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रार से मुक्त नहीं हुई समाजवादी पार्टी

समाजवादी पार्टी के बीच मचा घमासान अब तक भीतर ही भीतर जारी है। विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बावजूद तीन महीने तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पास रखने का दावा करने वाले अखिलेश ने अब तक मुलायम सिंह यादव को उनका पुराना पद वापस नहीं किया है।

जारी है पिता पुत्र के बीच घमासान

समाजवादी पार्टी के बीच मचा घमासान अब तक भीतर ही भीतर जारी है। विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बावजूद तीन महीने तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पास रखने का दावा करने वाले अखिलेश ने अब तक मुलायम सिंह यादव को उनका पुराना पद वापस नहीं किया है। मंगलवार को हुई पार्टी विधायकों की बैठक में विधान परिषद में पार्टी के नेता के तौर पर अहमद हसन और विधान सभा में रामगोविंद चौधरी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। विधानसभा में न ही शिवपाल सिंह यादव को पार्टी का नेता बनाने पर विचार किया गया और न ही अहमद हसन के नाम पर। आलम यह है कि इस बैठक में शिवपाल ने हिस्सा नहीं लिया।

सपा विधायकों ने बैठक में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को विधानसभा और विधान परिषद, दोनों का संयुक्त नेता चुना है। जबकि विधान परिषद के नेता के तौर पर अखिलेश यादव के बेहद भरोसेमंद अहमद हसन को और विधानसभा में राम गोविंद चौधरी को नेता चुना गया है। सपा के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि इस फैसले से पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव नाराज हैं। मुलायम की मंशा विधानसभा में सपा के नेता का पद या तो शिवपाल सिंह यादव को देने की थी या आजम खां को। दोनों ही नेताओं के पास खासा अनुभव होने की वजह से मुलायम इनमें से किसी एक को यह पद देने के पक्षधर थे। लेकिन पार्टी के 27 विधायकों की बैठक से पूर्व किसी ने उनकी राय जानने की कोशिश ही नहीं की।

उधर मंगलवार को आयोजित समाजवादी पार्टी विधायक दल की बैठक में इटावा के जसवंतनगर से विधायक शिवपाल सिंह यादव नहीं पहुंचे। उनके बैठक में उपस्थित न होने से स्पष्ट है कि उन्हें अखिलेश यादव की सरपरस्ती अब तक मंजूर नहीं है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि सिर्फ तीन महीने के लिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद लेने और उसके बाद उसे ससम्मान मुलायम सिंह यादव को वापस कर देने के अखिलेश के दावों पर मुलायम समर्थक उन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। खुद मुलायम सिंह यादव के परिवार और करीबियों की तरफ से अखिलेश पर कई मर्तबा राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद नेताजी को सौंपने पर दबाव बनाने की कोशिशें हुर्इं। लेकिन नतीजा सिफर रहा। पार्टी के वरिष्ठ नेता बताते हैं कि समाजवादी पार्टी में चल रही अंतर्कलह आने वाले समय में फिर पुराने ढर्रे पर लौट सकती है। पार्टी के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव अब तक अपने अपमान से तिलमिलाए हुए हैं।  वे अखिलेश के समाजवादी पार्टी के अगुवा होने की दशा में सियासत में सम्मान की तलाश में हैं। उनका यह सम्मान क्या किसी नई राजनीतिक पार्टी का सूत्रपात करेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है कि समाजवादी पार्टी में अब भी सब ठीक नहीं है।

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