बीसवीं सदी की शुरुआत में जब भारत की भाषाओं और बोलियों को व्यवस्थित ढंग से दर्ज करने की कोशिश हो रही थी, तब भाषा को केवल शब्दों और व्याकरण के सहारे समझना पर्याप्त नहीं माना गया। किसी बोली को जानने के लिए यह भी जरूरी था कि उसमें लोग किस तरह की बातें करते हैं, किस तरह की कहानियां सुनाते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी को किन शब्दों में बयान करते हैं। इसी कोशिश में उत्तर भारत की बोलियों के बीच घूमती एक छोटी-सी अवधी कथा भी लिखित रूप में सुरक्षित हो गई।
यह कहानी आज से सौ साल से भी ज्यादा पहले की है। उसमें आंधी के बाद आम के बाग में गई दो पड़ोसिनें हैं, एक निसंतान स्त्री है और उसे झाड़ियों में एक बच्चा मिलता है। वह बच्चे को घर ले आती है और अपना बेटा मानकर पालती है। समय बीतता है। वही बच्चा बड़ा होकर परिवार बसाता है। बुढ़ापे में मां के साथ उसकी पत्नी का व्यवहार बदल जाता है। उसे ठीक से खाना नहीं मिलता। अंत में जब बेटे को सच्चाई पता चलती है तो मां बहू को दंड देने के बजाय उसे माफ करने को कहती है।
साधारण लगने वाली यह कथा इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि इसमें पारिवारिक रिश्तों का कोई असाधारण संदेश है। इसकी असली अहमियत इस बात में है कि यह उस समय की अवधी को उसके अपने सामाजिक संसार के भीतर दर्ज करती है। सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन के Linguistic Survey of India में अवधी के अलग-अलग इलाकों के नमूने प्रकाशित किए गए थे। इसमें “North and West Allahabad” की अवधी के लिए अलग खंड है और इसी खंड में यह लोककथा दर्ज है। यानी एक लोककथा यहां साहित्यिक रचना के रूप में नहीं, भाषा के दस्तावेज के रूप में सामने आती है।
यही फर्क इस कहानी को आज पढ़ने का कारण भी देता है।
भाषा की सीमा नक्शे की सीमा से अलग होती है
उत्तर प्रदेश को आज जिलों और मंडलों के नक्शे पर समझना आसान है। लेकिन बोलियों का भूगोल इतना सीधा नहीं होता। एक भाषा या बोली किसी जिले की सीमा पर रुक नहीं जाती। उसके शब्द, उच्चारण और बोलने का ढंग आसपास के इलाकों से मिलते-जुलते हुए बदलते रहते हैं। अवधी इसका अच्छा उदाहरण है।
अवधी को आम तौर पर अवध क्षेत्र से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका भाषाई विस्तार एक बड़े भूभाग में रहा है। लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अयोध्या, गोंडा, बहराइच, सीतापुर, फतेहपुर और आसपास के कई इलाकों में इसके अलग-अलग रूप मिलते रहे हैं। भाषावैज्ञानिक विवरणों में भी अलग-अलग क्षेत्रों की अवधी के बीच अंतर की ओर ध्यान दिलाया गया है।
सन 1904 में प्रकाशित ग्रियर्सन के इस सर्वेक्षण की खासियत यही थी कि उसने भाषा को एक ही रंग में रंगने के बजाय उसके क्षेत्रीय रूपों को अलग-अलग नमूनों में दर्ज किया। Linguistic Survey of India में गोंडा, लखनऊ-बाराबंकी, सीतापुर-खीरी, फतेहपुर और इलाहाबाद के अलग-अलग हिस्सों की अवधी के नमूने मिलते हैं। “Central Allahabad”, “North and West Allahabad”, “East Allahabad” और “South-East Allahabad” तक के अलग खंड दिए गए हैं।
यह विभाजन अपने आप में उस समय के उत्तर भारत के भाषाई भूगोल की एक तस्वीर देता है।
आज जब हम अवधी कहते हैं तो अक्सर उसे एक एकरूप भाषा मान लेते हैं। लेकिन गांवों और कस्बों में बोली जाने वाली भाषाएं हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। कुछ दूरी के बाद शब्द बदल सकते हैं, क्रिया का रूप बदल सकता है, उच्चारण बदल सकता है और दूसरी बोली के शब्द उसमें शामिल हो सकते हैं। भाषा की यही जीवंतता उसे किताब की भाषा से अलग बनाती है।
एक कथा में दिखाई देता है पूरा ग्रामीण संसार
ग्रियर्सन के दस्तावेज में दर्ज कथा को ध्यान से पढ़ें तो इसमें केवल घटनाएं नहीं हैं। उसके पीछे एक पूरा ग्रामीण समाज दिखाई देता है। कहानी की शुरुआत आंधी से होती है। आंधी के बाद आम बीनने के लिए दो स्त्रियों का निकलना अपने आप में उस समय के ग्रामीण जीवन का एक छोटा-सा दृश्य है। आम का बाग केवल कथा की जगह नहीं है। वह गांव के जीवन का हिस्सा है – जहां मौसम किसी कहानी को शुरू कर सकता है और प्रकृति किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकती है।
इसी बाग में निसंतान स्त्री को बच्चा मिलता है।
यह संयोग कहानी को आगे बढ़ाता है, लेकिन लोककथा के स्तर पर इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण बात सामने आती है – संतान का रिश्ता केवल जन्म से नहीं, पालन से भी बनता है। जिस बच्चे को आंधी उसके पास लेकर आती है, वही आगे चलकर उसका बेटा बन जाता है।
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बाद में जब उसी बेटे के घर में बूढ़ी मां के साथ अन्याय होता है तो कथा परिवार के भीतर स्त्री की स्थिति की ओर भी संकेत करती है। घर में भोजन किसे कितना मिलता है, किसके हिस्से में क्या आता है और कौन किसके सामने अपनी बात कह सकता है – ये बातें कहानी में अलग से समझाई नहीं जातीं। वे रोजमर्रा के जीवन की तरह कथा के भीतर मौजूद हैं।
यही लोककथा की खासियत है। इतिहास की किताब किसी समय के सामाजिक ढांचे को समझाने के लिए अलग से विवरण दे सकती है, लेकिन लोककथा कई बार उसे एक छोटे प्रसंग में दिखा देती है।
उस समय की बोली को बचाने का एक तरीका
ग्रियर्सन का भाषाई सर्वेक्षण इसी वजह से आज भी महत्वपूर्ण स्रोत है। उन्होंने भारत की अनेक भाषाओं और बोलियों के नमूने इकट्ठे किए और उनके भाषाई रूपों को दर्ज किया। अवधी के मामले में भी अलग-अलग क्षेत्रों से पाठ लिए गए। इन पाठों में लोककथाएं, संवाद और दूसरे लोकसाहित्यिक नमूने उपयोगी थे क्योंकि उनसे बोली को उसके स्वाभाविक संदर्भ में समझा जा सकता था।
इस पुरानी कथा का मूल अवधी पाठ भी सर्वेक्षण में दिया गया है और उसके साथ अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध है। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे पास केवल यह जानकारी नहीं बची कि उस इलाके में अवधी बोली जाती थी। हमारे पास उस अवधी की आवाज का एक लिखित नमूना भी बचा है।
सौ साल से ज्यादा समय बाद जब कोई उस पाठ को देखता है तो वह उस दौर की भाषा के साथ-साथ उसके पीछे खड़े समाज को भी पढ़ सकता है। यही वजह है कि लोकभाषाओं का दस्तावेजीकरण केवल भाषाविज्ञान का विषय नहीं है। यह सामाजिक इतिहास को बचाने का काम भी है।
उत्तर प्रदेश का इतिहास केवल राजधानियों में नहीं लिखा गया
उत्तर प्रदेश की पहचान अक्सर उसके बड़े ऐतिहासिक केंद्रों से बनाई जाती है – अयोध्या, लखनऊ, काशी, प्रयागराज, आगरा, कानपुर, झांसी जैसे शहर इतिहास की किताबों में अपनी अलग जगह रखते हैं। लेकिन इस प्रदेश की सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृति का एक बड़ा हिस्सा उन गांवों और कस्बों में रहा है, जहां इतिहास लिखने के लिए कोई दरबार नहीं था।
वहां कहानियां थीं।
लोकगीत थे।
बोलियां थीं।
किस्से थे।
कहानियां सुनाने वाली दादियां और नानियां थीं। खेतों और बागों से जुड़े प्रसंग थे। मौसम और फसल के साथ बदलती हुई भाषा थी। अवधी की यह पुरानी कथा उसी संसार की एक छोटी-सी खिड़की है। इसमें न कोई राजा है, न कोई युद्ध, न कोई बड़ी ऐतिहासिक घटना। फिर भी इसके भीतर एक समय का गांव दिखाई देता है। यही इसकी अहमियत है।
भाषा बदलती है तो उसके साथ स्मृतियां भी बदलती हैं
आज उत्तर प्रदेश में अवधी का संसार खत्म नहीं हुआ है। प्रतापगढ़ और आसपास के इलाकों में आज भी अवधी गीत और लोक प्रस्तुतियां होती हैं। हाल के वर्षों में भी प्रतापगढ़ में अवधी लोकगीतों के कार्यक्रम हुए हैं। प्रतापगढ़ से अवधी के कई कवि और साहित्यकार भी जुड़े रहे हैं। लेकिन भाषा के जीवित रहने और उसके पुराने रूपों के सुरक्षित रहने में अंतर है।
आज की अवधी वही नहीं हो सकती जो सौ या सवा सौ साल पहले किसी गांव में बोली जाती थी। समय के साथ शब्द बदलते हैं। हिंदी का प्रभाव बढ़ता है। शिक्षा और रोजगार की भाषा बदलती है। गांवों से शहरों की ओर आने-जाने से बोलियों का आपसी संपर्क बढ़ता है। परिवारों में बातचीत के तरीके बदलते हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया ने बोलने और लिखने के नए ढंग पैदा किए हैं।
इस बदलाव को केवल भाषा के क्षरण के रूप में देखना भी ठीक नहीं होगा। भाषाएं हमेशा बदलती रही हैं। लेकिन बदलाव के साथ पुराने शब्द, मुहावरे, कथाएं और बोलने के तरीके अगर दर्ज नहीं किए जाएं तो आने वाली पीढ़ियां यह जानने से वंचित हो सकती हैं कि उनके अपने इलाके की भाषा कभी कैसी सुनाई देती थी।
ग्रियर्सन के सर्वेक्षण का महत्व यहीं से समझ में आता है। उसने एक समय की आवाज को कागज पर रोक दिया। आज वही कागज हमें उस उत्तर प्रदेश की ओर देखने का मौका देता है, जो नक्शे पर दिखाई नहीं देता।
एक कहानी से ज्यादा बड़ी है यह कहानी
आंधी में मिला बच्चा इस कथा का सबसे याद रहने वाला प्रसंग हो सकता है, लेकिन आज इस कहानी को पढ़ते हुए उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वह दुनिया है जिसमें यह कथा पैदा हुई और जिस भाषा में इसे दर्ज किया गया।
एक आम का बाग था। गांव की स्त्रियां थीं। परिवार की अपनी व्यवस्था थी। लोकविश्वास और संयोग को देखने की अपनी दृष्टि थी। और इन सबको व्यक्त करने वाली एक बोली थी। उस बोली को किसी विश्वविद्यालय की कक्षा में नहीं, जीवन के बीच सुना गया था। इसलिए उसकी कहानी भी जीवन से आई।
उत्तर प्रदेश को समझने के लिए ऐसी ही छोटी आवाजों की जरूरत है। उसके इतिहास की बड़ी घटनाएं अपनी जगह हैं, लेकिन प्रदेश की आत्मा केवल राजाओं, युद्धों और इमारतों में नहीं मिलती। वह उन बोलियों में भी रहती है जिनमें किसी गांव ने अपनी पहली कहानी कही होगी।
सौ साल से ज्यादा पहले दर्ज की गई यह अवधी कथा आज शायद अपने मूल रूप में बहुत कम लोगों को मालूम हो। लेकिन उसका बच जाना बताता है कि लोकस्मृति का रास्ता हमेशा किताबों से होकर नहीं जाता। कभी कोई कहानी भाषा को बचा लेती है और कभी भाषा किसी पूरे समाज की कहानी को।
अवधी की उस पुरानी कथा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। वह कथा अब सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। वह उस उत्तर प्रदेश की आवाज का दस्तावेज है, जिसमें गांवों के बीच भाषा की सीमाएं बदलती थीं, मौसम कहानियां शुरू करता था और लोकजीवन अपनी स्मृतियां बोलचाल की भाषा में अगली पीढ़ी तक पहुंचाता था।
आज उत्तर प्रदेश तेजी से बदल रहा है। शहर फैल रहे हैं, गांव बदल रहे हैं और बोलियों के बीच की दूरियां भी घट रही हैं। ऐसे समय में सौ साल पुराने किसी भाषाई दस्तावेज को पढ़ना अतीत में लौटना भर नहीं है। यह यह देखने का भी एक तरीका है कि उत्तर प्रदेश ने बदलते हुए भी अपने भीतर कितना कुछ बचाकर रखा है।
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