कभी-कभी किसी छोटे चुनाव की कहानी उसके नतीजे से ज्यादा इस बात में छिपी होती है कि उसकी शिकायत आखिर कहां तक पहुंची। नवंबर 1963 में बलिया जिला परिषद के अध्यक्ष का चुनाव ऐसा ही एक चुनाव था। चुनाव बलिया में हुआ, लेकिन उसकी चर्चा लखनऊ से होती हुई दिल्ली पहुंची। कांग्रेस के केंद्रीय संसदीय बोर्ड ने इस पर नाराजगी जताई और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने भी मामला पहुंचा।

नेहरू के पास जब यह मामला आया तो वह बलिया के चुनाव की पूरी कहानी नहीं जानते थे। मगर उन्हें इतना जरूर लगा कि इसे ठीक ढंग से संभाला नहीं गया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष डी. संजीवय्या को लिखे एक पत्र में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन कार्यवाहक अध्यक्ष अलगूराय शास्त्री की भूमिका पर भी सवाल उठाया।

उस समय उत्तर प्रदेश में सुचेता कृपलानी मुख्यमंत्री थीं। सितंबर 1963 में उन्होंने चंद्रभानु गुप्त की जगह मुख्यमंत्री पद संभाला था। सरकार नई थी और कांग्रेस संगठन के भीतर खींचतान पुरानी। दिल्ली में बैठे कांग्रेस के केंद्रीय नेता चाहते थे कि प्रदेश सरकार और संगठन के बीच तालमेल रहे, लेकिन लखनऊ की राजनीति अपने हिसाब से चल रही थी।

सरकार नई थी लेकिन संगठन में खींचतान पुरानी

उस समय जिला परिषद आज की तरह केवल स्थानीय निकाय की एक सामान्य संस्था नहीं थी। उत्तर प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था को नया रूप दिया जा रहा था और जिला परिषदों को विकास तथा स्थानीय प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकार दिए जा रहे थे। जिला परिषद का अध्यक्ष जिले की राजनीति में प्रभाव रखने वाला पद बन चुका था। कांग्रेस के लिए यह पद इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसके जरिए जिले की राजनीतिक ताकत और संगठन पर असर पड़ता था।

उत्तर प्रदेश की कांग्रेस राजनीति पर अध्ययन करने वाले राजनीतिक वैज्ञानिक पॉल आर. ब्रास ने बाद में लिखा कि 1963 में जिला परिषद अध्यक्षों के चुनाव कांग्रेस के भीतर गुटीय मुकाबले का बड़ा मैदान बन गए थे। कांग्रेस के अलग-अलग गुट अपने उम्मीदवारों को अध्यक्ष पद तक पहुंचाना चाहते थे। उनके अध्ययन के मुताबिक उस समय जिला परिषद अध्यक्ष का पद जिले में कांग्रेस के भीतर बेहद प्रतिष्ठित राजनीतिक पद बन चुका था। बलिया में भी चुनाव ने ऐसी ही राजनीतिक हलचल पैदा की।

14 नवंबर 1963 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव केके शाह ने मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी को एक पत्र लिखा। पत्र में उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ फैसलों को लेकर केंद्रीय संसदीय बोर्ड की नाराजगी दर्ज थी। मंत्रियों के चयन में बदलाव और छह संसदीय सचिवों की नियुक्ति जैसे मुद्दों पर केंद्रीय नेतृत्व को आपत्ति थी। बलिया का चुनाव इसी माहौल में हुआ।

आखिर बलिया के इस चुनाव में ऐसा क्या हुआ था

इसी पत्र में एक छोटी-सी लेकिन महत्वपूर्ण बात लिखी गई – केंद्रीय संसदीय बोर्ड बलिया जिला परिषद के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के चयन और चुनाव लड़ने के तरीके से भी असंतुष्ट था। यहां से सवाल उठता है कि आखिर बलिया के इस चुनाव में ऐसा क्या हुआ था कि कांग्रेस के केंद्रीय संसदीय बोर्ड को उसमें दखल देना पड़ा?

उपलब्ध पत्र इसका पूरा जवाब नहीं देते। उनमें उम्मीदवार का नाम, मतदान में पड़े वोटों की संख्या या चुनाव के दौरान हुई किसी खास घटना का विस्तृत विवरण नहीं है। लेकिन इतना जरूर पता चलता है कि दिल्ली तक मामला पहुंच चुका था और केंद्रीय नेतृत्व को उम्मीदवार के चयन तथा चुनाव लड़ने के तरीके पर आपत्ति थी।

इस पत्र की एक और दिलचस्प बात है। उस पर केके शाह के हस्ताक्षर थे, लेकिन नेहरू आर्काइव में दर्ज विवरण के मुताबिक इसका मसौदा खुद नेहरू ने तैयार किया था। यानी बलिया के जिला परिषद अध्यक्ष के चुनाव का प्रसंग उस समय प्रधानमंत्री के ध्यान में था और उन्होंने मुख्यमंत्री को भेजे जाने वाले पत्र की भाषा भी खुद तैयार की थी। लेकिन बलिया का मामला यहीं नहीं रुका।

28 नवंबर को उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेता दरबारी लाल शर्मा दिल्ली में नेहरू से मिलने पहुंचे। उन्होंने प्रधानमंत्री के सामने दो मुद्दे रखे। इनमें एक था हाल में हुआ बलिया जिला परिषद के अध्यक्ष का चुनाव। नेहरू ने उसी दिन कांग्रेस अध्यक्ष डी. संजीवय्या को पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने बताया कि दरबारी लाल शर्मा ने बलिया के हालिया चुनाव के बारे में उनसे बात की है। नेहरू ने यह भी लिखा कि उन्हें मामले की सारी पेचीदगियां पूरी तरह समझ में नहीं आईं। फिर भी उन्हें लगा कि इसे ठीक ढंग से नहीं संभाला गया था। उन्होंने यह संभावना भी जताई कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष अलगूराय शास्त्री ने मामले को ठीक तरह से नहीं संभाला।

नेहरू जी को पूरी जानकारी नहीं थी, लेकिन वे परेशान थे

नेहरू का यह अंदाज इस कहानी को और दिलचस्प बनाता है। वह बलिया के चुनाव को लेकर कोई अंतिम फैसला सुनाते हुए नहीं दिखते। वह यह दावा भी नहीं करते कि उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी है। इसके बजाय वह अपनी जानकारी की सीमा स्वीकार करते हैं और फिर भी यह कहते हैं कि मामले को संभालने के तरीके पर उन्हें आपत्ति है। बलिया का चुनाव अब केवल बलिया का चुनाव नहीं रह गया था।

दरबारी लाल शर्मा ने नेहरू से मुलाकात में अपनी एक दूसरी शिकायत भी रखी। उन्होंने बताया कि उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव पद से हटा दिया गया है। नेहरू ने इस पर भी सवाल उठाया। उन्होंने संजीवय्या को लिखा कि शर्मा को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला और जहां तक उन्हें जानकारी थी, उनके खिलाफ कोई नियमित आरोप भी तय नहीं किए गए थे।

दरबारी लाल शर्मा ने नेहरू को उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण कांग्रेस नेताओं की ओर से अलगूराय शास्त्री को लिखा गया एक पत्र भी दिया था। नेहरू ने उस पत्र का भी उल्लेख किया और बताया कि उसमें जिला परिषद के चुनावों की बात थी। इस तरह बलिया का चुनाव कांग्रेस संगठन के भीतर चल रही दूसरी लड़ाइयों से जुड़ता चला गया।

दरअसल, 1963 उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए आसान साल नहीं था। मुख्यमंत्री बदल चुकी थीं। सरकार और संगठन के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठ रहे थे। अलग-अलग गुट अपने प्रभाव को मजबूत करने में लगे थे। ऐसे समय में जिला परिषद का अध्यक्ष कौन बनेगा, यह महज स्थानीय प्रशासन का सवाल नहीं था। यह जिले में राजनीतिक प्रभाव का सवाल था।

पॉल आर. ब्रास के अध्ययन के मुताबिक 1963 में पुनर्गठित जिला परिषदों के अध्यक्षों के चुनाव कांग्रेस के भीतर काफी तीखे मुकाबलों में बदल गए थे। पुराने गुट टूट रहे थे और नए समीकरण बन रहे थे। उनके अनुसार कई जिलों में कांग्रेस के भीतर ही अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी इतनी महत्वपूर्ण थी कि यह विधानसभा टिकट की दावेदारी से भी अधिक आकर्षक मानी जाती थी। ऐसे में बलिया के चुनाव को लेकर केंद्रीय नेतृत्व की चिंता को उस दौर की कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से अलग करके देखना मुश्किल है।

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दिलचस्प यह भी है कि बलिया का मामला सामने आने के कुछ ही दिनों बाद नेहरू ने उत्तर प्रदेश की स्थिति को लेकर अपनी चिंता और ज्यादा स्पष्ट शब्दों में दर्ज की। 12 दिसंबर 1963 को उन्होंने चंद्रभानु गुप्त को लिखा कि उत्तर प्रदेश की बिगड़ती स्थिति से वह स्वयं बहुत दुखी और चिंतित हैं। नेहरू आर्काइव में इस पत्र का शीर्षक ही “UP Beyond Repair” दर्ज है।

इसलिए नवंबर 1963 का बलिया जिला परिषद चुनाव केवल किसी स्थानीय पद का चुनाव नहीं था। उसके पीछे कांग्रेस के भीतर चल रही वह खींचतान दिखाई देती है जो आगे चलकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में और गहरी होने वाली थी। फिर भी इस कहानी में सबसे दिलचस्प बात शायद यही है कि बलिया के चुनाव का पूरा ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इतिहास में अक्सर ऐसा होता है। बड़े नेताओं की चिट्ठियां बच जाती हैं, लेकिन उन चिट्ठियों को जन्म देने वाली स्थानीय घटना की पूरी कहानी कहीं पीछे छूट जाती है।

हमारे पास इतना जरूर बचा है कि 14 नवंबर को कांग्रेस के केंद्रीय संसदीय बोर्ड ने बलिया जिला परिषद के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार के चयन और चुनाव लड़ने के तरीके पर असंतोष जताया था। 28 नवंबर को वही चुनाव दरबारी लाल शर्मा की शिकायत के रूप में नेहरू के सामने आया। नेहरू ने इसे कांग्रेस अध्यक्ष तक पहुंचाया और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के संगठनात्मक तौर-तरीकों पर भी सवाल उठाए। बलिया में चुनाव एक जिला परिषद के अध्यक्ष का था, लेकिन उसकी राजनीति सिर्फ बलिया तक नहीं रही।

उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में दिल्ली की दिलचस्पी इतनी गहरी थी कि जिले की एक राजनीतिक कुर्सी के चुनाव का तरीका भी प्रधानमंत्री तक पहुंच सकता था। और नेहरू जैसे नेता, जो देश की बड़ी समस्याओं के बीच काम कर रहे थे, उस शिकायत को नजरअंदाज करने के बजाय उसके बारे में कांग्रेस अध्यक्ष को लिख रहे थे।

बलिया के उस चुनाव का नतीजा आज शायद इतिहास की बड़ी किताबों में बहुत जगह न पाता हो। लेकिन नवंबर 1963 की नेहरू की चिट्ठियां बताती हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में उस समय असली हलचल सिर्फ विधानसभा और मुख्यमंत्री की कुर्सी के आसपास नहीं थी। कभी-कभी उसकी आहट बलिया की जिला परिषद से भी सुनाई देती थी।

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नवंबर की सर्दी में लखनऊ की राजनीति कुछ ज्यादा ही गरम थी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान अब इतनी बढ़ चुकी थी कि उसकी गूंज दिल्ली तक पहुंचने लगी थी। मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के सामने केवल विपक्ष की चुनौती नहीं थी, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी नेतृत्व को लेकर खींचतान चल रही थी। सरकार और संगठन के बीच बढ़ती दूरी ने हालात को ऐसा बना दिया था कि लखनऊ की राजनीतिक हलचल पर दिल्ली की नजर टिक गई थी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक