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सहारनपुर: जातीय हिंसा से टूटा सौहार्द का ताना-बाना

सहारनपुर में करीब 38 फीसद मुसलिम और 22 फीसद दलित आबादी है। गैर भाजपाई दल दलित-मुसलिम गठजोड़ की राजनीति पर निर्भर हैं।

Author June 7, 2017 7:35 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुरेद्र सिंघल

महाराज सिंह डिग्री कॉलेज सहारनपुर के पूर्व प्राचार्य प्रो. योगेश गुप्ता का कहना है कि सहारनपुर में स्थिति बिगड़ने के पीछे राजनीतिक कारण भी हंै। उनका कहना है कि सहारनपुर में करीब 38 फीसद मुसलिम और 22 फीसद दलित आबादी है। गैर भाजपाई दल दलित-मुसलिम गठजोड़ की राजनीति पर निर्भर हैं। दोनों के गठजोड़ पर वे पिछले तीन दशक से सत्ता का सुख भोगते रहे हैं और वर्ष 1995 के बाद 20-22 वर्षों मे पश्चिम उतर प्रदेश में मायावती के बढ़ते प्रभाव के कारण दलित संगठित हुए। इसी के बूते दो बार बहुजन समाज पार्टी सहारनपुर में लोकसभा सदस्य चुनवाने में सफल रही है और 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा के चुनावों में बसपा ने सहारनपुर की कुल सात में से तीन से चार विधानसभा सीटें जीती हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 और विधानसभा चुनाव 2017 में मायावती की सोशल इंजीनियरिंग नाकाम हो गई और उनका खाता भी नहीं खुल पाया। गैर जाटव दलित वोट भाजपा के पक्ष में लामबंद हुआ और भाजपा लोकसभा सीट के साथ चार विधानसभा सीट जीत गई। सहारनपुर में कां

ग्रेस उपाध्यक्ष इमरान मसूद मुसलमानों के नेता के रूप में उभर चुके हैं। उनकी कोशिश है कि कांग्रेस पार्टी के पक्ष में दलित-मुसलिम वोटों का ध्रुवीकरण हो जाए।
राहुल गांधी ने 27 मई को सहारनपुर पहुंचकर पीड़ित दलितों के जख्मों पर मरहम लगाने का कार्य किया। राहुल गांधी की इन कोशिशों को बसपा से छिटके दलितों को साथ लाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में दो साल सहारनपुर में डीआईजी पद पर रहे और वर्तमान में एक विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर डा. अशोक कुमार राघव कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा और सोच साफ-सुथरी और पारदर्शी है। डा. राघव का मानना है कि संभवत: अफसरों की तबादले और पोस्टिंग में उन्हें पूरी छूट नहीं मिली हुई है। ऐसे अफसरों की पोस्टिंग की जा रही है जो सुशासन देने में सक्षम नहीं हैं। सहारनपुर की स्थिति बिगड़ने के पीछे वह नौकरशाही को ही जिम्मेदार मानते हैं।
जातीय वर्चस्व की होड़

सामाजिक विश्लेषक और श्रमिकों के बीच पिछले चार दशकों से सक्रिय जगदीश बंसल कहते हैं कि सहारनपुर जनपद में दलितों में स्वाभिमान आया है और उनका रवैया आक्रामक है। सहारनपुर में दलित और राजपूत संघर्ष के पीछे जातीय वर्चस्व की होड़ है। दोनों समुदाय समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं। जगदीश बंसल का कहना था कि यदि जिला प्रशासन समय रहते भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर को गिरफ्तार कर लेता तो स्थिति इतनी नहीं बिगड़ती। उन्होंने कहा कि 23 मई को मायावती को शब्बीरपुर में प्रशासन को सभा की इजाजत भी नहीं देनी चाहिए थी। ध्यान रहे कि मायावती के लौटते ही चंदपुर के पास सरसावा के दलितों के वाहन पर हमलाकर 19 वर्षीय दलित युवक आशीष की हत्या कर दी गई और तलवारों एवं भालों से आठ लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया था। इसकी प्रतिक्रिया में 24 मई को दूसरे समुदाय के लोगों पर तीन स्थानों पर हमलाकर चार लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया।

कदम उठाने में हुई देरी
उत्तर प्रदेश सरकार ने 23 मई की रात को प्रदेश के गृह सचिव एमपी मिश्र, एडीजी कानून व्यवस्था आदित्य मिश्र , आईजी एटीएस अमिताभ यश और डीआईजी सुरक्षा विजय भूषण को विशेष जहाज से सहारनपुर भेजा। उनकी रिपोर्ट पर शासन ने अगले रोज डीएम एनपी सिंह और एसएसपी सुभाष चंद्र दूबे को मुअत्तल कर दिया और डीआईजी जेके शाही और कमिश्नर एमपी अग्रवाल का तबादला कर दिया। प्रशासन ने असाधारण कदम उठाते हुए इंटरनेट सेवाओं और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया। पुलिस ने विभिन्न मामलों में अभी तक करीब 100 लोगों की गिरफ्तारी की है। इनमें ज्यादातर राजपूत बिरादरी के लोग हैं।
िजिले में पिछले कुछ दिनों से अमन शांति है। लेकिन कोई भी भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि स्थिति कब विस्फोटक हो जाए। प्रशासन ने 6 कंपनी आरएएफ और 10 कंपनी पीएसी को रिजर्व में रखा हुआ है। सहारनपुर में एक माह से जारी हिंसक घटनाओं के कारण उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सुशासन के दावों पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। अभी उन्हें मुख्यमंत्री बने ज्यादा दिन भी नहीं हुए हैं लेकिन सहारनपुर की बिगड़ी जिला स्तरीय कानून व्यवस्था ने उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश में भाजपा की छवि पर बट्टा लगा दिया है और नेताओं से जवाब देते नहीं बन ़रहा है।

 

 

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