उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 अभी कई महीने दूर है ऐसे में महिलाओं के वोटों की लड़ाई तेज होती जा रही है। ऐसी खबरें हैं कि भाजपा सरकार गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की महिलाओं के लिए नकद सहायता योजना पर विचार कर रही है। इस बीच, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सत्ता में वापसी होने पर महिलाओं के लिए 40,000 रुपये की वार्षिक सहायता योजना की घोषणा कर इस लड़ाई को और भी तेज कर दिया है।

यूपी के मतदाताओं में लगभग आधी संख्या में महिलाएं शामिल हैं जो एक अलग चुनावी टारगेट भी मानी जाती हैं। 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 13.39 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं जिनमें 6.09 करोड़ महिलाएं शामिल हैं। मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी 45.46% है जबकि पुरुषों की हिस्सेदारी 54.54% है।

अखिलेश ने बीजेपी के प्रस्ताव को जुमला बताया

भाजपा जहां कल्याणकारी योजनाओं के वितरण, विशेष रूप से सीधे परिवारों तक पहुंचने वाली योजनाओं के इर्द-गिर्द एक राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रही है, वहीं गरीब परिवारों की महिलाओं को प्रत्यक्ष नकद लाभ उस राजनीति में फिट बैठेगा। साथ ही सरकार को मतदाताओं के सामने आगे बढ़ाएगा। हालांकि, प्रस्तावित योजना की खबरों ने अखिलेश को सहायता की राशि को लेकर भाजपा को चुनौती देने का अवसर भी दिया है।

पहले X पर एक पोस्ट में अखिलेश ने कथित 20,000 रुपये के प्रस्ताव को एक और जुमला बताया और कहा कि भाजपा के पास वोट मांगने के लिए पैसे के अलावा कुछ नहीं बचा है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार प्रचार पर इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बजाय पहले ही ऐसी सहायता प्रदान कर सकती थी। इसके बाद अखिलेश ने घोषणा की कि सपा सरकार प्रत्येक महिला को प्रति वर्ष 40,000 रुपये प्रदान करेगी और यह राशि सालाना बढ़ती जाएगी।

भाजपा और सपा के बीच महिला वोटर्स को साधने की होड़

इस घोषणा का महत्व इसकी राशि के साथ-साथ इसके समय में भी निहित है। भाजपा द्वारा किसी योजना की औपचारिक घोषणा का इंतजार करने और फिर उस पर प्रतिक्रिया देने के बजाय, सपा ने अगली सरकार से महिलाओं की अपेक्षाओं के लिए अपना मानदंड स्थापित करने का प्रयास किया है। इससे भाजपा कुछ हद तक फंस गयी है। अगर वह कम राशि की घोषणा करती है तो सपा इसे अपर्याप्त बता सकती है और अगर वह राशि बढ़ाती है तो चुनावी प्रतिस्पर्धा के बढ़ने का जोखिम रहता है।

इस घोषणा के साथ सपा प्रमुख ने यह तर्क देने की भी कोशिश की है कि मुद्दा केवल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार महिलाओं को कुछ देती है या नहीं बल्कि यह होना चाहिए कि कितना, किन शर्तों पर और कितने समय तक।

पिछले चुनावों से सबक

साल 2022 के विधानसभा चुनावों में 559 महिलाओं ने चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने 155 महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, भाजपा ने 45, बसपा ने 38 और सपा ने लगभग 42। इनमें से केवल 47 ही विजयी रहीं। कांग्रेस की एक और सपा की 12 उम्मीदवार विजयी रहीं जबकि शेष विजेता भाजपा और उसके सहयोगी दलों से थीं। कांग्रेस ने 2022 के चुनावों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को लेकर जोरदार प्रचार किया था जिसमें एआईसीसी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का नारा ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ भी शामिल था लेकिन इसका चुनावी लाभ कम ही मिला। वहीं दूसरी ओर, भाजपा ने कम महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा लेकिन विजयी महिला उम्मीदवारों में उसे सबसे ज्यादा फायदा हुआ।

समाजवादी पार्टी के लिए सबक

समाजवादी पार्टी के लिए यह सबक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पार्टी अब महिलाओं के मुद्दे को केवल प्रतिनिधित्व के रूप में नहीं बल्कि एक प्रत्यक्ष आर्थिक प्रस्ताव के माध्यम से सुलझाने की ओर अग्रसर है जो कई राज्यों में जोर पकड़ चुकी कल्याणकारी और नकद हस्तांतरण की राजनीति पर आधारित है। राजनीतिक गणना यह है कि किसी महिला के खाते में सीधे जमा किया गया पैसा, किसी कल्याण कार्यक्रम की तुलना में लाभार्थी और सरकार के बीच अधिक तुरंत संबंध स्थापित कर सकता है।

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मायावती की बसपा आज काफी कमजोर हो चुकी है। राज्य में हुए पिछले तीन चुनावों ने उत्तर प्रदेश की चार बार की मुख्यमंत्री मायावती को राज्य की राजनीति से हाशिए पर धकेल दिया है। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों के लिए अवसर खुल गए। ऐसे में 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों में दलित वोटों का हिस्सा पाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच एक दिलचस्प होड़ मच गई है। खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें