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यूपी: ऑपरेशन के बाद फटे पेट 3 साल की मासूम को कर दिया था बाहर- पिता का आरोप, मौत; डॉक्टर पर केस

मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने प्रयागराज के जिला अधिकारी से कहा था कि एक अस्पताल के कथित तौर पर गैरजिम्मेदार रवैये के कारण एक बच्चे की मौत होने के मामले में प्राथमिकी दर्ज कर जांच कराई जाए।

Author कौशांबी/नई दिल्ली | Updated: March 7, 2021 11:06 AM
Operation, Prayagraj, UPतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Freepik)

कौशांबी जिले के पिपरी थाना क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में तीन वर्षीय बच्ची की इलाज के दौरान मौत हो जाने के मामले में पुलिस ने एक डॉक्टर के खिलाफ शनिवार को प्राथमिकी दर्ज की। अपर पुलिस अधीक्षक समर बहादुर सिंह ने बताया कि पिपरी थाना क्षेत्र के रावतपुर स्थित एक निजी अस्पताल में केरली, प्रयागराज निवासी मुकेश मिश्रा नाम के व्यक्ति की तीन वर्षीय बच्ची, खुशी का इलाज चल रहा था।

उन्होंने बताया कि मिश्रा का आरोप है कि शुक्रवार को उनकी बेटी के ऑपरेशन के बाद डॉक्टर ने बिना टांका लगाए उसे इलाज के लिए कहीं और ले जाने की बात कही और बच्ची को अस्पताल से बाहर कर दिया। सिंह ने बताया कि परिजन बच्ची को दूसरे अस्पतालों में ले गए, लेकिन कहीं भर्ती नहीं किये जाने के कारण उसे वापस उसी अस्पताल में ले आए, जहां उसे भर्ती करने से मना कर दिया गया और इस दौरान खुशी की मौत हो गई।

खुशी की मौत के बाद आक्रोशित परिजनों तथा उनके साथ काफी संख्या में अन्य लोगों ने अस्पताल का घेराव किया। सिंह ने बताया कि सूचना पाकर आसपास के कई थानों की पुलिस वहां पहुंची और भीड़ को समझा-बुझाकर मामला शांत किया। उन्होंने बताया कि बच्ची के पिता की तहरीर पर शनिवार को निजी अस्पताल के डॉक्टर अंकित गुप्ता के खिलाफ एक मामला दर्ज किया गया। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है।

मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने प्रयागराज के जिला अधिकारी से कहा था कि एक अस्पताल के कथित तौर पर गैरजिम्मेदार रवैये के कारण एक बच्चे की मौत होने के मामले में प्राथमिकी दर्ज कर जांच कराई जाए। बता दें कि पांच मार्च को एक पत्रकार ने एक खबर ट्वीट की थी जिसमें कहा गया था कि प्रयागराज में यूनाइटेड मेड-सिटी अस्पताल में तीन साल के बच्चे के आपरेशन के लिए पांच लाख रुपये की रकम नहीं दिए जाने पर उस बच्चे के चिरे हुए पेट पर टांका लगाए बिना ही उसे घर भेज दिया गया। बाद में बच्चे की मौत हो गई।

एनसीपीसीआर ने एक बयान में कहा था, ‘‘बच्चे के परिवार की सामाजिक-आर्थिक हालत कमजोर है और ऐसे में वह अपनी जमीन बेचकर दो लाख रुपये की रकम ही दे सका। परिवार शेष रकम नहीं दे पाया जिस कारण बच्चे के पेट का टांका लगाए बिना ही उसे अस्पताल से घर भेज दिया गया।’’ आयोग ने इसी बाबत जिला अधिकारी से कहा था कि वह इस मामले की जांच कराएं और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत अस्पताल प्रशासन के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराएं।

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