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सरकारी मुआवजा नहीं लेंगे उरी में शहीद जवान के पिता

उड़ी हमले में शहीद जवान गंगाधर दोलुई के पिता ओंकारनाथ दोलुई ने राज्य सरकार की ओर से घोषित दो लाख रुपए के मुआवजे और होमगार्ड की नौकरी को नाकाफी बताते हुए इसे ठुकरा दिया है।

Author कोलकाता | September 23, 2016 3:20 AM

उड़ी हमले में शहीद जवान गंगाधर दोलुई के पिता ओंकारनाथ दोलुई ने राज्य सरकार की ओर से घोषित दो लाख रुपए के मुआवजे और होमगार्ड की नौकरी को नाकाफी बताते हुए इसे ठुकरा दिया है। दोलुई परिवार हावड़ा जिले के जमुनाबलिया गांव का रहने वाला है। उनको अपने शहीद बेटे के अंतिम संस्कार के लिए 10 हजार रुपए की रकम उधार लेनी पड़ी है। दो साल पहले बेटे के सेना में भर्ती होने से पहले तक 64 साल के दोलुई दिहाड़ी मजदूर थे। बेटे के अंतिम संस्कार के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मुआवजे की यह रकम शहीद का अपमान है। सरकार ने हमें दो लाख रुपए देने का एलान किया है। लेकिन जहरीली शराब पीकर मरने वालों के परिजनों को भी इतनी ही रकम दी जाती है। दोलुई ने कहा कि सरकार ने इस मुआवजे के अलावा उनके छोटे बेटे को होमगार्ड की नौकरी देने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन हम यह लेने से मना कर देंगे।

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते मंगलवार को इस मुआवजे का एलान किया था। ध्यान रहे कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकारों ने शहीदों के परिजनों को 20-20 लाख का मुआवजा देने का एलान किया है। बिहार व झारखंड ने भी क्रमश: 11 और 10 लाख रुपए देने की बात कही है। इस हमले में एक अन्य शहीद विश्वजीत घोराई के बड़े भाई रंजीत घोराई ने फिलहाल मुआवजे के मुद्दे पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि टीवी चैनलों के जरिए उनको मुआवजे की रकम की जानकारी मिली है। लेकिन हम फिलहाल इस मुद्दे पर बात करने की मनोदशा में नहीं हैं। इस बीच, हावड़ा के तृणमूल कांग्रेस नेता और ममता बनर्जी मंत्रिमंडल के सदस्य अरूप राय ने कहा है कि मुआवजे का फैसला उनके हाथों में नहीं है। लेकिन साथ ही सरकार शहीदों के परिजनों को सरकारी नौकरी भी तो दे रही है।

वैसे, राज्य में होम गार्ड के तौर पर काम करने वाले जवानों को रोजाना 375 रुपए मिलते हैं। लेकिन 90 दिनों की नौकरी के बाद उनको एक दिन के लिए कार्यमुक्त कर दिया जाता है। निरंतरता नहीं होने की वजह से वे पक्की नौकरी का दावा नहीं कर सकते। शहीद दोलुई के पिता ने कहा कि बेटे की नौकरी लगने से पहले वे रोजाना 170 रुपए कमाते थे और इसी से चार लोगों का पेट पालते थे। उन्होंने कहा कि शुक्रवार से वे दोबारा काम की तलाश में निकलेंगे।
ओंकारनाथ को इस बात का भारी अफसोस है कि 15 सितंबर को उनके बेटे ने जब अपनी मां को फोन किया था तो उन्होंने उससे बात नहीं की थी। तीन दिन बाद उनका बेटा हमेशा के लिए सो गया।

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