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कैराना उपचुनाव: अब भाजपा के खिलाफ जा रहा जातिगत समीकरण, खतरे में पड़ी सीट

बदले सियासी समीकरण में सपा, बसपा और रालोद अब एकसाथ हैं। इसलिए दलित, अल्पसंख्यक, जाट और अन्य पिछड़ी जातियों के वोटर्स लामबंद हो सकते हैं। ऐसी सूरत में बीजेपी के हाथ से इस साल तीसरी लोकसभा सीट भी छिन सकती है।

Author May 7, 2018 16:07 pm
अमित शाह, पीएम मोदी और योगी आदित्य नाथ (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

उत्तर प्रदेश के कैराना संसदीय और नूरपुर विधान सभा सीट पर 28 मई को होने वाले उप चुनाव के लिए सत्ताधारी बीजेपी और एकजुट विपक्ष ने कमर कस लिया है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी चहेती उम्मीदवार तबस्सुम हसन को राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के टिकट पर कैराना से उतारा है, जबकि नूरपुर से सपा नेता नईमुल हसन उम्मीदवार बनाए गए हैं। गठबंधन से पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी के बीच शुक्रवार को बैठक हुई और सहमति बनी। इस गठबंधन को मायावती की बसपा का भी समर्थन प्राप्त है जबकि माना जा रहा है कि कांग्रेस भी गठबंधन उम्मीदवार को समर्थन करेगी। ऐसी सूरत में गठबंधन प्रत्याशी तबस्सुम हसन की जीत की संभावना बढ़ गई है क्योंकि पिछले लोकसभा की बात करें तो 2014 में बीजेपी के हुकुम सिंह को यहां करीब 50 फीसदी यानी 5.65 लाख वोट मिले थे। सपा के नाहिद हसन को 29.49 फीसदी (कुल 3.29 लाख), बसपा के कुंवर हसन को 14.33 फीसदी (कुल 1.60 लाख) और रालोद के करतार सिंह बढ़ाना को 3.81 फीसदी (कुल 42,706) वोट मिले थे। कैराना सीट बीजेपी सांसद हुकुम सिंह के निधन से खाली हुई है।

साल 2014 में सपा, बसपा और रालोद तीनों ने अपने-अपने उम्मीदवार उतारे थे।  हुकुम सिंह बीजेपी के पुराने और दबंग गुर्जर नेता थे, इस इलाके में गुर्जरों-जाटों की अच्छी आबादी है। साल 2014 में मोदी लहर भी थी। इस वजह से गुर्जरों के अलावा कई अन्य पिछड़ी जातियों ने भी हुकुम सिंह को वोट दिया था। अब चूंकि न तो हुकुम सिंह जीवित हैं और न ही पीएम मोदी की पहले जैसी लहर है, लिहाजा, माना जा रहा है कि बीजेपी के लिए राह बहुत मुश्किल हो सकती है। उधर, बदले सियासी समीकरण में सपा, बसपा और रालोद अब एकसाथ हैं। इसलिए दलित, अल्पसंख्यक, जाट और अन्य पिछड़ी जातियों के वोटर्स लामबंद हो सकते हैं। अगर ऐसे जातीय समीकरण रहे तो बीजेपी के हाथ से इस साल तीसरी लोकसभा सीट भी छिन सकती है। सामाजिक समीकरण साध कर सपा गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट बीजेपी की झोली से छीन चुकी है। उसी कहानी को कैराना में भी दोहराना चाह रही है।

बता दें कि कैराना संसदीय क्षेत्र में कुल 17 लाख मतदाता हैं। इनमें अल्पसंख्यकों की संख्या करीब साढ़े तीन लाख है। पिछड़ी जाति (जाट, सैनी, प्रजापति, कश्यप आदि) के मतदाताओं की आबादी करीब चार लाख है। इसके अलावा बसपा के कोर वोटर जाटवों (दलित) की आबादी भी करीब डेढ़ लाख है। इस लिहाज से देखें तो सपा-रालोद के संयुक्त उम्मीदवार को करीब नौ लाख वोट मिल सकते हैं जो कुल वोटर्स के आधे से ज्यादा है। उधर, बीजेपी के खाते में गुर्जर, राजपूत, ब्राह्मण और वैश्य वोट जा सकते हैं। यहां गुर्जर वोटरों की आबादी करीब 1.30 लाख, राजपूतों की 75000, ब्रह्मणों की 60,000 और वैश्य वोटरों की करीब 55,000 आबादी है जो कुल मिलाकर करीब साढ़े तीन लाख के आसपास पहुंचता है।

एक बात और कि जब 2014 में हुकुम सिंह कैराना विधान सभा सीट छोड़ लोकसभा पहुंच गए तो उपचुनाव में सपा के नाहिद हसन ने यहां से जीत दर्ज कर ली, जबकि 1996 से लगातार बीजेपी के हुकुम सिंह यहां से विधायक रहे हैं। 2017 में जब यूपी विधान सभा चुनाव हुए तब भी कैराना से सपा के नाहिद हसन ने हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को हराया था। इस बार बीजेपी फिर से मृगांका सिंह को कैराना उप चुनाव में उतार सकती है। चुनावी नतीजे 31 मई को आएंगे।

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