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गरम और नरम विचारधारा का गढ़ था कानपुर – राष्ट्रपति

राष्ट्रपति ने कहा झंडागीत के रचयिता श्यामलाल गुप्त जी का जन्म नर्वल में 09 सितम्बर 1896 को हुआ था। वह राष्ट्र पिता महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से देश की आजादी के संघर्ष में शामिल हुए।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद शनिवार को अपने शहर कानपुर पहुंचे और गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कालेज, चन्द्रशेखर आजाद कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों को संबोधित किया।

देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजादी के समय तक कानपुर का अहम योगदान रहा। यह देश का ऐसा पहला शहर है जहां स्वतंत्रता आंदोलन में गरम और नरम विचारधारा को यहां की जनता ने भरपूर सहयोग दिया। यही नहीं इसी शहर से पढ़-लिखकर निकले स्व0 अटल बिहारी बाजपेयी जी देश के प्रधानमंत्री बने और आज मैं खुद इसी शहर से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच गया। यह बातें शनिवार को कानपुर प्रवास पर आये राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने झण्डा गीत के रचयिता व स्वतंत्रता सेनानी श्याम लाल गुप्त पार्षद को याद करते हुए कही। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद शनिवार को अपने शहर कानपुर पहुंचे और गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल कालेज, चन्द्रशेखर आजाद कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों को संबोधित किया।

इसके बाद कानपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर स्वतंत्रता सेनानी और झण्डा गीत के रचयिता श्याम लाल गुप्त पार्षद के गांव नर्वल पहुंचे। यहां पर सबसे पहले राष्ट्रपति ने पार्षद की मूर्ति का अनावरण किया फिर उनके नाम से बने पुस्तकालय व द्वार का अनावरण किया। इसके बाद राष्ट्रपति ने जनता को संबोधित करते कानपुर का जमकर बखान किया करें भी क्यों न वह भी तो कानपुर के रहने वाले हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि आज़ादी के आन्दोलन में कानुपर नगर का विशेष योगदान रहा है। यह नगर प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान नाना साहब, अज़ीम-उल्ला खाँ और तात्या टोपे की कर्म-भूमि रहा। यहीं पर गणेश शंकर विद्यार्थी ने साम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए अपना बलिदान दिया था।

कानपुर नगर की गिनती आजादी की लड़ाई में शामिल उन चुनिंदा नगरों में की जाती है जहां पर नरम और गरम-दोनों विचार-धाराओं को जनता से भर-पूर सहयोग मिला। शचीन्द्र नाथ सान्याल ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकिन आर्मी की रूप-रेखा यहीं पर बनाई थी। चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह को भी कानपुर ने अपनाया था। यहां पर प्रकाशित ‘प्रताप’ और ‘वर्तमान’ जैसे जागरूक समाचार-पत्रों ने जन-जागरण के माध्यभम से आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाया।यहीं पर छैल बिहारी दीक्षित ‘कंटक’ और बाल कृष्ण शर्मा ‘नवीन’ ने अपनी देशभक्तिपूर्ण रचनाओं से स्वाधीनता संग्राम सेनानियों का हौसला बढ़ाया। यशस्वी पूर्व प्रधानमंत्री और भारत-रत्न से अलंकृत स्व0 अटल बिहारी बाजपेयी ने भी कानपुर में शिक्षा ग्रहण की थी। इसी जिले ने लोकप्रिय झंडागीत देश को दिया और यह कानपुर की धरती का ही आशीर्वाद है कि मुझे, सर्वोच्च पद रहते हुए देश की सेवा का सुअवसर प्राप्त हुआ।

गांधी जी की प्रेरणा से आजादी के संघर्ष में शामिल हुए पार्षद

राष्ट्रपति ने कहा झंडागीत के रचयिता श्यामलाल गुप्त जी का जन्म नर्वल में 09 सितम्बर 1896 को हुआ था। वह राष्ट्र पिता महात्मा गांधी और लोकमान्य तिलक की प्रेरणा से देश की आजादी के संघर्ष में शामिल हुए। उन्होंने असहयोग आन्दोलन और नमक सत्याग्रह जैसे अनेक आन्दोलनों में हिस्सा लिया और आठ बार जेल गए। ऐसा कहा जाता है कि राष्ट्र प्रेम और कविता के गुण गुप्त में बचपन से ही थे। पांचवीं कक्षा में पढ़ते हुए ही उन्होंने अपनी पहली कविता लिख ली थी। वह रामायण यानि कि रामचरित मानस के मर्मज्ञ थे।

अंग्रेजों की छोड़ी थी नौकरी

राष्ट्रपति ने कहा कि श्यामलाल गुप्त अपने हक के लिए संघर्ष करने से पीछे नहीं हटते थे और बन्धन में रहना उन्हें पसन्द नहीं था। संभवतः इसी कारण उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़ दी थी। अपने देशवासियों की हालत देखकर पार्षद बेचैन हो उठते थे। इसलिए देश की जनता को जागृत करने के लिए युवावस्था में ही उन्होंने संघर्ष और आन्दोलन का मार्ग अपनाया।

देश की अस्मिता का प्रतीक होता है राष्ट्रीय झण्डा

राष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय झंडा किसी भी देश की अस्मिता का प्रतीक होता है। इसीलिए गांधी जी के नेतृत्व में देश जब आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब आंदोलनकारियों में जोश भरने के लिए एक झंडा तैयार किया गया। लेकिन इस झंडे के लिए कोई जोशीला गीत तैयार नहीं हो पाया था। अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी ने यह कमी महसूस की और उन्होंने ही युवा श्यामलाल से एक झंडा गीत तैयार करने के लिए कहा। उस समय आजादी का आंदोलन तेजी पर था। जलियांवाला बाग की स्मृति में कानपुर में एक बड़ा जलसा होने वाला था। राष्ट्र प्रेम के जोश से भरे युवा श्यामलाल ने 1924 में 3 मार्च की रात्रि में गीत लिखा- विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा। 13 अप्रैल 1924 को फूलबाग, कानपुर के मैदान में हजारों लोगों ने एक-साथ यह गीत गाया। आगे चलकर यह गीत देश-भर में झंडागीत के रूप में लोकप्रिय हुआ और देश की आजादी के आन्दोलन का अभिन्न अंग बन गया। आजादी के बाद, सन् 1952 में श्यामलाल गुप्त पार्षद ने स्वयं लाल किले से झंडागीत का गायन किया। स्वाधीनता संग्राम में उनके महान योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 1973 में उन्हे पद्मश्री से सम्मानित किया।

पूरा हो रहा पार्षद जी का सपना

श्यामलाल गुप्त पार्षद ने झंडागीत के माध्यम से देश को कई सन्देश दिए। उनका सपना था कि अपने देश को असमानता, गरीबी, अशिक्षा और भेद-भाव से भी आजादी मिले। स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद, इन लक्ष्यों को पूरा करने के प्रयास किए गए। देश ने नई-नई उपलब्धियां हासिल की। भारत सरकार ने पिछले चार वर्ष में देश के हर गांव तक रोशनी पहुंचाने का काम पूरा कर दिया है। ‘स्वंच्छाता अभियान’ के अंतर्गत 02 अक्तू्बर, 2014 के बाद से अब तक आठ करोड़ अरसठ लाख शौचालय बनाए जा चुके हैं। ढाई साल से कम समय में गरीब परिवारों की महिलाओं को उज्जंवला योजना के अंतर्गत रसोई गैस के पांच करोड़ से अधिक कनेक्शन मुफ्त में दिए गए हैं। बालिकाओं की शिक्षा के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, और युवाओं के लिए स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैण्ड अप इंडिया जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं।

गंगा के लिए कानपुर के लोगों से सहयोग की अपेक्षा

राष्ट्रपति ने कहा कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखना और उसका संरक्षण करना हमारी परम्परा रही है। नदियों के किनारे सभ्यताओं का विकास और पोषण हुआ है। गंगा, कानपुर के लिए और पूरे उत्तर भारत के लिए जीवन-दायिनी नदी है, हमारी सांस्कृतिक विरासत है और देश की पहचान है। इसीलिए तो कहते हैं कि ‘हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है’। इसे स्वच्छ और अविरल बनाए रखने से ही हमारा झंडा ऊॅंचा रह सकता है। भारत सरकार ने ‘नमामि गंगे’ के रूप में एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है। गंगा को निर्मल करने और उसे निर्मल बनाए रखने में कानपुर के लोगों के विशेष सहयोग की अपेक्षा है। कहा, आपसी सहयोग के साथ प्रयास किए जाएं तो बड़े से बड़े काम संभव हो जाते हैं।

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