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जनकवि शिशु की मूर्ति को है दो फुट जमीं की दरकार

देश का पहला राष्ट्रपति पुरस्कार इटावा को दिलाने वाले शिशु का आज कोई पुरसाहाल नहीं है।

Author इटावा | September 6, 2017 04:36 am
मीरा के गीतों की स्वर लहरी उनकी कविताओं में झलकती है जो बेहद मर्मस्पर्शी है। उनकी काव्य गंगा निश्चित ही हिन्दी काव्य जगत का मार्गदर्शन कर रही है।

स्वर्ण भस्म के खाने वाले इसी घाट पर आए, दाना बीन चबाने वाले इसी घाट पर आए, गगन ध्वजा फहराने वाले इसी घाट पर आए, बिना कफन मर जाने वाले इसी घाट पर आए! इन सुन्दर पंक्तियों के रचयिता महान कवि शिशुपाल सिंह शिशु ने देश के कोने-कोने में ऐसे काव्य के माध्यम से अनोखी अलख जगाई। उनका प्रतिनिधि काव्य ग्रंथ मरघट आज भी पाठकों में बेहद लोकप्रिय है। स्वर्ण भस्म को खाने वाले इसी घाट पर आए। दाना बीन चबाने बाले इसी घाट पर आए। गगन ध्वजा फहराने वाले इसी घाट पर आए। बिना कफन मर जाने वाले इसी घाट पर आए।। सोच रहा हूं घर से मरघट की थी कितनी दूरी।

जिसको तय करने में उसने उम्र लगा दी मेरी।। यह चंद पंक्तियां नहीं हैं बल्कि जीवन दर्शन का अहसास कराने वाले काव्य संग्रह मरघट से ली गई।
इटावा शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर चंबल के किनारे उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश सीमा पर बसे ग्राम उदी में महाकवि शिशुपाल सिंह शिशु का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम बिहारी सिंह भदौरिया था और माता का नाम पैदेवी था। शिशु ने ग्राम उदी से ही प्राथमिक शिक्षा पाई। बाद में वह प्राइमरी स्कूल के शिक्षक बने । कवि शिशु की कविताओं में चंबल के बहते जल की स्वच्छता और गहराई है। वन प्रांत की एकांत साधना और यमुना के कछारों व ब्रज की मधुरमा, बुंदेली ठसक और कवि की भावुकता, इन सबने जैसे एक ही व्यक्ति में स्थान पाकर शिशु का निर्माण किया है।

आवास खंडहर में तब्दील
दुखद यह है कि उदी ग्राम स्थित शिशु का प्राचीन आवास अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। कोई भी उसका हाल लेने वाला नहीं। उनके परिजन भी अब वहां नहीं रहते । उदी की प्राथमिक पाठशाला के प्रधानाध्यापक के साथ-साथ शिशु वहां के डाकघर के अध्यक्ष भी रहे। शिशु को श्रेष्ठ शिक्षक का राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला था। शिशु जनकवि थे। वे इटावा के पहले ऐसे कवि थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उनकी कविताओं की दस पुस्तकें दक्षिण भारत से प्रकाशित हुर्इं। इटावा में पहली बार राष्ट्रपति पुरस्कार उन्हें 1962 में मिला। खास बात यह है कि यह सम्मान इसी वर्ष से शुरू हुआ था। इसके लिए पूरे प्रदेश से एक ही व्यक्ति को चुना जाता था। यह सम्मान पाने वाले शिशु पहले व्यक्ति बने। उनकी नीरजा, यमुना किनारे, हल्दीघाटी की एक रात, पूर्णिमा, दो चित्र आदि देश विख्यात कृतियां हैं। उनकी पनघट व मरघट रचनाएं तो इतनी व्यावहारिक हैं कि आज भी लोग उन्हें सुनकर या पढ़कर जीवन दर्शन के इतने करीब पहुंच जाते हैं जितना भागवत और रामायण सुनकर भी नहीं पहुंचते । मरघट की एक पंक्ति, नाड़ी छूट गई तो भैया मरघट को ले आए, आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।

इटावा को दिलाया था राष्ट्रपति पुरस्कार
9 सितंबर 1911 में जन्मे इस कालजयी रचनाकार और शिक्षक की 27 अगस्त 1964 को सर्पदंश से मृत्यु हो गई थी। देश का पहला राष्ट्रपति पुरस्कार इटावा को दिलाने वाले शिशु का आज कोई पुरसाहाल नहीं है। उनके नाम पर इटावा में कोई सड़क, कालोनी, पार्क या स्मारक नहीं है। आखिर क्या वजह है इस अनदेखी की? उदी के शैलेंद्र सिंह भदौरिया का कहना है कि चंबल घाटी पर उनका महाकाव्य बेहद ही रोमांचकारी है। मीरा के गीतों की स्वर लहरी उनकी कविताओं में झलकती है जो बेहद मर्मस्पर्शी है। उनकी काव्य गंगा निश्चित ही हिन्दी काव्य जगत का मार्गदर्शन कर रही है।
शिशुपाल सिंह शिशु के बेटे कृष्णपाल सिंह ने करीब डेढ दशक पहले अपने पिता की धातु की एक मूर्ति बनवाई थी लेकिन वह मूर्ति स्थानीय राजनीति का शिकार होकर आज भी उदी डाकघर परिसर में रखी हुई है। दरअसल 1970-71 में शिशु स्मारक समिति बनाई गई जिसके अध्यक्ष तत्कालीन डीआईओएस शिवदत्त त्रिवेदी को बनाया गया था। चूंकि यह मामला काफी पहले का इसलिए इस समिति के बारे मे स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। इसलिए शिशु समिति से संबधित सभी दस्तावेजों को निकालवा कर उसे देखा जा रहा है।

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