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यूपी: टिकट मिलने की आस नहीं, सपा-बसपा का साथ छोड़ भाग रहे नेता

उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा का गठबंधन होने के बाद दोनों दल के नेता जिनकी सीट दूसरी पार्टी के खाते में चल गई है, वे अन्य संभावनाओं की तलाश में हैं। वे भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य दलों में शामिल हो रहे हैं।

लखनऊ में प्रचार सामग्री की एक दुकान की तस्वीर। (Express Photo by Vishal Srivastav)

Loksabha Election 2019: आगामी लोकसभा चुनाव की घोषणा होने में अब बस कुछ ही समय शेष है। पार्टियों का गठबंधन लगभग बन चुका है। सीटें भी तय होने को है। सिर्फ उम्मीदवारों की घोषणा नहीं हुई है। सबसे ज्यादा लोसकभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और रालोद के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। गठबंधन के साथ-साथ कौन पार्टी किस सीट से चुनाव लड़ेगी, यह भी तय हो चुका है। लेकिन चुनाव से पहले सपा और बसपा में भगदड़ मच गई है। पहले से टिकट की आस लगाए जिन नेताओं को गठबंधन के बाद उम्मीदवार न बनाए जाने का डर लग रहा है, वे कांग्रेस, भाजपा और शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी में संभावनाएं तलाशने में जुट गए हैं।

पूर्व सांसद और समाजवादी नेता राकेश सच्चन बीते 2 मार्च को कांग्रेस में शामिल हो गए। ईटी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, “मुझे अखिलेश यादव द्वारा फतेहपुर सिकरी सीट से तैयारी करने को कहा गया था। चुनाव को लेकर मैं पिछले एक साल से क्षेत्र में काम कर रहा था। लेकिन अब गठबंधन बनने के बाद यह सीट बसपा के खाते में चली गई है।” संभावना जताई जा रही है कि कांग्रेस सच्चन को फतेहपुर सिकरी से उम्मीदवार बना सकती है।

इसी तरह बस्ती लोकसभा सीट की बात करें तो यहां से पिछले लोकसभा चुनाव में सपा नेता ब्रज किशोर सिंह भाजपा के हरिश द्विवेदी से लगभग 35 हजार मतों से पराजित हुए थे। इस बार यह सीट बसपा के खाते में चली गई है। कहा जा रहा है कि ब्रज किशोर सिंह की भाजपा से बातचीत चल रही है। वहीं, इसी साल जनवरी महीने में सपा नेता शिव कुमार बेरिया शिवपाल यादव की पार्टी में शामिल हो गए थे। संभावना जताई जा रही है कि वे पीएसपी के टिकट पर मिसरिख सीट से चुनाव लड़ सकते हैं।

सिर्फ सपा में ही नहीं, बल्कि बसपा के नेता भी संभावना की तलाश में इधर-उधर जा रहे हैं। सीतापुर से पूर्व बसपा सांसद कैसर जहां 4 मार्च को कांग्रेस में शामिल हो गई। कैसर वर्ष 2009 में सीतापुर से सांसद बनी थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के राजेश वर्मा ने उन्हें करीब 50 हजार वोट से पराजित किया था।

जालौन सीट से बसपा ने विधायक अजय अहिरवार को अपना उम्मीदवार घोषित करने की तैयारी में है। इसके बाद जालौन के पूर्व सांसद घनश्याम अनुरागी बसपा के बाहर दूसरे विकल्प की तलाश में हैं। अनुरागी इस सीट से 2009 में सांसद चुने गए थे। वहीं, 2014 के चुनाव में वे तीसरे स्थान पर रहे थे। भाजपा के भानु प्रताप वर्मा इस सीट से विजयी हुए थे। संभावना जताई जा रही है कि यदि भाजपा अपने वर्तमान सांसद का टिकट काटती है तो अनुराग को बीजेपी प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारा जा सकता है।

अलीगढ़ में बसपा अजीत बल्यान को मैदान में उतारने की तैयारी में है। वहीं, पूर्व विधायक मुकुल उपाध्याय भी यहां से चुनाव लड़ना चाह रहे थे। स्थिति को भांपते हुए उपाध्याय फरवरी के अंतिम सप्ताह में भाजपा में शामिल हो गए। आगरा से बसपा मनोज सोनी को मैदान में उतार सकती है। सोनी वर्ष 2014 के चुनाव में हथरस से चुनाव लड़ी थी। पार्टी उन्हें दुबारा मौका देना चाह रही है।

हथरस सीट सपा के खाते में जाने की वजह से सोनी को आगरा शिफ्ट किया गया। इसका परिणाम ये हुआ कि आगरा के कई नेताओं ने इसकी खिलाफत कर दी। वर्ष 2009 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले कुंवर चंद वकील को सोनी के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से इस साल फरवरी महीने में पार्टी से निलंबित कर दिया गया। संभावना जताई जा रही है कि वे कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं और आगरा से चुनाव लड़ सकते हैं।

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