थी, जिस पर राज्यपाल राम नाईक ने अपनी मंजूरी दे दी। बयान के मुताबिक राज्यपाल ने उद्यान व खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) मूलचंद चौहान को खनन विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा है, जबकि समाज कल्याण मंत्री रामगोविंद चौधरी को पंचायती राज विभाग की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी है। राजकिशोर सिंह के पास रहे लघु सिंचाई और पशुधन विभाग को मुख्यमंत्री के हवाले किया गया है। मालूम हो कि प्रजापति पर अवैध खनन को बढ़ावा देने और भ्रष्टाचार के आरोप अर्से से लगते रहे हैं। इसके अलावा सिंह पर भी ऐसे इल्जाम लगाए गए थे।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में जगह-जगह बड़े पैमाने पर जारी अवैध खनन को गंभीरता से लेते हुए गत 28 जुलाई को प्रदेश में हुए अवैध खनन और इसमें शामिल सरकारी अधिकारियों की भूमिका की सीबीआइ से जांच कराकर छह महीने के अंदर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले को वापस लेने के लिए अर्जी दी थी, मगर न्यायालय ने गत नौ सितंबर को उसे खारिज कर दिया था। वर्ष 2012 में पहली बार अमेठी से विधायक बने प्रजापति ने कामयाबी की सीढ़ियों पर काफी तेजी से कदम रखे। उन्हें फरवरी 2013 में सिंचाई राज्यमंत्री बनाया गया था। बाद में उन्हें खनन राज्यमंत्री के पद पर नियुक्त किया गया था। जुलाई 2013 में प्रजापति को स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री बनाया गया था और जनवरी 2014 में उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया गया था।इसके अलावा वर्ष 2012 में बस्ती जिले की हर्रैया सीट से विधायक चुने गए राजकिशोर पर भ्रष्टाचार और जमीन हड़पने के आरोप लगे थे। वे सपा की पिछली सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं।

खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति का विभाग खास तौर से बीते ढाई वर्षों से लगातार विवादों में था। जानकारों का कहना है कि अवैध खनन की सीबीआइ जांच हुई तो प्रजापति उसकी जद में आ सकते हैं। इसीलिए मुख्यमंत्री ने ऐन चुनाव के पहले उनसे तौबा कर ली। वहीं पंचायती राजमंत्री राजकिशोर सिंह पर अपने विभाग में हुई भर्ती में गड़बड़ी के आरोप लगते रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य विवादों में उनका नाम आने के बाद उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।  प्रदेश के दो मंत्रियों की बर्खास्तगी पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता आइपी सिंह ने कहा कि 2012 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के बाद सत्रह महीने तक खनन विभाग मुख्यमंत्री के पास रहा। उसके बाद गायत्री प्रसाद प्रजापति को इस विभाग की जिम्मेदारी दी गई। इस दौरान प्रदेश में हजारों करोड़ रुपये का अवैध खनन किया गया। जिसकी जानकारी प्रदेश सरकार को भलीभांति थी। उसके बाद भी उक्त मंत्री के खिलाफ इसलिए कोई कार्रवाई नहीं की गई क्योंकि वे समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठतम नेता के बेहद अजीज माने जाते थे। अवैध खनन की सीबीआइ जांच के अदालती आदेश के तुरंत बाद प्रजापति को हटाना कई सवालों को जन्म देता है। इन सवालों की जद में आने से न ही सपा सरकार बच सकती है और न ही पार्टी।

कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि गायत्री प्रजापति को सपा के एक वरिष्ठतम नेता का संरक्षण प्राप्त था। यह बात किसी से छिपी नहीं है। इसी वजह से उत्तर प्रदेश में मनमाने तरीके से अवैध खनन किया गया जिसने प्रदेश के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। अवैध खनन पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के सीबीआइ जांच के आदेश के बाद खनन मंत्री की बर्खास्तगी इस बात का प्रमाण है कि सरकार में कई लोग खुद को बचाने की कोशिश में हैं।  वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के विक्रम राव ने प्रदेश के दो मंत्रियों की बर्खास्तगी के मुख्यमंत्री के एलान को इलाहाबाद हाई कोर्ट के दबाव में उठाया गया कदम करार दिया। उन्होंने कहा कि यदि इन मंत्रियों की बर्खास्तगी राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम होती तो बेहतर होता। राव ने सवाल उठाया कि देखना यह है कि कब तक इन दोनों मंत्रियों की बर्खास्तगी रहती है। इसके पूर्व भी अखिलेश यादव ने अपने कई मंत्रियों को बर्खास्त किया और कुछ समय बाद उन्हें फिर मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया।  हालांकि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा ने इस फैसले पर कहा कि समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार में भ्रष्टाचार की कोई जगह नहीं है। मुख्यमंत्री का यह फैसला स्वागत योग्य और सराहनीय है।

बदमानी से बचने के लिए

अखिलेश सरकार को आशंका थी कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुई सीबीआइ जांच के लपेटे में खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति भी आ सकते हैं। इसलिए चुनाव के वक्त किसी तरह की बदनामी से बचने के लिए सरकार ने उनको चलता कर दिया। हालांकि सरकार ने पुरजोर कोशिश की कि सीबीआइ जांच हो ही नहीं। पर इस बाबत उसकी अर्जी हाई कोर्ट में खारिज हो गई। बर्खास्तगी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के इसी फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरे बर्खास्त मंत्री राजकिशोर सिंह पर भ्रष्टाचार और जमीन हड़पने के आरोप लगे थे। वे सपा की पिछली सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं।

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