ताज़ा खबर
 

पैदा हुए मुस्लिम पर‍िवार में, पर चारों वेदों का ज्ञान हासिल कर हो गए ‘चतुर्वेदी’, जानिए हयात उल्‍ला की कहानी

अवधी संस्कृति और गंगा-जमुनी परंपरा पूरी दुनिया में अपनी सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध है। इस संस्कृति में हर धर्म के मानने वाले एक-दूसरे से न सिर्फ परंपरा बल्कि भाषा और संस्कारों से भी गुंथे हुए हैं। इसी साझी अवधी संस्कृति के ध्वजवाहक हैं पंडित हयात उल्ला चतुर्वेदी।

संस्‍कृत के प्रकांड विद्वान पंडित हयात उल्‍ला चतुर्वेदी। फोटो- Twitter/@topyaps

यूपी की अवधी संस्कृति और गंगा-जमुनी परंपरा पूरी दुनिया में अपनी सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध है। इस संस्कृति में हर धर्म के मानने वाले एक-दूसरे से न सिर्फ परंपरा बल्कि भाषा और संस्कारों से भी गुंथे हुए हैं। इसी अवधी संस्कृति के ध्वजवाहक हैं पंडित हयात उल्ला चतुर्वेदी। चौंकिए मत, 75 साल के हयात उल्ला चतुर्वेदी पांच वक्त के नमाजी भी हैं और चारों वेदों के जानकार भी। लेकिन उनके नाम की कहानी उनसे भी ज्यादा दिलचस्प है।

यूपी के कौशांबी जिले के छीता हररायपुर निवासी हयात उल्ला बचपन से ही हिंदी और संस्कृत के बड़े प्रेमी हैं। युवा होने पर वह इलाहाबाद के एमआर शेरवानी इंटर कॉलेज में हिंदी और संस्कृत के अध्यापक हो गए। साल 2003 में जब वह स्कूल से रिटायर हो गए। रिटायर होने के बाद अब हयात उल्ला मेहगांव इंटर कॉलेज में नि:शुल्क हिंदी और संस्कृत पढ़ा रहे हैं। साल 1967 में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में संस्कृत के देश भर के विद्वान इलाहाबाद में जमा हुए थे। वहीं हयात उल्ला के संस्कृत ज्ञान और वेदों की प्रति प्रेम से प्रभावित होकर उन्हें उस सम्मेलन में चतुर्वेदी की उपाधि दी गई थी।

हिंदी और संस्कृत के विद्वान हयात उल्ला चतुर्वेदी अंग्रेजी और उर्दू के अलावा अरबी भाषा का भी ज्ञान रखते हैं। लेकिन हयात उल्ला को इस बात का भी मलाल है कि संस्कृत को उसके अपने देश में ही कमजोर किया जा रहा है। उनका मानना है कि संस्कृत एकमात्र भाषा है जो मजहबी दीवार तोड़कर नए हिंदुस्तान को गढ़ सकती है। उनका कहना है कि संस्कृत को अंग्रेजों ने सबसे पहले कमजोर किया था ताकि अंग्रेजी को देश में बढ़ावा दिया जा सके। इस साजिश को देश के नेता समझ नहीं पाए और आज तक अंग्रेजों के पदचिह्नों पर चल रहे हैं। संस्कृत के प्रचार व प्रसार के लिए वह अमेरिका, नेपाल, मॉरीशस आदि देशों में सेमिनार भी कर चुके हैं।

पंडित हयात उल्ला चतुर्वेदी को जेहाद शब्द की गलत व्याख्या का भी भारी अफसोस है। उनका मानना है कि जेहाद का मतलब धर्म युद्ध है। महाभारत भी धर्म की रक्षा के लिए हुआ था। धर्म रक्षा का अर्थ इंसानियत की रक्षा से है, न कि किसी धर्म विशेष की रक्षा से। हयात उल्लाह चतुर्वेदी पूरी तरह से शाकाहारी हैं। वह शाकाहार को ही अपनी सेहत का राज भी बताते हैं। हयात उल्लाह ने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए संस्कृत की कई किताबें लिखी हैं। इन पुस्तकों में संस्कृ​त परिचायिका प्रमुख है। उनके पढ़ाए हुए कई शिष्‍य भी आज संस्‍कृत शिक्षक हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App