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उत्तर प्रदेश विस चुनाव: सुल्तानपुर में चुनावी गर्मी बढ़ी, 1989 के बाद से यहां नहीं खुला कांग्रेस का खाता

लोकसभा चुनाव की सफलता से उत्साहित भाजपा खेमा मानकर चल रहा है कि विधानसभा में उस प्रदर्शन को दोहराना आसान नहीं है। टिकट को लेकर वहां और भी मुश्किलें हैं।

Author सुल्तानपुर | April 21, 2016 11:57 PM
वरुण गांधी सुल्तानपुर से भाजपा सांसद हैं। (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश विधानसभा के नजदीक आ रहे चुनाव की गर्मी जिले में भी महसूस की जाने लगी है। राजनीतिक दलों के सार्वजनिक कार्यक्रमों का सिलसिला तेज हुआ है और टिकट के दावेदार अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए उसमें ज्यादा भीड़ जुटाने की कोशिश में हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में जिले की पांचों विधानसभा सीटें सपा ने जीती थीं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में स्थितियां पूरी तौर पर बदली हुई थीं। भाजपा के वरुण गांधी ने इन पांचों सीटों को शामिल करके बनने वाली सुल्तानपुर लोकसभा सीट भारी अंतर से जीती थी। बसपा दूसरे और सपा तीसरे नंबर पर थी।

सपा के मौजूदा विधायकों के सामने पहली चुनौती अपने टिकट बचाने की है। वैसे तो हर सीट पर पार्टी टिकट के दावेदार मौजूदा विधायकों के खिलाफ माहौल का हवाला देकर अपनी दावेदारी पुख्ता करने की कोशिश में हैं लेकिन माना जा रहा है कि एक या फिर अधिकतम दो सीटों के लिए पार्टी नए चेहरों के बारे में सोच सकती है। उधर विधायकों ने अपने इलाकों में दौड़ तेज की है। वे गुजरे चार साल में पूरे किए वादों का हवाला देते हुए बाकी काम साल भर में पूरा करने की तसल्ली दे रहे हैं।

पंचायत चुनावों और स्थानीय निकाय की एमएलसी सीट की जीत से जाहिर तौर पर पार्टी बढ़े मनोबल का प्रदर्शन करने की कोशिश कर रही है लेकिन इन चुनावों में सत्ता और पैसे की भूमिका के कारण जमीनी स्तर पर पार्टी के पक्ष में कुछ नजर नहीं आ रहा है। लोकसभा चुनाव की सफलता से उत्साहित भाजपा खेमा मानकर चल रहा है कि विधानसभा में उस प्रदर्शन को दोहराना आसान नहीं है। टिकट को लेकर वहां और भी मुश्किलें हैं। सपा और बसपा की तर्ज पर वहां किसी एक नेता को खुश करने से बात नहीं बनती है। वहां टिकट के आकांक्षी लखनऊ दिल्ली की दौड़ के बीच संघ के प्रचारकों और पदाधिकारियों के यहां हाजिरी लगाना नहीं भूल रहे हैं।

स्थानीय सांसद वरुण गांधी को लेकर भी दावेदार सांसत में हैं। अमित शाह की टीम में वरुण को जगह न मिलने और प्रधानमंत्री मोदी से उनकी दूरी की खबरों के चलते अब वरुण की नजदीकी का मतलब टिकट को खतरे में डालना माना जा रहा है। इसी के चलते यहां अब वरुण से नजदीकी बनाने की कोई होड़ नजर नहीं आती है जिन्हें नजदीक माना जाता था, वे भी वरुण समर्थक ठप्पे से अपने को बचा रहे हैं। भाजपा खेमे में इस बात को लेकर भी चिंता है कि सपा सरकार से नाराज आम लोगों के बीच जुबान पर पहला नाम बसपा का है।

2012 के विधानसभा और फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में जिले में खारिज हुई बसपा खेमे में फिलहाल उत्साह और हलचल है। सत्ता से बेदखली के बाद सुस्त पड़े कैडर में सक्रियता नजर आ रही है। राज्य सरकार से बढ़ती नाराजगी और मोदी सरकार से बढ़ती निराशा के बीच बसपा के लोगों को अच्छे दिनों की आहट सुनाई दे रही हैं। हालांकि इसमें फिलहाल कई अगर मगर हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी दूसरे स्थान पर दमदार, प्रदर्शन और कानून व्यवस्था के मोर्चे पर राज्य सरकार की नाकामी से उभरी सत्ता विरोधी लहर पर पार्टी की उम्मीदें टिकी हैं।

विधानसभा प्रभारी के रूप में पार्टी प्रत्याशी अरसे पहले तय हो चुके हैं। फिलहाल इन प्रत्याशियों को असली चिंता उस सोशल इंजीनियरिंग को साधने की है जिसके अनुकूल रहने से 2007 में पार्टी को बहुमत और 2012 में बिगड़ने से वनवास हो गया था।
सटी अमेठी और रायबरेली में सोनिया गांधी की मौजूदगी का कोई असर सुल्तानपुर में नजर नहीं आता। विधानसभा चुनाव में वर्ष 1989 के बाद सुल्तानपुर में कांग्रेस का खाता नहीं खुला। राहुल प्रियंका का प्रचार भी पिछले मौकों पर यहां पार्टी प्रत्याशियों की जमानत नहीं बचा पाया। विधानसभा चुनाव में लगातार और लोकसभा चुनाव की करारी शिकस्त से हताश पार्टी के स्थानीय नेता, कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर कुछ कार्यक्रम करते रहते हैं लेकिन पार्टी टिकट को लेकर कोई भागदौड़ नहीं दिख रही है।

* राजनीतिक दलों के सार्वजनिक कार्यक्रमों का सिलसिला तेज हुआ है।
* टिकट के दावेदार शक्ति प्रदर्शन के लिए ज्यादा भीड़ जुटाने की कोशिश में जुटे हैं।

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