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मुसलमानों के वोट पाने को मायावती ने अपने करीबी मुस्लिम नेता के बेटे को बनाया चेहरा

उत्‍तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती मुस्लिमों को अपने साथ लेने के लिए नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे अफजल सिद्दीकी की मदद ले रही हैं।

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बसपा नेता नसीमुद्दीन के बेटे अफजल सिद्दीकी(बाएं)।

उत्‍तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती मुस्लिमों को अपने साथ लेने के लिए पूरा जोर लगा रही हैं। इसके लिए वह पार्टी के मुस्लिम चेहरे नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बेटे अफजल सिद्दीकी की मदद ले रही हैं। 28 साल के अफजल पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में बसपा के प्रचार में लगे हुए हैं। वे मुजफ्फरनगर दंगों और शामली व दादरी में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मारने के मुद्दों के जरिए सत्‍तारूढ़ समाजवादी पार्टी पर हमला बोलते हें। अपनी रैलियों में वे कहते हैं, ”समाजवादियों का वास्‍तविक चेहरा सामने आ गया है। उनके पास मत जाओ। ना भूले हैं ना भूलनें देंगे। आप लोगों को लव जिहाद और गौ हत्‍या के नाम पर पीटा गया। अब एक होने का समय है। यह आपकी मौजूदगी की लड़ाई है।” अफजल चार साल पहले मायावती के साथ हुए थे। 2012 विधानसभा चुनावों में मायावती की रैलियों की जिम्‍मेदारी उनके पास ही थी। हालांकि बसपा को उस समय हार झेलनी पड़ी थी लेकिन अफजल के सांगठनिक कौशल से मायावती काफी प्रभावित हुईं।

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नोएडा से लॉ की पढ़ाई करने वाले अफजल इस बार बसपा के मुस्लिमों को साथ लेने के अभियान के मुखिया हैं। उन्‍हें आगरा, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद और बरेली में मुसलमानों को बसपा से जोड़ने का जिम्‍मा दिया गया है। इन छह मंडलों में कुल 140 विधानसभा सीटें हैं। पश्चिमी यूपी के मुस्लिम बहुल इलाकों में कई सीटों पर उनका वोट प्रतिशत 70 तक है। बसपा इसे अपने पाले में लाने पर काम कर रही है। इस बार के चुनावों में बसपा ने 125 मुसलमानों को उम्‍मीदवार बनाया है और इनमें से आधे प्रत्‍याशी पश्चिमी यूपी में हैं। उदाहरण के तौर पर बिजनौर जिले की आठ में छह सीटों पर बसपा ने मुसलमानों को खड़ा किया है। बाकी की दो सीटें आरक्षित हैं।

अफजल सिद्दीकी के रणनीतिकारों का मानना है कि मुसलमानों ने पहले भी मायावती को वोट किया है लेकिन एक बड़ा हिस्‍सा सपा को गया है। बसपा को यह बात पता है कि यूपी के कुल मतों के 40 प्रतिशत मुसलमान और दलित हैं और ये साथ आने पर खेल बदला जा सकता है। रैलियों के दौरान अफजल पूछते हैं, ”बसपा ने 2009 में पांच मुसलमानों को लोकसभा भेजा। 2014 में मुसलमानों का एक भी सांसद नहीं है। क्‍या आप अगले साल विधानसभा में भी एक भी मुस्लिम विधायक नहीं चाहते?” वे साथ ही याद दिलाते हैं कि मायावती के मुख्‍यमंत्री काल के दौरान मदरसा अध्यापकों को हज के पेड लीव मिलती थी जो कि अखिलेश यादव के कार्यकाल के समय हटा ली गई।

चुनावों में अब कुछ ही महीने रह गए हैं। इसलिए अफजल हर रोज प्रत्‍येक मंडल में रैली करते हैं। पिछले सप्‍ताह उन्‍होंने सहारनपुर, बिजनौर, मेरठ और गाजियाबाद में रैली की। अफजल की स्‍कूली पढ़ाई देहरादून में बोर्डिंग स्‍कूल में हुई। इसके बाद नोएडा में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उन्‍होंने मांस निर्यात का काम शुरू कर दिया। यहां उन्‍हें सेना से भी सप्‍लाई कॉन्‍ट्रेक्‍ट मिला। यूपी और हरियाणा में उनका कत्‍लखाना है और हाल ही में उन्‍होंने नोएडा मॉल में दुकान खोली है। अफजल अपने साथ 20 विश्‍वस्‍त लोग रखते हैं। ये सब मिलकर बसपा के लिए सोशल मीडिया पर भी काम करते हैं। अफजल ने 2014 में फतेहपुर सीटर से लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन उन्‍हें हार झेलनी पड़ी थी।

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