UP Politics: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसबा के चुनाव होने हैं। इससे पहले राज्य में जातीय समीकरण बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, जिसके चलते बीजेपी एक जटिल संकट से जूझ रही है। पार्टी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसमें बीजेपी का कथित कोर वोट बैंक माने जाने वाले सामान्य वर्ग का असंतोष, ओबीसी के वोट बैंक में सेंध लगने का डर एक कठिन चुनौती है। इसके अलावा बीजेपी में आंतरिक गुटबाजी और हालिया यूजीसी (UGC) नियमों को लेकर विवाद पार्टी को परेशान कर रहे हैं।
दरअसल, देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लाए गए यूजीसी के ‘इक्विटी नियमों’ की सामान्य वर्ग के लोगों ने तीखी आलोचना की। बीजेपी के कुछ राज्य स्तरीय नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से इनका विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि इन नियमों की आड़ में सामान्य वर्ग के लोगों के साथ नाइंसाफी हो सकती है।
UGC के नए नियमों ने बिगाड़ा खेल?
यूजीसी के ये नियम, वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रोक दिए गए हैं। इसी लिए पार्टी के भीतर बीजेपी के ‘ओबीसी कार्ड’ को लेकर ब्राह्मणों की बेचैनी को सामने ले आए हैं। यूजीसी के नए नियमों के चलते यूपी में ब्राह्मण-ठाकुर समीकरणों को भी जटिल हो गए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले ही इस विवाद में बीजेपी को नुकसान हो चुका है। अब यह भी कहा जा रहा है कि यह स्थिति बीजेपी की ‘व्यापक हिंदू एकीकरण’ की रणनीति के लिए खतरा पैदा कर रही है।
अखिलेश का PDA बना चुनौती
बीजेपी के लिए स्थिति की गंभीरता तब और बढ़ गई, जब विपक्षी नेता अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने ‘यादव आधार’ से आगे बढ़कर ओबीसी समुदायों के बीच पकड़ बनाने और ‘मुस्लिम-यादव’ पार्टी की छवि से हटकर PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का गठबंधन बनाया। यह रणनीति 2024 के संसदीय चुनावों में सफल रही थी। सपा 37 सीटों के साथ शीर्ष पर रही, जबकि बीजेपी महज 33 पर सिमट गई।
29 मार्च को अखिलेश यादव दादरी में ‘समाजवादी समानता भाईचारा रैली’ में जनता को संबोधित करते हैं। खास बात यह है कि यह वही क्षेत्र हैं, जहां से अखिलेश यादव ने 2012 का चुनाव अभियान शुरू किया था। उस चुनाव में सपा ने 224 सीटें जीतीं थीं। अखिलेश यादव की इस रैली का उद्देश्य पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिलों में गुर्जर, कुर्मी, सैनी और कुशवाहा मतदाताओं को अपनी ओर खींचना है।
सपा के आरोपों को लेकर बीजेपी में डर
सपा प्रमुख ने बीजेपी सरकार पर सार्वजनिक क्षेत्र में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण कोटा छीनने का आरोप लगाया है और दावा किया है कि PDA समुदायों के लिए आरक्षित हजारों सीटें खाली पड़ी हैं। बीजेपी के कुछ नेताओं को डर है कि यूजीसी नियम विवाद के कारण सपा के इन आरोपों को और बल मिल सकता है।
राज्यसभा सांसद ने कहा कि मध्य और पूर्वी जिलों में कुर्मी और कुशवाहा वोटों में पहले से ही गिरावट आई है। अब अखिलेश गुर्जरों को भी निशाना बना रहे हैं। जाट और गुर्जर वोटों का एक हिस्सा उन्हें पश्चिमी यूपी में भी और सीटें जीतने में मदद कर सकता है। माना जा रहा है कि बीजेपी ने अखिलेश और उनके PDA नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए ही ओबीसी समुदाय से आने वाले पंकज चौधरी को अपना प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है।
यूपी में ब्राह्मणों की बेचैनी
चुनाव से पहले यह ऐसा वक्त है, जब समाजवादी पार्टी अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रही है, तो उस दौरान यूजीसी विनियम, 2026 को पिछड़ी जातियों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बीजेपी के प्रयास के रूप में देखा गया था। लेकिन, इसके साथ ही पार्टी के पारंपरिक सामान्य वर्ग आधार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया भी हुई थी। सामान्य वर्ग समुदाय से आने वाले लगभग हर पार्टी सांसद ने कहा कि इससे बीजेपी सरकार में उनके समुदाय के विश्वास को ठेस पहुंची है। कई जिलों में पार्टी पदाधिकारियों ने इन नियमों को काला कानून बताते हुए अपने पदों से इस्तीफा दे दिया।
बीजेपी के ब्राह्मण नेता पहले से ही नेतृत्व द्वारा उन्हें केवल ब्राह्मण विधायकों की बैठक करने पर फटकार लगाए जाने से नाराज थे। इन नेताओं का कहना था कि ठाकुर और ओबीसी विधायकों की भी ऐसी कई बैठकें हुई हैं, लेकिन उन्हें कभी नहीं टोका गया। यूजीसी नियमों को लेकर नाराजगी इतनी गहरी थी कि एक ब्राह्मण बीजेपी नेता ने इसकी तुलना कांग्रेस के “शाह बानो मोमेंट” से कर दी।
सामान्य वर्ग की चिंताए जायज
बीजेपी के ही एक ब्राह्मण नेता ने कहा कि बीजेपी द्वारा ओबीसी कार्ड खेलने को लेकर सामान्य वर्ग में पहले से ही बहुत नाराजगी है। उन्हें लगता है कि पिछड़े समुदाय नौकरियों में उनका हक छीन रहे हैं और उत्तर प्रदेश व बिहार में सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी ले रहे हैं। पहले केवल एससी/एसटी की सुरक्षा के नियम थे जिनका दुरुपयोग बीजेपी के खिलाफ होता था, अब इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है। बीजेपी नेता ने कहा कि उनकी चिंताएं जायज हैं।
इसके अलावा एक अन्य सांसद ने कहा कि बीजेपी हिंदुत्व के एजेंडे पर सत्ता में आई थी। इसे हिंदुओं को एकजुट करना था, लेकिन वे विभाजित हैं। प्रधानमंत्री मोदी, अपने विकास के एजेंडे के अलावा, पारंपरिक जातिगत विभाजनों से ऊपर उठकर एक व्यापक हिंदू चेतना विकसित करने की बात करते रहे हैं लेकिन समुदाय में विभाजन हर दिन गहरा होता जा रहा है। ब्राह्मण चुनावी रूप से निर्णायक संख्या में नहीं हैं, लेकिन उन्हें राजनीति, नौकरशाही और शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण प्रभाव रखने वाला वर्ग माना जाता है।
सामान्य वर्ग के पास कोई विकल्प नहीं
एक नेता ने कहा कि फिलहाल समुदाय के पास कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने आगे कहा, “कांग्रेस पहले उनकी भरोसेमंद पार्टी थी, अब निजी नौकरियों में भी आरक्षण की बात करती है। जब तक सपा उनकी ओर कोई बड़ा कदम नहीं उठाती, तब तक समुदाय को बीजेपी के साथ ही रहना होगा। लेकिन वे नैरेटिव (विमर्श) को प्रभावित कर सकते हैं और मतदान के दिन वोट डालने से परहेज कर सकते हैं।
बीजेपी के भीतर यह असंतोष ऐसे समय में आया है, जब राष्ट्रीय राजनीति में सुरक्षित होने के बावजूद यूपी में उसका चुनावी ग्राफ गिरा है। साल 2014 में बीजेपी को 71 सीटें मिली थीं। 2019 में ये सीटें 62 थी लेकिन 2024 में 33 रह गईं, वहीं विधानसभा में भी 2017 की 312 सीटों के मुकाबले 2022 में वह 255 पर आ गई। आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि 2019 और 2024 के बीच गैर-यादव, गैर-कुर्मी ओबीसी और गैर-जाटव दलितों के बीच भाजपा का समर्थन कम हुआ है।
2024 के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी की समीक्षा में आंतरिक कलह को मुख्य कारण माना गया, जिसमें ब्राह्मणों का योगी आदित्यनाथ सरकार से असंतुष्ट होना भी शामिल था। संसदीय चुनावों के दौरान पश्चिमी यूपी में उम्मीदवारों के चयन को लेकर ठाकुर समुदाय में भी नाराजगी की खबरें आई थीं।
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक साल बाकी है। समाजवादी पार्टी ने चुनावी तैयारियों की शुरुआत कर दी है। लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी में बढ़त के बाद सपा उत्साहित है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए अपने कैंपेन को संभालने के लिए पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC को हायर किया है। पढ़िए पूरी खबर
