राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख और एनडीए के सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा इन दिनों मुश्किल राजनीतिक स्थिति में फंस गए हैं। एक तरफ बीजेपी उन पर अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय करने का दबाव बना रही है, वहीं दूसरी तरफ उनके बेटे दीपक प्रकाश का बिहार सरकार में मंत्री पद जाना लगभग तय माना जा रहा है।

18 जून को होने वाले बिहार विधान परिषद (MLC) चुनाव के लिए एनडीए ने दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया है। बिहार के संविधान के अनुसार मंत्री बने रहने के लिए उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी था। अब विधान परिषद का टिकट नहीं मिलने से उनका मंत्री पद खत्म होने की संभावना बढ़ गई है।

विधान परिषद की 10 सीटें खाली हो रही हैं। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में एनडीए के पास 202 विधायक हैं, इसलिए वह आसानी से 9 सीटें जीत सकता है। 75 सदस्यीय विधान परिषद के लिए जेडीयू और बीजेपी ने चार-चार उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि एक सीट चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को दी गई है। एक सीट आरजेडी के सुनील कुमार सिंह को मिलेगी। अतिरिक्त उम्मीदवार नहीं होने के कारण चुनाव की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

दीपक प्रकाश ने मंत्री पद जाने की संभावना पर कहा कि उन्हें एनडीए नेतृत्व के आशीर्वाद से ही मंत्री बनाया गया था और जब तक नेतृत्व का भरोसा रहेगा, वे मंत्री बने रहेंगे। उन्होंने विधान परिषद टिकट नहीं मिलने पर कोई टिप्पणी करने से इनकार किया।

बीजेपी के सूत्रों का दावा है कि इसी साल उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा में दोबारा भेजते समय उनसे यह उम्मीद की गई थी कि वे अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा का बीजेपी में विलय कर देंगे। सूत्रों के मुताबिक, जब दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री बनाने पर विचार हो रहा था, तब भी बीजेपी नेतृत्व ने कुशवाहा को विलय के मुद्दे की याद दिलाई थी।

लेकिन उपेंद्र कुशवाहा अब खुलकर कह रहे हैं कि वे केवल किसी एक पद के लिए अपनी पार्टी का अस्तित्व खत्म नहीं करेंगे। उनका कहना है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा एक अलग राजनीतिक दल है और आगे भी अलग ही रहेगा। हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया कि उनकी पार्टी पूरी तरह एनडीए का हिस्सा है। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि शायद आखिरी समय में दीपक प्रकाश को विधान परिषद की सीट मिल जाए।

कुशवाहा के लिए यह मामला सिर्फ बीजेपी के दबाव तक सीमित नहीं है। पिछले साल दिसंबर में जब उन्होंने अपने बेटे को नीतीश कुमार सरकार में मंत्री बनवाया था, तब उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी विरोध शुरू हो गया था। पार्टी के चार में से तीन विधायकों ने उन पर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था।

विधायकों का कहना था कि उपेंद्र कुशवाहा खुद राज्यसभा सांसद हैं, उनकी पत्नी स्नेहलता कुशवाहा विधायक हैं और अब उनके बेटे को भी मंत्री बना दिया गया है, जबकि वह न तो विधायक थे और न ही विधान परिषद के सदस्य। इससे पहले भी पार्टी के सात नेताओं ने दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने के विरोध में इस्तीफा दे दिया था।

बीजेपी सूत्रों का यह भी कहना है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा के तीन विधायक आलोक कुमार सिंह, रमेश्वर महतो और माधव आनंद बीजेपी के संपर्क में हैं। इससे उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक स्थिति और कमजोर होती दिख रही है।

कभी पूरे बिहार में कुशवाहा (कोयरी) समाज के बड़े नेता माने जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा का एनडीए में प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ है। खासकर तब से, जब बीजेपी ने उसी समाज से आने वाले सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया। कभी नीतीश कुमार के करीबी रहे कुशवाहा बाद में उनसे अलग हो गए और अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करते रहे।

2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी तत्कालीन पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) ने जिन तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था, उन सभी पर जीत दर्ज की थी। लेकिन बाद के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उनका प्रभाव काफी घट गया। इसके बावजूद वे अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखने में सफल रहे।

जेडीयू छोड़ने और नई पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा बनाने के बाद भी उन्होंने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में छह सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से चार पर जीत हासिल की। हालांकि वर्तमान विधानसभा में एनडीए के पास 202 विधायक होने के कारण उपेंद्र कुशवाहा की सौदेबाजी की ताकत सीमित हो गई है।

यही वजह है कि अब उपेंद्र कुशवाहा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अपनी पार्टी की अलग पहचान बचाए रखें या फिर सत्ता में हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए बीजेपी के दबाव के आगे झुकें। फिलहाल उन्होंने साफ संकेत दिया है कि पार्टी का विलय नहीं होगा, भले ही इसकी कीमत उनके बेटे के मंत्री पद के रूप में चुकानी पड़े।

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बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन जून के आखिर तक अपनी नई टीम का ऐलान कर सकते हैं। अगले साल उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक जैसे अहम राज्यों विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में इन राज्यों का ध्यान रखा जाएगा। राष्ट्रीय पदाधिकारियों के अलावा नितिन नवीन पार्टी की सबसे बड़ी फैसले लेने वाली बॉडी, पार्लियामेंट्री बोर्ड को भी फिर से गठित कर सकते हैं। एक सूत्र ने कहा कि नई टीम में नए और युवा चेहरों के साथ-साथ अनुभवी लोगों का भी मिश्रण होगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक