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शादी से बचने के लिए दोस्त के घर तीन दिन कमरे में बंद रहे थे अटल बिहारी वाजपेयी

वाजपेयीजी के मित्र गोरे लाल त्रिपाठी के बेटे विजय प्रकाश कहते हैं कि जब वाजपेयी जी के माता पिता उनकी शादी के लिए लड़की देख रहे थे उस वक्त वाजपेयी जी पटारा ब्लॉक के रायपुर गांव में भागकर आ गये थे। यहां पर उनके दोस्त गोरे लाल त्रिपाठी का घर था।

Atal Bihari Vajpayee, former prime minister Atal Bihari Vajpayee, Vajpayee marriage, kanpur, kanpur dav college, Hindi news, News in Hindi, Jansattaउत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में कैंडल जलाकर पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देते स्कूली बच्चे (PTI Photo, Aug 17, 2018)

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी आजीवन कुंवारे रहे। शादी ना करने के पीछे उनका तर्क होता था कि वे पूरे समर्पण के साथ देश की सेवा करना चाहते थे। ऐसा नहीं है कि अटल बिहारी वाजपेयी की शादी के लिए उनके माता-पिता ने बात नहीं की। ऐसे ही एक मौके पर जब उनके माता-पिता शादी की बात करना चाह रहे थे तो अटलजी ने खुद को एक कमरे में तीन दिनों तक कैद कर लिया था। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 1940 में वाजपेयी कानपुर के डीएवी कॉलेज में पीजी स्टूडेंट थे। वाजपेयीजी के मित्र गोरे लाल त्रिपाठी के बेटे विजय प्रकाश कहते हैं कि जब वाजपेयी जी के माता पिता उनकी शादी के लिए लड़की देख रहे थे उस वक्त वाजपेयी जी पटारा ब्लॉक के रायपुर गांव में भागकर आ गये थे। यहां पर उनके दोस्त गोरे लाल त्रिपाठी का घर था।

गोरे लाल त्रिपाठी से वाजपेयी की दोस्ती तब हुई थी जब दोनों संघ की शाखाओं में जाया करते थे। विजय प्रकाश कहते हैं, “मेरे पिता मुझे कहा करते थे कि अटल जी ने खुद को अतिथियों के लिए बने कमरे में बंद कर लिया था, वे तीन दिनों तक बाहर नहीं आए, अटल जी ने मेरे पिता जी को कहा कि कमरा बाहर से बंद कर दिया जाए, ताकि किसी को पता नहीं चल पाए, जब भी उन्हें खाना या पानी या फिर टॉयलेट जाने की जरूरत होती थी वे दरवाजा खटखटाते थे।”

जब गोरेलाल ने उनसे पूछा कि वे शादी से कन्नी क्यों काट रहे हैं, वाजपेयी ने उनसे कहा कि वे अपना जीवन देश को समर्पित करना चाहते हैं और शादी इसमें बाधा डाल सकता है। ये वो वक्त था जब वाजपेयी जी आरएसएस के नजदीक आ रहे थे। विजय प्रकाश कहते हैं कि उनके पिता जी अक्सर वाजपेयी से जुड़े किस्से उन्हें सुनाते रहते थे। विजय प्रकाश के मुताबिक वाजपेयी जब राष्ट्रीय नेता बन गये उस वक्त भी वे अपने दोस्त के परिवार वालों को याद रखते थे। विजय बताते हैं, “मैं उनसे 1989 में लखनऊ में मिला था, तब वो राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष थे, मैंने उनसे खुद की नौकरी के सिलसिले में मदद मांगी, हालांकि उन्होंने कोई वादा तो नहीं किया था, लेकिन उन्हीं की कोशिशों की वजह से मुझे कानपुर स्थित एक पत्रिका में नौकरी मिल सकी।” विजय कहते हैं कि वाजपेयी जी को कानपुर के लोगों से बड़ा प्रेम था। वे यहां शादियों और पार्टियों में शिरकत करते थे।

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