जाति बनेगी फिर से चुनावी मुद्दा!

जातिवादी राजनीति तो अब देश भर के चुनाव में जीत का आधार माना जाने लगा है लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में शुरू से ही चुनाव के सारे गणित जाति की गणना से बनते-बिगड़ते रहे हैं।

सांकेतिक फोटो।

मनोज कुमार मिश्र

जातिवादी राजनीति तो अब देश भर के चुनाव में जीत का आधार माना जाने लगा है लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में शुरू से ही चुनाव के सारे गणित जाति की गणना से बनते-बिगड़ते रहे हैं। अगले साल जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश है। उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने उत्तराखंड और गोवा, मणिपुर व पंजाब में भी विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। हर राज्य के चुनाव का अपना महत्व है लेकिन देश भर के राजनीतिक दलों का सर्वाधिक फोकस उत्तर प्रदेश पर ही है। एक तो राजनीतिक रूप से उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा ने इसे अपनी प्रयोगशाला बनाया है। अयोध्या श्रीरामजन्म भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, आरएसएस के अनुसांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद ने केंद्र की भाजपा सरकार के सहयोग से न्यास बनाकर अपने वायदे के मुताबिक मंदिर निर्माण का काम शुरू कर दिया है। उसी तरह दो प्रमुख मंदिरों काशी विश्वनाथ और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर विवाद भी उत्तर प्रदेश में ही है।

भाजपा के अलावा जिन दलों का पूरे उत्तर प्रदेश में असर है उनमें समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख हैं। सालों प्रदेश के शासन में रही कांग्रेस अब चौथे-पांचवें नंबर की पार्टी बन गई हैं। ज्यादातर दलों का एक दूसरे से गठबंधन होता रहा है। बसपा के मजबूत होने के बाद दलित मतदाताओं का बड़ा वर्ग उसके साथ जुड़ा। पहले बसपा दूसरे दलों के साथ सत्ता में आती रही लेकिन पांच साल तक बसपा प्रमुख मायावती 2007 में बहुमत से सरकार बनाकर मुख्यमंत्री रही। तब माना गया कि दलितों के अलावा बसपा को अल्पसंख्यकों और ब्राह्मण मतों का बड़ा हिस्सा मिला।

2007 में यादव और कुछ मजबूत पिछड़ी जातियों के साथ-साथ अल्पसंख्यक समुदाय का वोट सपा को मिला और सपा के अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने। भाजपा ने मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रही उमा भारती को उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया लेकिन भाजपा तीसरे नंबर पर रही। उमा भारती भी उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेता कल्याण सिंह की तरह लोध राजपूत हैं लेकिन कल्याण सिंह के इस राज्य में शून्य से शिखर तक की राजनीति करने के चलते व्यापक आधार था। भाजपा अपने बूते पहली बार 1991 में सत्ता में आई जिसमें उनका ही सर्वाधिक योगदान था।

कल्याण सिंह के प्रयास से ही भाजपा उत्तर प्रदेश में कुछ बिरादरियों के बजाए बहुसंख्यकों की पार्टी बनी। भाजपा को प्रदेश के करीब 22 फीसद दलित मतों में से गैर जाटव दलितों के भी वोट बड़ी तादात में मिलने लगे। उसी बुनियाद पर 2017 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर हुए चुनाव में भाजपा को जाति से परे हटकर करीब 39 फीसद वोट और 403 सीटों में से रिकार्ड 324 सीटें मिली। भाजपा दावा भले विकास पर लड़ने का करें लेकिन वह चुनाव अपने पुराने एजंडे श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के निर्माण से लेकर सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास आदि पर लड़ने की तैयारी है।

भाजपा सरकार यह जता रही है कि प्रदेश में तुष्टिकरण खत्म किया गया और कानून का राज कायम कराया गया है। कोरोना संकट के समय किए गए कामों खास करके कोरोना जांच, उपचार, रिकार्ड टीकाकरण और स्वास्थ्य सेवाओं के व्यापक सुधार से लेकर प्रदेश में कराए गए विकास कार्यों को भी भाजपा चुनावी मुद्दा बना रही है। विपक्ष की सारी तैयारी चुनाव को धार्मिक आधार पर न बांटने देने का है। कांग्रेस के कमजोर होने के बाद उसके परंपरागत समर्थक बिरादरियां ब्राह्मण, दलित और अल्पसंख्यक अलग-अलग दलों के समर्थक बन गए। भाजपा के ताकतवर होने के बाद अल्पसंख्यक तो उसी दल को वोट करते हैं जो भाजपा को पराजित करें। बसपा के साथ ज्यादातर दलित जुड़े और ब्राह्मण अमूनन भाजपा के साथ आए।

40 फीसद से ज्यादा पिछड़ी जाति की आबादी वाले राज्य में पहले पिछड़े मतलब यादव, गुर्जर और कुर्मी माने जाते थे। इनके अलावा जो पिछड़ी जाति की आबादी है वह इनसे कई गुणा ज्यादा है। कुर्मी जाति में तो भाजपा की पहले से पैठ रही है कल्याण सिंह ने सभी गैर यादव पिछड़ों को गोलबंद कर दिया जिनमें बड़ा प्रभाव प्रधानमंत्री मोदी का माना जाता है। प्रदेश में सत्ता की दावेदारी में भाजपा के अलावा सपा और बसपा को ही माना जा रहा है।

सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं। सपा का लोक दल के अलावा कुछ अन्य दलों से तालमेल हो सकता है। भाजपा के सहयोगी दल लगभग तय माने जा रहे हैं। कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी दलों को एक साथ लाने की कवायद चल रही है। विपक्षी दलों का सारा प्रयास चुनाव को धार्मिक आधार पर न आने देने के अलावा चुनाव जातिगत आधार पर करवाने का लगता है।

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