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योगी सरकार पर भड़के पुरी के शंकराचार्य, बोले- राजनीतिक दल से नहीं जुड़ा, इसलिए रची गई साजिश

नई झूंसी स्थित शिवगंगा आश्रम में पत्रकारों से बातचीत में शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने कहा कि कुंभ मेले में शासन और प्रशासन उनकी भारी उपेक्षा कर रहा है। उन्हें नाले के बगल में जमीन आवंटित की गई है।

नई झूंसी स्थित शिवगंगा आश्रम में पत्रकारों से बातचीत में शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने कहा, ‘कुंभ मेले में शासन और प्रशासन उनकी भारी उपेक्षा कर रहा है।

कुंभ मेले में उचित जगह पर जमीन ना दिए जाने से नाराज पुरी पीठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कुंभ मेले में शिविर ना लगाने का फैसला लिया है। उन्होंने सरकार और प्रशासन पर अपमान का आरोप लगाते हुए कहा कि वह अपने झूंसी के आश्रम में रुककर महत्वपूर्ण तिथियों पर स्नान करेंगे। स्वामी सरस्वती के मुताबिक प्रयाग कुंभ का आयोजन पुरी पीठ के अंतर्गत किया जाता है। फिर उन्हें जमीन कम मिली। कम जमीन भी ऐसी जगह मिली जहां मेले की गंदगी बहाई जाती है। ऐसे में यह उनका और उनके पद का अपमान है। इस दौरान शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि कुंभ में राजनीतिक दल से जुड़े संतों को ही महत्व दिया जा रहा है।

इस बार भी राजनीतिक दलों से जुड़े सत्तों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। अखाड़ों की बड़ी जमीन और सुविधाएं भी दी गईं। उन्होंने कहा कि ‘कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने कुंभ से जुड़ी एक स्मारिका का उनसे विमोचन कराया था, मेले से जुड़े अधिकारियों से भी मुलाकात की थी। शंकराचार्य का कहना है कि इन सब के बाद भी उन्हें 200 लोगों को ठहराने लायक जमीन नहीं दी गई। नियम के मुताबिक शंकराचार्य को सबसे पहले जमीन आवंटित होनी चाहिए। हम किसी पार्टी से नहीं जुड़े हैं इसलिए साजिश के तहत ऐसा किया गया।’

नई झूंसी स्थित शिवगंगा आश्रम में पत्रकारों से बातचीत में शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद ने कहा, ‘कुंभ मेले में शासन और प्रशासन उनकी भारी उपेक्षा कर रहा है। उन्हें नाले के बगल में जमीन आवंटित की गई है। ऐसी स्थिति में वहां शिविर लगाना संभव नहीं है। मैं तीर्थराज को प्रणाम करता हूं और समय-समय पर आता रहूंगा। अर्द्ध कुंभ के दौरान भी आएंगे लेकिन, झूंसी के शिवगंगा आश्रम में रुकेंगे।

शंकराचार्य के मुताबिक आक्सफोर्ड, दक्षिण कोरिया, कैंब्रिज विश्वविद्यालय तथा उत्तर कोरिया के गणितज्ञ उनके पास गणित की जटिल पहेली सुलझाने के लिए आते हैं। बावजूद इसके शासनतंत्र ने उन्हें हमेशा उपेक्षित रखा। उन्होंने राम मंदिर पर कहा कि अगर उन्होंने रामालय ट्रस्ट पर हस्ताक्षर कर दिया होता तो भगवान राम मंदिर तंबु में नहीं भव्य मंदिर में होते। अगल-बगल या आमने-सामने मस्जिद भी होती।

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