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तल्ख हो रहे हैं राज्यपाल और उप्र सरकार के रिश्ते, विधानपरिषद के नामित सदस्यों की सूची को लेकर आमने-सामने

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का पदभार संभालने के बाद से राज्यपाल राम नाइक कई मर्तबा मो. आजम खान के निशाने पर आ चुके हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। (पीटीआई फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश की सपा सरकार और राज्यपाल के बीच दिन-ब-दिन खटास आती जा रही है। विधानपरिषद के नामित सदस्यों की सूची को लेकर राजभवन और अखिलेश सरकार फिर आमने-सामने है। राज्यपाल राम नाइक ने 21 मार्च को सरकार की तरफ से भेजे गए नामित पांच विधान परिषद के सदस्यों की सूची को फिर वापस भेज कर जाहिर कर दिया है कि वह किसी भी हाल में बगैर संशोधन के उन्हीं नामों पर कोई विचार नहीं करेंगे जिनको पहले ही राजभवन खारिज कर चुका है।

राजभवन के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने विधान परिषद के नामित सदस्यों के लिए जिन पांच नामों को भेजा था उस सूची को राज्यपाल राम नाइक ने बीती 21 मार्च को फिर सरकार के पास वापस भेज दिया है। इसके पहले पांच जुलाई को भी राज्यपाल ऐसी एक सूची सरकार को वापस कर चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि राज्यपाल ने कई मर्तबा सरकार से जवाब मांगा था कि जिन शेष बचे पांच लोगों को विधान परिषद के सदस्यों के तौर पर नामित करने की सूची सरकार ने राजभवन भेजी है उनका कला, संस्कृत, विज्ञान व सामाजिक सरोकारों में क्या योगदान रहा है? राज्यपाल राम नाइक के इस सवाल का जवाब देने से अब तक अखिलेश यादव की सरकार कतराती रही है।

विधान परिषद के सौ सदस्यों में से दस फीसद यानी दस सदस्यों का मनोनयन राज्यपाल के करने की संवैधानिक व्यवस्था है। राज्यपाल इन दस सदस्यों को तब ही नामित करते हैं जब उनका सरोकार कला, साहित्य, खेल समेत विभिन्न क्षेत्रों से हो। ऐसा करने का एकमात्र उद्देश्य विधान परिषद में सभी क्षेत्रों की सहभागिता सुनिश्चित करना है। अखिलेश यादव की सरकार ने दस नामित सदस्यों में से नौ नाम बीते साल जून में राजभवन भेजे थे। जिनमें एसआरएस यादव, जीतेंद्र यादव, रामवृक्ष यादव और लीलावती कुशवाहा को राज्यपाल ने मनोनीत विधान परिषद सदस्य के तौर पर नामित करने की मंजूरी दे दी थी। जबकि सूची में शामिल पांच नाम डा कमलेश पाठक, बिल्डर संजय सेठ, रणविजय सिंह, अब्दुल सफराज खां और डा राजपाल कश्यप के नाम सरकार को लौटा दिए गए थे।

उत्तर प्रदेश में सरकार और राजभवन के बीच पनप रही तल्खी अब पुरानी हो चुकी है। राज्य की लचर कानून व्यवस्था पर राज्यपाल राम नाइक की तरफ से कई मर्तबा उठाए गए सवालों पर प्रतिक्रिया देते हुए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव प्रो राम गोपाल यादव राजभवन को संवैधानिक हद में रहने की नसीहत दे चुके हैं। वहीं प्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खां भी कई बार राज्यपाल पर सीधा हमला कर सरकार और राजभवन के बीच पनप रही तल्खी को जाहिर कर चुके हैं। प्रदेश के राज्यपाल का पदभार संभालने के बाद से राज्यपाल राम नाइक कई मर्तबा मो. आजम खान के निशाने पर आ चुके हैं।

राज्यपाल बनने के बाद राम नाईक ने आजम खां के एक करीबी को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था और इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री को लौटा दिया था। इस वाकये के बाद से आजम खां राज्यपाल के विरुद्ध हमलावर हुए। वह सिलसिला अब भी जारी है। एक और वाकया है जिससे सरकार, समाजवादी पार्टी और राजभवन के बीच के संबंधों में पनप रही तल्खी का अंदाजा लगाया जा सकता है। मुख्य सचिव के पद से हटने के बाद जावेद उस्मानी के मुख्य सूचना आयुक्त के पद की शपथ लेने के लिए राजभवन जाना था। राजभवन में शपथग्रहण समारोह आयोजित किया गया जिसमें कैबिनेट मंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव आजम खां राजभवन तो पहुंचे लेकिन उन्होंने राज्यपाल राम नाइक से न ही दुआ-सलाम की और न ही समारोह के बाद आयोजित होने वाली चाय पार्टी मे ही उन्होंने शिरकत की थी।

दरअसल, समाजवादी पार्टी चाहती है कि राज्यपाल सार्वजनिक मंचों से और मीडिया के समक्ष प्रदेश सरकार की कमियों का जिक्र करने से परहेज करें। उन्हें जो कहना हो वह मुख्यमंत्री से कहें। इस टीस को प्रो रामगोपाल यादव उजागर भी कर चुके हैं। उन्होंने पूर्व में प्रधानमंत्री से अनुरोध किया था कि बेहतर होगा कि वे राम नाइक को राज्यपाल की जिम्मेदारी से मुक्त कर केंद्र में मंत्री बना दें।

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