उत्तर प्रदेश की राजनीति में लखनऊ सिर्फ राजधानी, एक जिला, निर्वाचन क्षेत्र ही नहीं बल्कि सत्ता का केंद्र है। यह देश की सबसे हाई-प्रोफाइल और वीआईपी सीटों में से एक है। मुख्यमंत्री आवास, विधानसभा, सचिवालय और प्रमुख सरकारी संस्थानों की मौजूदगी इसे राजनीतिक रूप से सबसे अहम जिलों में शामिल करती है। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की यह कर्मभूमि पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का अभेद्य किला रही है। ऐसे में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह समझना जरूरी है कि राजधानी की चुनावी तस्वीर क्या कहती है।
लेकिन हालिया आम चुनावों (2024) के आंकड़ों पर गौर करें तो समझ आता है कि लखनऊ की सियासत में ‘कमल’ का दबदबा बरकरार रहने के बावजूद समाजवादी पार्टी (SP) और INDIA गठबंधन ने इस किले की दीवारों में बड़ी सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश की है। आइए आंकड़ों के जरिए लखनऊ के चुनावी समीकरण को विस्तार से समझते हैं…
विधानसभा चुनाव: किस दल का रहा दबदबा?
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम इस जिले की सियासत का सबसे दिलचस्प आंकड़ा पेश करते हैं। 2017 में जहां बीजेपी ने इन 9 में से 8 सीटों पर एकतरफा कब्जा किया था, वहीं 2022 के चुनाव में समाजवादी पार्टी (SP) ने मजबूत वापसी की और मुकाबला 7-2 (7 बीजेपी, 2 सपा) पर लाकर खड़ा कर दिया।
आइए आंकड़ों के लिहाज से समझते हैं कि 2022 में किस सीट पर कौन जीता और कहां किसका पलड़ा भारी रहा। लखनऊ जिले में कुल 9 विधानसभा सीटें हैं:
मलिहाबाद विधानसभा सीट (भाजपा)
यह सुरक्षित (SC) ग्रामीण सीट लखनऊ की सबसे दिलचस्प और करीबी मुकाबले वाली सीटों में से एक रही। यहां भारतीय जनता पार्टी की जयदेवी (केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर की पत्नी) और समाजवादी पार्टी के सोनू कनौजिया के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। बीजेपी की जयदेवी ने यह मुकाबला 7745 वोटों के बेहद कम अंतर से जीता। यह ग्रामीण इलाका होने के कारण यहां किसानों और स्थानीय विकास के मुद्दों पर सपा ने भाजपा को कड़ी चुनौती दी थी।
मोहनलालगंज विधानसभा सीट (भाजपा)
यह लखनऊ जिले की दूसरी आरक्षित (SC) सीट है जो पूरी तरह ग्रामीण और अर्ध-शहरी परिवेश को खुद में समेटे हुए है। यहांं बीजेपी के अमरेश कुमार का मुकाबला सपा की सीनियर नेता सुशीला सरोज से था। इस सीट पर ग्रामीण मुद्दों, जातियों के समीकरण और स्थानीय एंटी-इंकंबेंसी के चलते कड़ा मुकाबला देखने को मिला लेकिन आखिर में भाजपा के अमरेश कुमार 16548 वोटों के अंतर से चुनाव जीतने में सफल रहे और विपक्ष की घेराबंदी को ध्वस्त कर दिया।
लखनऊ जिले की ये दोनों ग्रामीण और अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीटें हैं। मलिहाबाद से केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर की पत्नी जयदेवी (BJP) ने जीत दर्ज की थी। इन ग्रामीण सीटों पर बीजेपी का पलड़ा भारी तो रहा, लेकिन कृषि संकट और स्थानीय मुद्दों की वजह से सपा यहां हमेशा मजबूत चुनौती पेश करती है।
बख्शी का तालाब – BKT (भाजपा)
शहरी और ग्रामीण वोट की मिलीजुली आबादी वाली इस सीट पर बीेजेपी के योगेश शुक्ला और सपा के पुराने चेहरे गोमती यादव के बीच सीधी भिड़ंत हुई। इस सीट पर ओबीसी (विशेषकर यादव) और सवर्ण मतदाताओं की अच्छी-खासी तादाद है। चुनाव में भाजपा ने यहां अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन किया और योगेश शुक्ला ने 27788 वोटों के एक बड़े मार्जिन से सपा को शिकस्त देकर कमल खिलाया।
यह ग्रामीण और शहरी मिक्स सीट है। यहां यादव और ओबीसी वोटर्स की संख्या अच्छी होने के बावजूद बीजेपी के योगेश शुक्ला ने सपा के गोमती यादव को मात दी थी, लेकिन ग्रामीण इलाकों में सपा का जनाधार लगातार बढ़ रहा है।
सरोजिनी नगर विधानसभा सीट (भाजपा)
2022 के चुनाव में यह लखनऊ की सबसे हाई-प्रोफाइल सीटों में से एक थी। भाजपा ने यहां से पूर्व प्रवर्तन निदेशालय (ED) अधिकारी राजेश्वर सिंह को मैदान में उतारा था जबकि सपा की तरफ से पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा दावेदार थे। एयरपोर्ट और नए विकसित हो रहे सब-अर्बन इलाकों को समेटने वाली इस सीट पर भाजपा ने एकतरफा लहर बनाई। राजेश्वर सिंह ने 56186 वोटों के भारी-भरकम अंतर से सपा को हराकर यहां भाजपा का झंडा बुलंद रखा।
यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा शहरी-अर्धशहरी इलाका है जहां बीजेपी का सांगठनिक ढांचा बहुत मजबूत है।
लखनऊ पश्चिम विधानसभा सीट (सपा)
पुराने लखनऊ के हिस्से और मुस्लिम व व्यावसायिक आबादी के प्रभाव वाली इस सीट पर समाजवादी पार्टी ने भाजपा के किले में बड़ी सेंध लगाई। सपा के अरमान खान ने यहां भाजपा के अंजनी श्रीवास्तव को बेहद रोमांचक मुकाबले में मात दी। अरमान खान ने यह चुनाव 8184 वोटों के अंतर से जीता। यह सीट दिखाती है कि जहां भी ध्रुवीकरण और अल्पसंख्यक मतदाता एकजुट हुए, वहां सपा का पलड़ा भारी रहा।
2022 में यह सीट सपा के लिए सबसे बड़ी कामयाबी बनकर उभरी। मुस्लिम बाहुल्य और पुराने लखनऊ के मिजाज वाले इस क्षेत्र में सपा का पलड़ा काफी भारी माना जाता है।
लखनऊ उत्तर विधानसभा सीट (भाजपा)
इस सीट पर भाजपा के मौजूदा विधायक डॉ. नीरज बोरा का मुकाबला सपा की युवा और छात्र राजनीति से उभरीं चेहरा पूजा शुक्ला से था। न्यू हैदराबाद, अलीगंज और कपूर्थला जैसे पॉश और मिले-जुले आबादी वाले इस क्षेत्र में मुकाबला काफी कड़ा माना जा रहा था। हालांकि, मध्यमवर्गीय और साइलेंट वोटर्स के सहारे भाजपा के डॉ. नीरज बोरा ने अपनी सीट बचा ली और 33953 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
इस सीट पर बीजेपी के नीरज बोरा को दूसरी बात जीत जरूर मिली थी लेकिन सपा की युवा प्रत्याशी पूजा शुक्ला ने उन्हें बेहद कड़ी टक्कर दी थी। यही वजह है कि अब सीट अब ‘टॉस-अप’ (यानी कांटे की टक्कर) वाली श्रेणी में आ चुकी है।
लखनऊ मध्य विधानसभा सीट (सपा)
हजरतगंज, अमीनाबाद और चौक जैसे लखनऊ के दिल कहे जाने वाले इलाकों को समेटने वाली इस सीट पर समाजवादी पार्टी के कद्दावर और जमीन से जुड़े नेता रविदास मेहरोत्रा ने जीत का परचम लहराया। उन्होंने भाजपा के रजनीश गुप्ता को बेहद कड़े और जमीनी स्तर पर लड़े गए मुकाबले में 10935 वोटों से पराजित किया। व्यापारिक वर्ग की नाराजगी और मुस्लिम मतदाताओं के एकतरफा झुकाव ने यहां सपा का पलड़ा भारी कर दिया था।
व्यापारिक और मुस्लिम आबादी की अच्छी संख्या होने के कारण यहां सपा बेहद मजबूत स्थिति में है।
लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट (भाजपा)
यह सीट लखनऊ जिले में भाजपा का सबसे अभेद्य और मजबूत किला साबित हुई। 2022 के चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता आशुतोष टंडन (अब स्वर्गीय) ने सपा के अनुराग सिंह को यहां चारों खाने चित कर दिया। आशुतोष टंडन ने रिकॉर्ड 68731 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। पूरे लखनऊ जिले में किसी भी उम्मीदवार की सबसे बड़ी जीत थी।
बाद में यहां हुए उपचुनाव में भी भाजपा के ओ.पी. श्रीवास्तव ने इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा। इंदिरा नगर और गोमती नगर जैसे पॉश इलाकों वाली यह सीट पूरी तरह भाजपा की कोर सीट मानी जाती है।
लखनऊ कैंट विधानसभा सीट (भाजपा)
इस वीआईपी सीट पर उत्तर प्रदेश सरकार के कद्दावर नेता और डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने दांव लगाया था जिनके सामने सपा ने सुरेंद्र सिंह गांधी को उतारा था। सेना के कैंटोनमेंट क्षेत्र और सरकारी कर्मचारियों की बहुलता वाली इस पारंपरिक भाजपा सीट पर ब्रजेश पाठक ने पार्टी के दबदबे को कायम रखा। उन्होंने सपा उम्मीदवार को 39512 वोटों के बड़े अंतर से मात देकर विधानसभा में अपनी जगह पक्की की।
ये दोनों सीटें लखनऊ जिले में बीजेपी के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाती हैं। 2022 में सूबे के डिप्टी सीएम बृजेश पाठक ने लखनऊ कैंट से बड़ी जीत दर्ज की वहीं पूर्व मंत्री आशुतोष टंडन (अब स्वर्गीय) ने लखनऊ पूर्व सीट से भारी अंतर से जीत हासिल की थी। यहां मध्यमवर्गीय, नौकरीपेशा और सवर्ण मतदाता बीजेपी का मुख्य कोर वोट बैंक हैं।
शहरी बनाम ग्रामीण राजनीति
लखनऊ की विधानसभा सीटों पर राजनीति एक जैसी नहीं है। लखनऊ पूर्व, उत्तर, कैंट और मध्य जैसी सीटों पर शहरी मतदाताओं का प्रभाव ज्यादा है जबकि मलिहाबाद, मोहनलालगंज और बख्शी का तालाब जैसे क्षेत्रों में ग्रामीण और अर्ध-शहरी मुद्दे अधिक प्रभावी रहते हैं। यही वजह है कि पूरे जिले के बजाय हर सीट का चुनावी व्यवहार अलग-अलग देखा जाता है।
2027 से पहले किन मुद्दों पर रहेगी नजर?
राजधानी में चुनावी चर्चा जिन मुद्दों के आसपास रहती है, उनमें शामिल हैं-
-ट्रैफिक और शहरी परिवहन
-सड़क और ड्रेनेज
-रोजगार और निवेश
-कानून-व्यवस्था
-नई आवासीय कॉलोनियों का विकास
-पेयजल और सफाई व्यवस्था
इन मुद्दों पर राजनीतिक दलों के अभियान और स्थानीय प्रत्याशियों का प्रदर्शन मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकता है।
पूरी तरह एकतरफा नहीं मुकाबला
बीजेपी का पलड़ा क्यों भारी है? इसका सीधेतौर पर जवाब है- लखनऊ में संघ (RSS) का मजबूत ढांचा, शहरी सवर्ण मतदाताओं का एकतरफा समर्थन और अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत का भावनात्मक जुड़ाव आज भी बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है। राजनाथ सिंह का सर्वमान्य चेहरा और केंद्र व राज्य सरकार के विकास कार्य (जैसे आउटर रिंग रोड, मेट्रो) पार्टी के पक्ष में माहौल बनाए रखते हैं।
गठबंधन के बाद कांग्रेस के पारंपरिक वोटों का सपा में ट्रांसफर होना और पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले का जमीनी स्तर पर असर दिखाना अखिलेश यादव की पार्टी के हौसले बुलंद कर रहा है। महंगाई, स्थानीय स्तर पर एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) और युवाओं में रोजगार का मुद्दा सपा के पक्ष में वोट प्रतिशत बढ़ाने में मददगार साबित हुआ है।
आंकड़ों का निचोड़ यह है कि लखनऊ के ग्रामीण और पॉश शहरी इलाकों में बीजेपी आज भी काफी आगे है लेकिन पुराने लखनऊ और मध्य क्षेत्र के इलाकों में सपा का पलड़ा भारी है। 2017 के मुकाबले 2022 में सपा ने अपना वोट प्रतिशत और सीटें (0 से बढ़ाकर 2) दोनों सुधारी थीं जिसने लखनऊ की एकतरफा मानी जाने वाली सियासत को अब पूरी तरह से ‘कांटे के मुकाबले’ में तब्दील कर दिया है। इससे संकेत मिलता है कि राजधानी की राजनीति में मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं है और अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी समीकरण भिन्न हैं।
