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तकनीक का दिखेगा दम, स्टाफ होगा कम

उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार ने भी 2015 में प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में पाइप से पेयजल आपूर्ति के लिए खाका तैयार किया था। उस समय तैयार संचालन और अनुरक्षण नीति में कुछ संशोधन के बाद 2018 की यह प्रस्तावित नीति जारी की गई है। बताया जा रहा है कि चौदहवें वित्त आयोग/ राज्य वित्त आयोग के मार्गदर्शी सिद्धांत में संशोधन न हो पाने और अक्तूूबर 2018 से पेयजल आपूर्ति व स्वच्छता मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के अंतर्गत संचालन व अनुरक्षण मद समाप्त करने के बाद यह नीति तैयार की गई है।

Author December 5, 2018 6:45 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

गजेंद्र सिंह

उत्तर प्रदेश के गांवों में पाइप से पेयजल आपूर्ति के लिए एक बार फिर से संचालन और अनुरक्षण नीति जारी की गई है। सरकार का लक्ष्य है कि प्रदेश के सभी गांवों तक पाइप से पानी पहुंचाया जाए। इसके लिए तकनीक पर जोर दिया जाएगा और शुल्क भी बढ़ाया जाएगा। वहीं, स्टाफ की तैनाती कम से कम रखने की बात कही गई है। पाइप से पेयजल आपूर्ति की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों के पास रहेगी। आपूर्ति से जुड़े कार्य और रखरखाव के लिए धनराशि का इंतजाम भी ग्राम पंचायतों को ही करना पड़ेगा। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से तैयार टंकियों से पानी की आपूर्ति अभी तक शुरू नहीं हुई है, लेकिन नीति को जल्द ही लागू करने की बात चल रही है। उत्तर प्रदेश की पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार ने भी 2015 में प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में पाइप से पेयजल आपूर्ति के लिए खाका तैयार किया था। उस समय तैयार संचालन और अनुरक्षण नीति में कुछ संशोधन के बाद 2018 की यह प्रस्तावित नीति जारी की गई है।

बताया जा रहा है कि चौदहवें वित्त आयोग/ राज्य वित्त आयोग के मार्गदर्शी सिद्धांत में संशोधन न हो पाने और अक्तूूबर 2018 से पेयजल आपूर्ति व स्वच्छता मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के अंतर्गत संचालन व अनुरक्षण मद समाप्त करने के बाद यह नीति तैयार की गई है। प्रस्तावित नीति के अनुसार प्रदेश के सभी गांवों को पाइप पेयजल से जोड़ने का प्रस्ताव तैयार किया गया है, लेकिन प्रदेश के जिन गांवों में पहले से पाइपलाइन बिछाई गई है, उनकी हालत खस्ता है।

जलापूर्ति से जुड़े क्षेत्र में 20 साल से कार्य कर रहे लखनऊ के विशेषज्ञ पुनीत श्रीवास्तव बताते हैं कि पाइप पेयजल आपूर्ति से सभी गांवों को आच्छादित करने का प्रयास पुराना है, लेकिन इस पर अभी तक सफलता नहीं मिली है। वे कहते हैं कि राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, मार्च 2018 तक यूपी के केवल एक लाख 36 हजार 594 ग्रामीण घरों में ही नल का कनेक्शन था। इनमें से कितने घरों में पानी पहुंच रहा है, यह पता करना मुश्किल है। अब अगर ग्राम पंचायत स्तर पर पाइप से पानी देने की बात हो रही है तो यूपी की करीब 59 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों के तहत आने वाले लाखों ग्रामीण घरों को शामिल करना होगा, जो कठिन कार्य है।

पुनीत बताते हैं कि यह नीति पुराने शासनादेशों का पुलिंदा है। इस बार भी ऐसी कोई रणनीति नहीं दिख रही है, जिससे गांवों तक पानी पहुंच सके। उनका कहना है कि ग्राम पंचायतों को जिम्मेदारी तो दे दी गई है, लेकिन न तो बजट दिया गया है और न ही कोई स्टाफ। ऊपर से तकनीक की बात कहकर स्टाफ भी कम रखने को कहा गया है। ग्रामीण इलाकों में पाइप पेयजल आपूर्ति की स्थिति के बारे में बरेली जिले की मोहनपुर ग्राम पंचायत की प्रधान सीमा देवी के पुत्र रितेश बताते हैं कि गांव में 2015 में पानी की टंकी बनकर तैयार हो गई थी और पाइप लाइन भी बिछा दी गई है, लेकिन अभी तक आपूर्ति नहीं शुरू की गई है।

वे बताते हैं कि आपूर्ति शुरू होने के बाद लोगों से शुल्क वसूलने और रखरखाव के लिए लोगों की जरूरत पड़ेगी, लेकिन पंचायत स्तर पर इस काम के लिए कोई कर्मचारी नहीं है। ऐसे में संचालन और रखरखाव का कार्य मुश्किल होगा। रितेश का कहना है कि अभी गांव में लोग खुद बोरिंग कराकर सबमर्सिबल से पानी लेते हैं या फिर सरकारी सार्वजनिक नल से। नीति में कहा गया है ग्राम पंचायतों को लाभार्थियों से वसूले गए शुल्क से ही संचालन से जुड़े स्टाफ, मरम्मत, रसायन और विद्युत व्यय का खर्च निकालना होगा। अगर जलमूल्य से खर्च नहीं निकलता तो राज्य वित्त आयोग से अनुदान दिया जाएगा। पानी पर काम कर रही एक संस्था से जुड़ीं अंजलि बताती हैं कि यूपी की 11 हजार जगहों पर बिछी पाइपलाइन में मात्र 4000 जगहों पर ही सही काम हो रहा है। जहां पाइपलाइन से आपूर्ति हो रही है, वहां शुल्क वसूली बहुत कम है। ऐसे में वसूले गए शुल्क से संचालन कार्य मुश्किल है।

प्रस्तावित नीति में यह भी
शुल्क राशि 50 रुपए से अधिक की जा सकती है।
वसूले गए शुल्क से ही पंचायतों को योजना से जुड़े कार्य करवाने होंगे।
घरेलू/ अघरेलू उपयोग के लिए जलमूल्य दर अलग-अलग रखी जाएगी।

पाइप पेयजल आपूर्ति में समस्याएं भी कम नहीं
प्रदेश के कई क्षेत्रों में भूमिगत जल काफी प्रदूषित है। इसमें फ्लोराइड और आर्सेनिक पाया जा रहा है। इंडिया मार्क हैंडपंप अगर अधिक गहराई से पानी आपूर्ति कर रहा है तो उसका पानी पीने लायक है, लेकिन कुछ जगहों पर नाइट्रेट, अत्यधिक लौह, कीटाणु, फ्लोराइड व आर्सेनिक पाया गया है। ऐसे में आपूर्ति किए जाने वाले पाइप पेयजल की जांच भी जरूरी होगी। लेकिन नीति में क्लोरीन जांच के अलावा अन्य जांचों के लिए जनपदीय प्रयोगशाला भेजने की बात कही गई है, जबकि असल में जनपदों की प्रयोगशालाएं भी कई जांचों के लिए लखनऊ की केंद्रीय प्रयोगशाला पर आश्रित हैं।

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