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कासगंज: जलाईं मुसलमानों की दुकानें, रोटी को मोहताज हुए सैकड़ों हिंदू मुलाजिम

27 जनवरी को घंटाघर चौक पर मुस्लिम समुदाय के लोगों की दुकानें जला दी गई और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। वीर बहादुर के अनुसार मुस्लिम समुदाय की पांच दुकानों में करीब 20 हिंदू कर्मचारी थे जो कि दुकानें जलने के बाद बेरोजगार हो गए हैं और वे काफी निराश हैं।
Author कासगंज | February 7, 2018 08:17 am
वीर बहादुर ने कहा “मैं पिछले सात सालों से बाबा शू कंपनी में काम कर रहा था। (Photo Source: Indian Express)

कासगंज सांप्रदायिक हिंसा में कई मुसलमानों की दुकानें जला दी गईं जिसके बाद उनके यहां काम करने वाले हिंदू कर्मचारी रोज़ी-रोटी के मोहताज हो गए हैं। वीर बहादुर ने कई बार अपने मालिक सरदार अली खान को फोन किया क्योंकि उसे पैसों की जरूरत है। सरदार अली खान की इस हिंसा में दुकान जला दी गई। 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगा यात्रा को लेकर भड़की हिंसा ने उस समय भयानक रूप ले लिया था जब चंदन नाम के एक लड़के की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 27 जनवरी को घंटाघर चौक पर मुस्लिम समुदाय के लोगों की दुकानें जला दी गई और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। इनमें से कई दुकानें ऐसी थीं जिनमें हिंदू समुदाय के लोग काम करते थे।

वीर बहादुर के अनुसार मुस्लिम समुदाय की पांच दुकानों में करीब 20 हिंदू कर्मचारी थे जो कि दुकानें जलने के बाद बेरोजगार हो गए हैं और वे काफी निराश हैं। फोन पर इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत करते हुए वीर बहादुर ने कहा “मैं पिछले सात सालों से बाबा शू कंपनी में काम कर रहा था। मुझे रोजाना 180 रुपए मिलते थे लेकिन अब मुझे नहीं पता मैं क्या करूं। मैं कोई दूसरी नौकरी ढूंढ रहा हूं।” बाबा शू कंपनी के मालिक सरदार अली खान ने इस मामले पर बात करते हुए कहा “बहादुर ने मुझे कई बार फोन कर पैसे मांगे हैं। मैं उसे 500 रुपए दे सकता हूं लेकिन उसे कहीं और नौकरी ढूंढनी होगी।”

सरदार अली खान ने कहा “इस हिंसा में आठ लाख रुपए का सामान खराब हो गया। मैं कैसे दोबारा यह दुकान बनाऊंगा?” उन्होंने बताया कि उनके यहां छह लोग काम करते थे जिनमें से चार हिंदू हैं। चंदन की मौत के बाद बढ़ी हिंसा को याद करते हुए सरदार अली खान ने कहा “भीड़ मेरी दुकान को जलाने की कोशिश कर रही थी और जब मैंने उन्हें रोका तो उन्होंने मुझे दुकान से बाहर निकाल दिया और मारपीट की। प्रशासन को इस पर काम करना चाहिए। बिजनेस को फिर से शुरु करने में कई पीढ़ी लग जाएंगी।”

इसी तरह इस हिंसा में मंसूर अहमद की भी दुकान जला दी गई जिसकी दुकान में छह हिंदू काम करते थे। इस पर बात करते हुए मंसूर अहमद ने कहा कि वह अपनी ज्यादातर सेविंग अपनी बीवी के इलाज पर खर्च कर चुके हैं जिसकी दो साल पहले मौत हो गई। इलाज के दौरान उन्होंने बहुत कर्जा लिया था जिसे वे अभी तक चुका रहे हैं। मंसूर अहमद ने कहा “मेरी दुकान में 50 लाख का सामान था और 1.75 लाख रुपए नकद थे जो कि आग में सब जल गए। छह हिंदू कर्मचारियों में सो दो बाबू राम और राहुल ने मुझे पैसों के लिए फोन किया लेकिन मेरे पास पैसे नहीं है जिसके कारण उन्हें पैसे नहीं दे सकता।” बाबू राम पिछले 20 सालों से मंसूर अहमद के पास कर रहा था। बाबू राम ने कहा “बेरोजगार हो गए हैं। जितना होगा उतनी मंसूर साहब की मदद करेंगे लेकिन हमें भी पेट पालना है। जिन लोगों ने दुकानें जलाईं उनको पता ही नहीं इस दुकान के ज्यादातर कर्मचारी हिंदू हैं।”

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