Kannauj: The Art of Fragrance: किसी शहर की पहचान उसकी इमारतों, बाजारों या इतिहास से होती है। कन्नौज की पहचान में एक ऐसी चीज भी शामिल है, जिसे देखा नहीं जा सकता – सुगंध। यहां फूलों, वनस्पतियों और मिट्टी तक से खुशबू निकालने की एक ऐसी कारीगरी आज भी मौजूद है, जिसमें मशीन से ज्यादा महत्व कारीगर के अनुभव का है।
कन्नौज के पारंपरिक इत्र की पहचान उसकी डेग-भपका विधि से होती है। इसमें प्राकृतिक सुगंध वाले फूल या दूसरी वनस्पतियां पानी के साथ तांबे की डेग में रखी जाती हैं। डेग को भट्ठी पर गर्म किया जाता है। गर्मी से उठने वाली सुगंधित भाप एक नली के रास्ते भपके में पहुंचती है, जहां वह बेस ऑयल के संपर्क में आती है और उसकी खुशबू उसमें समाती जाती है। आग की आंच, पानी की मात्रा, तापमान और समय का संतुलन इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यहीं से कन्नौज के इत्र की कहानी सिर्फ खुशबू की कहानी नहीं रह जाती। यह हाथ के हुनर, धैर्य और पीढ़ियों से चले आ रहे अनुभव की कहानी बन जाती है।
खुशबू बनाने का हुनर
कन्नौज की इत्र परंपरा को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक दावे मिलते हैं। कुछ स्रोत इसे भारत की बहुत पुरानी सुगंध परंपराओं से जोड़ते हैं और कुछ शोध कन्नौज में इत्र निर्माण के लंबे इतिहास की चर्चा करते हैं। लेकिन किसी एक राजा या किसी एक निश्चित काल को आज की कन्नौज की इत्र-कारीगरी की शुरुआत मान लेना उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर आसान नहीं है।
इसलिए कन्नौज की कहानी को किसी एक ऐतिहासिक नाम से जोड़ने के बजाय उस कारीगरी की निरंतरता को देखना ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो लंबे समय से यहां के परिवारों और कारीगरों के बीच चलती आ रही है।
कन्नौज के इत्र उद्योग पर हुए अकादमिक अध्ययन में पारंपरिक इत्र बनाने वाले कारीगरों और इकाई संचालकों से बातचीत की गई। इसमें सामने आया कि इत्र बनाने का ज्ञान कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। यह ज्ञान केवल किसी किताब या प्रशिक्षण से नहीं आता। बहुत कुछ काम करते हुए, बड़ों को देखते हुए और वर्षों के अनुभव से सीखा जाता है।
डेग में कितनी आंच रखनी है, भाप के प्रवाह को कैसे नियंत्रित करना है, किस समय प्रक्रिया में बदलाव करना है और तैयार हो रही खुशबू को किस तरह संभालना है – इन सबमें कारीगर का अनुभव काम आता है।
यही वजह है कि डेग-भपका को केवल पुरानी तकनीक कहना इसके महत्व को कम कर देता है। यह एक ऐसा कौशल है जिसमें उपकरण पुराने हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सही ढंग से इस्तेमाल करने का ज्ञान हर पीढ़ी को सीखना पड़ता है।
फूलों से मिट्टी तक
कन्नौज के इत्र की दुनिया केवल गुलाब की खुशबू तक सीमित नहीं है। यहां बेला, चमेली, खस और दूसरे सुगंधित प्राकृतिक स्रोतों से भी इत्र तैयार किए जाते हैं। लेकिन इस परंपरा की सबसे अलग पहचान उन खुशबुओं में दिखाई देती है, जिनका स्रोत फूल नहीं, मिट्टी है। कन्नौज में मिट्टी से तैयार किया जाने वाला इत्र इस कारीगरी को एक अलग पहचान देता है। साधारण मिट्टी से निकलने वाली प्राकृतिक गंध को आसवन की पारंपरिक प्रक्रिया के जरिए इत्र में बदला जाता है। यानी जिस मिट्टी की खुशबू को हम आम तौर पर बारिश या गीली धरती से जोड़कर महसूस करते हैं, कन्नौज की कारीगरी उसे एक टिकाऊ सुगंध में बदलने की कोशिश करती है।
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कन्नौज के Fragrance and Flavour Development Centre (FFDC) के अनुसार पारंपरिक इत्र प्राकृतिक सुगंध वाले स्रोतों को डेग और भपका के जरिए बेस ऑयल पर आसवित (Distilled) करके तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण चीज शायद वही है जिसे किसी मशीन से पूरी तरह नहीं मापा जा सकता है यानी कारीगर का अनुभव।
खुशबू को थामने का हुनर
कन्नौज की पारंपरिक इत्र-निर्माण प्रक्रिया में चंदन का तेल लंबे समय से महत्वपूर्ण आधार रहा है। सुगंधित भाप जब भपके तक पहुंचती है तो वह बेस ऑयल में समाती जाती है। बार-बार की जाने वाली इस प्रक्रिया से खुशबू धीरे-धीरे तेल का हिस्सा बनती जाती है।
इसमें जल्दबाजी की गुंजाइश कम है। डेग की आग, भाप के प्रवाह और पूरी आसवन प्रक्रिया का संतुलन बिगड़ा तो तैयार होने वाली खुशबू भी बदल सकती है।
यही वह अंतर है जो पारंपरिक इत्र को सामान्य औद्योगिक सुगंध से अलग करता है। यहां किसी तैयार खुशबू को मिलाकर परिणाम हासिल करने के बजाय प्राकृतिक स्रोत से सुगंध निकालने की पूरी प्रक्रिया ही कारीगरी का हिस्सा है।
इस ज्ञान का एक हिस्सा लिखित हो सकता है, लेकिन बहुत कुछ अनुभव से आता है। इसी वजह से कन्नौज के इत्र की कहानी में डेग और भपका जितने महत्वपूर्ण हैं, उतने ही महत्वपूर्ण वे हाथ हैं जो वर्षों से उन्हें संभालते आए हैं।
पहचान मिली, चुनौती बाकी है
कन्नौज के इत्र को अब केवल स्थानीय पहचान नहीं माना जाता। भारत सरकार के भौगोलिक संकेतक यानी GI रजिस्टर में Kannauj Perfume पंजीकृत है। इसका आवेदन 2009 में दाखिल हुआ था और 31 मार्च 2014 को इसका पंजीकरण हुआ। लेकिन GI पहचान किसी परंपरा की कहानी का अंत नहीं है। असली सवाल यह है कि उस उत्पाद से जुड़ी कारीगरी कितने समय तक जीवित रहती है।
कन्नौज का इत्र उद्योग ऐसे समय में काम कर रहा है जब सुगंध की दुनिया तेजी से बदल रही है। बाजार में सिंथेटिक सुगंधों की मौजूदगी बढ़ी है, उपभोक्ताओं की पसंद बदली है और प्राकृतिक कच्चे माल की लागत भी एक चुनौती है। पारंपरिक इत्र को आधुनिक बाजार, बेहतर ब्रांडिंग और नए उपभोक्ताओं तक पहुंचने के सवालों से भी जूझना पड़ता है।
इसलिए कन्नौज की चुनौती केवल अपनी पुरानी विधि को बचाए रखना नहीं है। चुनौती यह भी है कि इस विधि से तैयार होने वाले इत्र के लिए बदलती दुनिया में जगह कैसे बनाई जाए।
परंपरा और विज्ञान के बीच
कन्नौज में इस सवाल का एक जवाब Fragrance and Flavour Development Centre यानी FFDC के रूप में दिखाई देता है। यह केंद्र सुगंध और फ्लेवर से जुड़े अनुसंधान, प्रशिक्षण, तकनीकी विकास और नवाचार पर काम करता है। इसका उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक अध्ययन से जोड़ना भी है।
इसका अर्थ यह नहीं कि डेग-भपका अब पुरानी चीज है और विज्ञान उसका स्थान लेने जा रहा है। बल्कि कोशिश यह है कि पारंपरिक कारीगरी को समझते हुए उसकी उपयोगिता और क्षमता को नए समय के लिए बेहतर बनाया जाए। किसी परंपरा के जीवित रहने का शायद यही सबसे स्वाभाविक रास्ता है।
क्योंकि विरासत वह नहीं जो किसी संग्रहालय में रख दी जाए और फिर उसके बारे में बताया जाता रहे। विरासत तब तक जीवित रहती है, जब तक कोई उसे अपने हाथों से करता रहे, अगली पीढ़ी उसे देखकर सीखे और बदलते समय में उसके लिए कोई नया रास्ता खोजता रहे।
कन्नौज की पहचान इसलिए केवल उन शीशियों में बंद खुशबू में नहीं है, जिनमें गुलाब, बेला या मिट्टी की महक समाई है। उसकी पहचान उस कारीगर के हाथों में भी है, जो आज भी डेग की आग और भपके के तापमान के बीच वह संतुलन तलाशता है, जिसे सिर्फ किसी मशीन के आंकड़े से नहीं समझा जा सकता।
उत्तर प्रदेश की पहचान केवल उसके स्मारकों, नदियों और पुराने शहरों में नहीं बची है। कभी-कभी वह एक कारीगर की डेग से उठती भाप में भी बची रहती है और खुशबू बनकर दूर तक चली जाती है।
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अवधी को आम तौर पर अवध क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका भाषाई विस्तार एक बड़े भूभाग में रहा है। लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अयोध्या, गोंडा, बहराइच, सीतापुर, फतेहपुर और आसपास के कई इलाकों में इसके अलग-अलग रूप मिलते रहे हैं। भाषा वैज्ञानिक विवरणों में भी अलग-अलग क्षेत्रों की अवधी के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाया गया है। सन 1904 में प्रकाशित ग्रियर्सन के इस सर्वेक्षण की खासियत यही थी कि उसने भाषा को एक ही रंग में रंगने के बजाय उसके क्षेत्रीय रूपों को अलग-अलग नमूनों में दर्ज किया। पूरी कहानी पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
