uttar pradesh village where no animal sacrifice no holika dahan - यूपी के इस गांव में होली पर नहीं जलती होलिका, न बकरीद पर काटे जाते हैं जानवर - Jansatta
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यूपी के इस गांव में होली पर नहीं जलती होलिका, न बकरीद पर काटे जाते हैं जानवर

साल 2007 में गांव के मुस्लिम समुदाय ने होलिका दहन एक कब्रिस्तान के नजदीक करने पर अपनी नाराजगी जतायी थी। जिसके बाद बात बढ़ती देख प्रशासन ने दोनों पक्षों के बीच सुलह करायी थी।

Author August 11, 2018 1:36 PM
उत्तर प्रदेश के इस गांव में बकरीद पर नहीं दी जाती कुर्बानी। (express photo by dilip kagda)

अवनीश मिश्रा

जहां देशभर के मुस्लिम आगामी 22 अगस्त को बकरीद मनाने की तैयारी कर रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के संतकबीर नगर के मुसहारा गांव में हालात थोड़े अलग हैं। दरअसल इस गांव में बकरीद के मौके पर जानवरों के काटने पर साल 2007 से ही मनाही है। इतना ही नहीं गांव में हिंदू समुदाय के होलिका दहन करने की भी मनाही है। वहीं पुलिस भी इस बात का ध्यान रखती है कि कोई भी व्यक्ति बकरे ना काट पाए, ताकि त्योहार शांति के साथ मनाया जा सके। बता दें कि एक दशक पहले गांव में दोनों समुदाय एक मुद्दे को लेकर आमने-सामने आ गए थे, उसके बाद से ही यहां ये प्रतिबंध लगाए गए हैं।

साल 2007 में गांव के मुस्लिम समुदाय ने होलिका दहन एक कब्रिस्तान के नजदीक करने पर अपनी नाराजगी जतायी थी। जिसके बाद बात बढ़ती देख प्रशासन ने दोनों पक्षों के बीच सुलह करायी थी और बाकायदा एक एग्रीमेंट बनाकर उस पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर कराए गए। इस एग्रीमेंट के तहत गांव में बकरीद के मौके पर जानवरों के काटने पर और होली के मौके पर होलिका दहन पर रोक लगा दी गई थी। उसके बाद से लगातार यह प्रथा चली आ रही है। धरम सिंहवा पुलिस थाने के इंचार्ज शिव बरन यादव का कहना है कि साल 2007 से हर साल हम गांव से बकरियां इकट्ठी कर उन्हें जिले के वेटरनरी डिपार्टमेंट के सुपुर्द कर देते हैं। जब त्योहार हो जाता है तो गांव वाले वेटरनरी डिपार्टमेंट से अपनी-अपनी बकरियां ले जाते हैं।

इसी तरह हिंदू लोगों के होली पर अपने रीति-रिवाज करने पर भी रोक है और पुलिस हिंदुओं को होलिका दहन नहीं करने देती। एसएचओ ने बताया कि हालांकि बकरीद के 3 दिन बाद मुस्लिम परिवार बकरों को काटते हैं और दोनों समुदाय मिलकर इस खुशी में शरीक होते हैं। एसपी शैलेश कुमार पांडे के अनुसार, यहां बकरीद का कोई मुद्दा नहीं है और यह प्रथा यहां पिछले एक दशक से जारी है और लोग बिना किसी परेशानी के अपने-अपने त्योहार सेलिब्रेट करते हैं।

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