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हार के बाद साथ होंगे बुआ और भतीजा!, लालू की रैली में शामिल होने के लिए दोनों नेताओं ने दी रजामंदी!

सपा और बसपा के एक मंच पर साथ आने को राजनीतिक हलकों में सूबे की राजनीति के एक नए दौर के उभार के रूप में देखा जा रहा है।

Author लखनऊ | June 8, 2017 12:46 AM
बसपा सुप्रीमो मायावती (बाएं) और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव।

उत्तर प्रदेश के हाल में संपन्न विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद बदले राजनीतिक माहौल में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अगस्त में पटना में होने वाली राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की रैली में मंच साझा कर नई संभावनाओं की इबारत लिखती नजर आएंगी। राजद की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अशोक सिंह ने बुधवार को को बताया कि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा मुखिया मायावती ने 27 अगस्त को पटना में होने वाली लालू की रैली में शामिल होने के लिए रजामंदी दे दी है। राजद प्रमुख लालू यादव ने इन दोनों नेताओं को इस रैली में शामिल होने के लिए हाल में फोन भी किया था। सिंह ने बताया कि सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को भी रैली में लाने की कोशिशें की जा रही हैं। 1993 में प्रदेश में मिल कर सरकार बनाने वाली सपा और बसपा के बीच दूरियां चर्चित ‘गेस्ट हाउस कांड’ के बाद इस कदर बढ़ गई कि उन्हें एक नदी के दो किनारों की संज्ञा दी जाने लगी। माना जाने लगा कि अब ये दोनों दल एक-दूसरे से कभी हाथ नहीं मिलाएंगे, लेकिन इसे सियासी तकाजा कहें, या फिर समय का फेर, इन दोनों दलों के नेता अब मंच साझा करने को तैयार हो गए हैं।

सपा और बसपा के एक मंच पर साथ आने को राजनीतिक हलकों में सूबे की राजनीति के एक नए दौर के उभार के रूप में देखा जा रहा है। खासकर 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के हाथों करारी शिकस्त ने इन दोनों दलों को साथ आने के बारे में सोचने पर मजबूर किया है।
सिंह ने बताया कि अगस्त में होने वाली रैली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के भी शिरकत करने की संभावना है। उन्होंने बताया कि राजद प्रमुख बाकी पेज 10 पर लालू ने तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी, बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी मुखिया शरद पवार और समान विचारधारा वाले अन्य दलों के नेताओं को भी रैली में शिरकत के लिए आमंत्रित किया है। द्रमुक नेता एमके स्टालिन इस रैली में हिस्सा लेने के लिए पहले ही रजामंदी दे चुके हैं।सिंह ने बताया कि इस कवायद का मकसद बिहार की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ मजबूत महागठबंधन को खड़ा करना है। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक राजनीतिक लिहाज से बेहद संवेदनशील उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा अगर एक साथ आती हैं तो यह सूबे में भाजपा के अप्रत्याशित उभार को रोकने की दिशा में कारगर हो सकता है।

बसपा हाल के विधानसभा चुनाव में कुल 403 में से मात्र 19 सीटें ही जीत सकी थी। 1992 के बाद यह उसका सबसे खराब प्रदर्शन है। तब उसे 12 सीटें हासिल हुई थीं। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 80 सीटें जीती थीं। वहीं, सपा भी इस बार महज 47 सीटों पर सिमट गई, जो उसका अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है।पिछले विधानसभा चुनाव में सपा का वोट फीसद 21.8 था, वहीं बसपा का 22.2 फीसद रहा था। बसपा ने जहां सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ा था, वहीं सपा ने अपने सहयोगी दल कांग्रेस के लिए 105 सीटें छोड़ी थीं। विधानसभा चुनाव में भाजपा और उसके सहयोगी दलों के कुल 403 में से 325 सीटें जीत लेने से विपक्ष बेहद कमजोर हो गया है। ऐसे में सपा और बसपा के गठबंधन के स्वर तेज हो गए हैं।

नए सियासी समीकरण के आसार

1993 में उत्तर प्रदेश में मिल कर सरकार बनाने वाली सपा और बसपा के बीच दूरियां चर्चित ‘गेस्ट हाउस कांड’ के बाद इस कदर बढ़ गई कि उन्हें एक नदी के दो किनारों की संज्ञा दी जाने लगी। माना जाने लगा कि अब ये दोनों दल एक-दूसरे से कभी हाथ नहीं मिलाएंगे, लेकिन इसे सियासी तकाजा कहें, या फिर समय का फेर, इन दोनों दलों के नेता अब मंच साझा करने को तैयार हो गए हैं। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव को भी रैली में लाने की कोशिशें की जा रही हैं।

 

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