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शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने पेश किया आधुनिक निकाहनामा, महिलाओं को भी मिलेगा तलाक देने का हक

मुस्लिम महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के 'पर्सनल लॉ' में निहित तीन तलाक और बहुविवाह जैसे नियमों पर रोक लगाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है और यह मामला अभी पेंडिंग।

Author September 10, 2016 11:37 AM
मौलाना यासूब अब्बास आॅल इंडिया शिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष कल्बे सादिक को आधुनिक निकाहनामा सौंपते हुए। (Photo Source: Express Photo by Pramod Adhikari)

इस्लाम में पति के तीन बार तलाक देने के नियम को लेकर देश में छिड़ी बहस के बीच ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपना आधुनिक निकाहनामा पेश किया है। शिया पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से पेश किए गए इस नए निकाहनामे में महिलाओं को समान अधिकार देते हुए पत्नी को भी तलाक देने का हक दिया गया है। आल इंडिया शिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास ने आधुनिक निकाहनामें के फाइनल प्रारूप को बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. कल्बे सादिक को सौंप दिया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. कल्बे सादिक ने आधुनिक निकाहनामें को मंजूरी दे दिया है और बोर्ड के अन्य सदस्यों के साथ बातचीत के बाद इसे लागू कराने का भरोसा दिया है।

मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि इस्लाम में पुरुषों व महिलाओं को बराबर हक है। इसलिए शिया पर्सनल लॉ बोर्ड जल्द सुलतानुल मदारिस में सदस्यों की बैठक कर तीन तलाक सहित अन्य मसलों पर हल निकालने की कोशिश करेगा। मौलाना ने कहा कि वर्ष 2007 के मुंबई अधिवेशन में बोर्ड ने पहली बार निकाहनामा पेश किया था। शिया समुदाय में निकाह के लिए गवाह की जरूरत नहीं होती है, लेकिन जब तलाक का मामला आता है तो गवाह जरूरी हो जाता है।

गौरतलब है कि महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस्लाम में पति के तीन तलाक के नियम को सामाजिक विसंगति और महिलाओं के साथ नाइंसाफी बताया था तथा इसे असंवैधानिक करार दिए जाने की मांग की थी। महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ‘पर्सनल लॉ’ में निहित तीन तलाक और बहुविवाह जैसे नियमों पर रोक लगाने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया है और यह मामला अभी पेंडिंग।

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वहीं, सुन्नी मुस्लिमों की संस्था ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने विगत 2 सितंबर को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस में हलफनामा देकर कहा था कि सामाजिक सुधार के नाम पर ‘पर्सनल लॉ’ को बदला नहीं जा सकता। हलफनामे में कहा गया था कि यदि फौरन तलाक के नियम को बदला जाता है तो इससे पतियों द्वारा बेवफा पत्नियों की हत्या करने का खतरा बढ़ जाएगा। हलफनामे में बहुविवाह प्रथा का भी बचाव किया गया था और कहा था कि तलाक की वैधता तय करना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार में नहीं है। मुस्लिम पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके, बल्कि यह कुरआन से लिया गया है। यह इस्लाम धर्म से संबंधित सांस्कृतिक मुद्दा है। मुस्लिम महिला संगठनों ने आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के इस रुख को इस्लाम और महिला विरोधी बताया था।

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