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काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्टः मंदिर से घाटों के बीच सुविधा बढ़ाने की जंग में मलबा बनी दलित बस्ती

कनौजिया कहते हैं, 'जिसे अपना घर कहते थे, अब उसका अस्तित्व ही नहीं रहा। अब वहां सिर्फ टूटे घरों का मलबा है। इस जगह को आनंद वन के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन काशीवासियों में अब कोई आनंद रहा ही नहीं।'

Author Published on: April 4, 2019 1:14 PM
मणिकर्णिका घाट और ललिता घाट के बीच दलित बस्ती (Photo- Adrija Roychowdhury)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में शुरू हुए काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट के चलते कई लोगों के घर उनकी आंखों के सामने ध्वस्त हो गए। मणिकर्णिका घाट और ललिता घाट के बीच स्थित दलित बस्ती में रहने वाले रचित कनौजिया कभी भी अपने आशियाने की ऐसी तस्वीर नहीं देखना चाहते थे। इस क्षेत्र में उनका परिवार करीब छह पीढ़ियों से रह रहा था। अरसे से जिसे वे अपना घर कहते थे, अब उसका अस्तित्व ही नहीं रहा। अब जो वहां बचा था, वह सिर्फ टूटे हुए घरों का मलबा है। कनौजिया कहते हैं कि इस जगह को आनंद वन के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन काशीवासियों में अब कोई आनंद रहा ही नहीं।

गौरतलब है कि काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट ने मार्च में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट को रास्ता देने के लिए लोगों से अपने घर छोड़ने को कहा था। इस प्रोजेक्ट का मकसद यात्रियों को काशी विश्वनाथ मंदिर से गंगा के घाटों तक पहुंचने के लिए सीधा रास्ता उपलब्ध कराना है। कनौजिया का घर उन 230 घरों में शामिल है, जिन्हें गिरा दिया गया। शहर से करीब 10 किमी दूर रह रहे कनौजिया कहते हैं, ‘हमें कहा गया था कि मुआवजा दिया जाएगा और हमारी बात सुनी जाएगी, लेकिन जो मुआवजा मिला, उससे हम खुश नहीं हैं। हमें शहर से दूर ले जाकर गांवों में बसा दिया गया। जब से घर टूटे हैं, रोजगार भी चला गया। अगर सरकार नौकरी दे नहीं सकती तो हमें हमारे रोजगार से दूर भी नहीं करना चाहिए।’

मंदिर ट्रस्ट के सीईओ विशाल सिंह कहते हैं, ‘मूल मकसद नदी से मंदिर तक के रास्तों की चौड़ाई बढ़ाना था, ताकि श्रद्धालुओं को सहूलियत हो। मकान मालिकों को घर की कीमत का दोगुना और किराएदारों को अधिकतम 10-10 लाख रुपए मुआवजा दिया गया।’ बता दें कि जलासेन घाट की इस दलित बस्ती में लोग कई तरह के व्यवसाय करते थे। इनसे पुक्का महल (मध्यकालीन दौर में गंगा के पश्चिमी घाटों के किनारे बनी कॉलोनी) में रहने वाले लोगों की दैनिक जरूरतें पूरी होती थीं। बीएचयू में हिंदी के प्रोफेसर डॉ. रामाज्ञा शशिधर के मुताबिक, यहां रहने वालों में मल्लाह, डोम आदि समुदायों की आमदनी गंगा किनारे होने वाले कामों से ही जुड़ी है।

dalit-colony-1 230 टूटे घरों में कनौजिया का घर भी शामिल था (Photo- Adrija Roychowdhury)

सेवानिवृत्त कर्मचारी आरपी सिंह बताते हैं, ‘दलित कभी भी काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास नहीं रहे, इसलिए यहां उनकी जड़ें उतनी मजबूत नहीं हैं। वाराणसी के आसपास के ग्रामीण इलाकों में आज भी दलित और उच्च जाति के लोग अलग-अलग रहते हैं।’

बीजेपी कार्यकर्ता रजनीश सिंह कहते हैं कि कॉरिडोर के चलते किसी को समस्या नहीं होगी। उन्होंने कहा, ‘मैं आपको चुनौती देता हूं। आपको ऐसा एक भी शख्स नहीं मिलेगा, जिसे अपना घर टूटने को लेकर किसी भी तरह का दुख होगा।’ वहीं, कनौजिया कहते हैं, ‘शुरुआत में हमसे वादा किया गया था कि हमारी पसंद के इलाके में पुनर्वास होगा और पर्याप्त मुआवजा मिलेगा। हमें मुआवजा दिया गया, लेकिन पुनर्वास को लेकर कुछ नहीं कहा जा रहा।’

kashi-vishwanath-corridor-1 काफी विश्वनाथ कॉरिडोर के लिए हुआ अधिग्रहण (Photo- Adrija Roychowdhury)

डॉक्टर शशिधर कहते हैं, ‘विश्वनाथ मंदिर के आसपास जिन लोगों को मुआवजा मिला उनमें ज्यादातर बड़े सेठ हैं जिनके पुराने घर हैं। दलितों के घर भी उनकी तुलना में छोटे हैं ऐसे में उन्हें मिलने वाला मुआवजा भी कम है। सबसे बड़ी बात यह है कि दलित समुदाय के लोग अपना घर छोड़ना भी नहीं चाहते थे क्यों कि इसका सबसे ज्यादा असर उन्हीं पर पड़ेगा। वे यहां स्वाभिमान के साथ जीवन यापन कर रहे थे। उनके सामने नए गांवों में जाकर घर बसाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।’

वाराणसी डिविजन के कमिश्नर दीपक अग्रवाल कहते हैं, ‘यह अधिग्रहण जबर्दस्ती नहीं किया गया था। सरकार संपत्ति खरीद रही है। यह दो पक्षों के बीच आपसी समझौता है। अगर कोई विशेष मामला है तो वे मेरे पास आ सकते हैं। हम नई दरों के मुताबिक मुआवजे का भुगतान कर रहे हैं। बाजार कीमतों से करीब दोगुने मुआवजे को मंजूरी दी गई है।’

मंदिर ट्रस्ट के सीईओ विशाल सिंह के मुताबिक, ‘मंदिर की तरफ से किसी को संगठित रोजगार नहीं दिया जाता था। फिर भी हम रोजगार दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। अब तक करीब 150 लोगों को रोजगार दिया जा चुका है। कुछ लोगों को घाट के नजदीक ही बसाने की कोशिश की जा रही है, ताकि उनका काम चलता रहे।’

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