उत्तर प्रदेश के चर्चित नेता और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर फिर से सुर्खियों में हैं। आजकल ओमप्रकाश राजभर लगातार सपा मुखिया अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं। कुछ दिन पहले ही उन्होंने दावा किया कि समाजवादी पार्टी के आधे से अधिक सांसद बीजेपी में जाने के लिए तैयार बैठे हैं। हालांकि समाजवादी पार्टी और कई सांसदों ने इसका खंडन कर दिया।
अब ओम प्रकाश राजभर समाजवादी पार्टी पर वह ओबीसी आरक्षण को खत्म करने का आरोप लगा रहे हैं। ओम प्रकाश राजभर पिछड़े समाज के नेता हैं और पूर्वांचल के कई जिलों में उनकी अच्छी राजनीतिक पकड़ है। ओम प्रकाश राजभर ने अपने सियासी सफर की शुरुआत बसपा से की थी। हालांकि उन्हें पहली बार विधायक बनने में काफी समय लग गया।
2017 में बीजेपी के साथ किया गठबंधन
ओम प्रकाश राजभर बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों दलों के साथ गठबंधन कर चुके हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में ओमप्रकाश राजभर ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया था। उनकी पार्टी को एनडीए गठबंधन के तहत 8 विधानसभा सीटें मिली थी। 8 विधानसभा सीटों पर ओम प्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा ने चुनाव लड़ा था और उन्हें चार पर जीत हासिल हुई थी। ओम प्रकाश राजभर पहली बार चुनाव में विधायक भी चुने गए थे।
यानी भाजपा के साथ गठबंधन करने के बाद ओमप्रकाश राजभर को पहली बार विधानसभा जाने का मौका मिला था। 2017 में ओमप्रकाश राजभर गाजीपुर जिले की जहूराबाद विधानसभा सीट से विधायक चुने गए थे। पहली बार विधायक बनने के साथ ही ओमप्रकाश राजभर कैबिनेट मंत्री भी बन गए। हालांकि 2 साल बाद ओम प्रकाश राजभर की लाइन एनडीए से अलग हो गई और वह लगातार योगी सरकार की नीतियों पर सवाल उठने लगे।
सीएम योगी ने मंत्रिमंडल से किया बर्खास्त
2019 के लोकसभा चुनाव में ओमप्रकाश राजभर एनडीए गठबंधन के तहत उत्तर प्रदेश में एक लोकसभा सीट चाहते थे हालांकि उन्हें नहीं मिला। मई 2019 में ओपी राजभर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था। ओपी राजभर लगातार गठबंधन विरोधी बयानबाजी कर रहे थे और योगी सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे थे। वह पिछड़ा वर्ग सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की लंबे समय से मांग कर रहे थे। 2021 में ओमप्रकाश राजभर ने कह दिया कि अगर बीजेपी योगी आदित्यनाथ को सीएम फेस बनाती है तो वह गठबंधन नहीं करेंगे।
सपा के साथ गठबंधन में लड़ा 2022 का चुनाव
इसके बाद ओमप्रकाश राजभर सपा के साथ गठबंधन की घोषणा कर देते हैं। ओम प्रकाश राजभर के साथ कई बीजेपी के नेता भी समाजवादी पार्टी ज्वाइन करते हैं। 2022 का विधानसभा चुनाव ओमप्रकाश राजभर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में लड़ते हैं। सपा गठबंधन के तहत ओमप्रकाश राजभर की पार्टी को 17 सीटें मिलती हैं और 6 सीटों पर उनकी पार्टी जीत दर्ज करती है। हालांकि 1 साल बाद ही ओपी राजभर की लाइन सपा से भी अलग हो जाती है और वह फिर अखिलेश यादव पर निशाना साधने लगते हैं।
2024 लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए में शामिल हुए राजभर
2024 लोकसभा चुनाव से पहले ओम प्रकाश राजभर एक बार फिर से एनडीए में शामिल हो जाते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में घोसी लोकसभा सीट से ओमप्रकाश राजभर अपने बेटे अरविंद राजभर को चुनाव लड़ाते हैं। हालांकि सपा उम्मीदवार राजीव राय उन्हें करारी मात देते हैं।
किसके साथ गठबंधन रहा फायदेमंद?
अब तुलना की जाए तो राजभर बीजेपी के साथ गठबंधन कर अधिक फायदे में रहे। दरअसल 2017 के चुनाव में उन्हें भले ही कम सीटें मिली लेकिन उनके चार विधायक चुने गए और वह खुद कैबिनेट मंत्री बन गए। 2022 में राजभर को सपा ने अधिक सीटें दी और उनके छह विधायक चुने गए। हालांकि वह सरकार से बाहर रहे। इसके अलावा उनकी पार्टी से चुने गए विधायक अब्बास अंसारी अनौपचारिक रूप से सपा में है। ओपी राजभर खुद कहते हैं कि उन्हें गठबंधन के तहत 17 सीटें दी गई थी लेकिन कई सीटों पर अखिलेश यादव के कहने पर सपा उम्मीदवार सुभासपा के सिंबल पर लड़े थे।
34 विधानसभा सीटों पर घोषित कर चुके हैं प्रभारी
ओमप्रकाश राजभर 2027 का विधानसभा चुनाव एनडीए के साथ लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। हालांकि उन्होंने उत्तर प्रदेश की 34 विधानसभा सीटों पर अपने प्रभारी घोषित कर दिए हैं। यानी वह शुरुआती दौर में 34 सीटों पर दावेदारी का संकेत दे रहे हैं। अब बीजेपी ओपी राजभर को कितना सीट देती है, यह आने वाला वक्त बताएगा।
कब हुई थी राजभर की राजनीति की शुरुआत?
ओम प्रकाश राजभर पूर्वांचल में ओबीसी जातियों के बीच एक लोकप्रिय चेहरा हैं। मूल रूप से वाराणसी के रहने वाले ओपी राजभर ने बलिया को अपनी कर्मभूमि बनाई। ओपी राजभर की पार्टी सुभासपा का मुख्यालय भी बलिया में ही है। ओपी राजभर के पिता कोयला खदान में काम करते थे। बसपा संस्थापक कांशीराम से प्रभावित होकर ओपी राजभर ने 1981 में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। 1991 के विधानसभा चुनाव में ओपी राजभर को बसपा ने पहली बार टिकट दिया था और वह तीसरे नंबर पर रहे थे। इसके बाद 1996 के विधानसभा चुनाव में भी राजभर बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़े और उन्हें हार मिली।
मायावती से नाराजगी की वजह से छोड़ी थी पार्टी
2001 में उत्तर प्रदेश में बसपा सरकार थी और मुख्यमंत्री मायावती ने भदोही का नाम बदलकर संतरविदास नगर रख दिया था। इससे ओपी राजभर नाराज हो गए और उन्होंने बसपा से अलग रास्ता अपना लिया। इसके बाद ओपी राजभर ने अपनी पार्टी बनाई और 2004 के लोकसभा चुनाव में ताल ठोकी। हालांकि पार्टी को कुछ खास सफलता नहीं मिली।
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ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव को जहूराबाद विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की चुनौती दे डाली। बता दें कि जहूराबाद सीट से ओम प्रकाश राजभर वर्तमान में विधायक हैं। पढ़ें पूरी खबर
