राजनीति की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश में करीब छह महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। यहां की राजनीति में दलित मतदाता की बड़ी भूमिका मानी जाती है। लंबे समय तक मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में दलित वोटों की पर्याय रही हैं,लेकिन अब ऐसा नहीं है।
मायावती की बसपा आज काफी कमजोर हो चुकी है। राज्य में हुए पिछले तीन चुनावों ने उत्तर प्रदेश की चार बार की मुख्यमंत्री मायावती को राज्य की राजनीति से हाशिए पर धकेल दिया है। ऐसे में राजनीतिक पार्टियों के लिए अवसर खुल गए। ऐसे में 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों में दलित वोटों का हिस्सा पाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच एक दिलचस्प होड़ मच गई है।
एक तरफ भाजपा ने भदोही का नाम संत रविदास नगर करने का ऐलान कर दिया है। यही वजह है कि 15वीं सदी के संत-कवि संत रवि दास को सम्मानित करने के लिए सात महीने का अभियान चला रही है।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव दलितों के लिए 14 अतिरिक्त सीटों की घोषणा कर अपनी पिछड़ी, दलित, अल्पसंख्याक राजनीति को मजबूत कर रहे हैं। कांग्रेस भी दशकों पहले खोए हुए मतदाताओं को वापस जीतने की कोशिश कर रही है। वहीं, उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से सांसद चंद्रशेखर आजाद राज्य में दलितों की बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश 2027 की ओर बढ़ रहा है। सवाल यह है कि अगर बसपा का समर्थन आधार लगातार गिरता रहा, तो मायावती का पुराना समर्थक आधार कहां जाएगा और उनके प्रतिद्वंद्वियों में से किसे सबसे ज्यादा फायदा होगा?
206 सीटों से एक सीट तक: बसपा ने कैसे अपनी पकड़ खोई
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा का उदय जितना नाटकीय था। उतना ही नाटकीय उसका पतन भी रहा। इस पार्टी की स्थापना कांशीराम ने 1984 में दलितों और अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों को एक स्वतंत्र आवाज देने के विचार से की थी।
मायावती, जो उनकी राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में उभरीं। उन्होंने उत्तर प्रदेश में बसपा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनके नेतृत्व में बसपा ने 2007 के विधानसभा चुनावों में अपने दम पर बहुमत हासिल किया, जिसमें उसने 30.43% वोट शेयर के साथ 206 सीटें जीतीं।
2021 की जनगणना के अनुसार, उत्तर प्रदेश की लगभग 21% आबादी वाले दलित वर्षों से मायावती की बहुजन समाज पार्टी का मुख्य आधार रहे हैं। लेकिन अब यह स्थिति बदल गई है।
आज बसपा एक बेहद कमजोर ताकत है। मायावती पिछले दो चुनावों में राज्य में दलितों का समर्थन जुटाने में नाकाम रही हैं, जिससे अन्य राजनीतिक दावेदारों के लिए अवसर खुल गया है।
2022 के विधानसभा चुनावों में बसपा को सिर्फ 1 सीट मिली। जिसमें उसे 12.88% वोट मिले। यह 2017 में मायावती को मिली 19 सीटों और 22.23% वोटों की तुलना में भारी गिरावट थी।
2024 के लोकसभा चुनावों ने यह साबित कर दिया कि मायावती का 2022 का निराशाजनक प्रदर्शन कोई अपवाद नहीं था। बसपा सुप्रीमो एक भी लोकसभा सीट जीतने में असफल रहीं, जबकि उनकी पार्टी का वोट शेयर 2019 के 19.43% से गिरकर 9.4% हो गया। स्पष्ट रूप से इन परिणामों ने दलितों के बीच बसपा के प्रभाव में लगातार गिरावट को और पुष्ट किया।
उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनाव 2024 परिणाम
| पार्टी | लड़ी गई सीटें | जीती गई सीटें |
|---|---|---|
| समाजवादी पार्टी (SP) | 62 | 37 |
| राष्ट्रीय लोक दल (RLD) | 2 | 2 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 17 | 6 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 75 | 33 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 79 | 0 |
| अपना दल (सोनेलाल) | 2 | 1 |
| अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) | 1 | 0 |
| आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) | 2 | 1 |
ऐसे में मायावती 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी हैं, लेकिन उनके सामने कई चुनौतियां हैं। बसपा प्रमुख ने न सिर्फ मतदाताओं का समर्थन खोया है, बल्कि अपनी पार्टी पर भी उनका नियंत्रण करीब खत्म सा लगता है। इसलिए, जब मायावती ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि आगामी चुनाव के सभी उम्मीदवारों का चयन वे स्वयं करेंगी, न कि उनके भतीजे आकाश आनंद, तो यह उनकी पार्टी के आंतरिक संघर्ष का संकेत था।
आकाश आनंद, जो अतीत में मायावती के कभी पसंदीदा रहे हैं तो कभी नहीं, उन्होंने इस सप्ताह हाथरस के सादाबाद से पार्टी के 2027 विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत की।
मायावती, जिन पर अक्सर भाजपा की मदद करने का आरोप लगता रहा है। उन्होंने चुनाव पूर्व किसी भी गठबंधन से इनकार किया है। उन्होंने दावा किया है कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए कुछ उम्मीदवारों को पहले ही अंतिम रूप दे दिया गया है। मायावती ने पार्टी कार्यकर्ताओं से चुनाव से पहले पार्टी का पुनर्निर्माण शुरू करने और ओबीसी समुदाय का समर्थन जुटाने को कहा है। कार्यकर्ताओं को स्पष्ट रूप से पार्टी के पिछले शासनकाल की याद दिलाने और उन्हें यह समझाने के लिए कहा गया है कि ओबीसी समुदाय का वास्तविक लाभ और कल्याण बसपा और उसकी “लौह महिला सरकार” के साथ है।
हालांकि, मायावती को यह समझना होगा कि बसपा के लिए केवल अपने मुख्य दलित वोट बैंक को बचाकर सत्ता में वापस आना मुश्किल होगा। उसे दलित-ओबीसी गठबंधन को फिर से बनाना होगा, जिसने मूल रूप से मायावती को लखनऊ में बहुमत के साथ सत्ता में पहुंचाया था।
2027 से पहले भाजपा की दलितों तक पहुंचने की कोशिशें और तेज़ हो गई हैं। बसपा के पतन का एक दिलचस्प परिणाम यह रहा है कि भाजपा दलितों को लुभाने के लिए आक्रामक रूप से प्रयास कर रही है। पिछले महीने जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर करने की घोषणा की तो उन्होंने 2027 के चुनावों से पहले दलितों को लुभाने की होड़ में भाजपा को सीधे केंद्र में ला खड़ा किया।
इस कदम ने नाम परिवर्तन की राजनीति को लेकर एक पुराना राजनीतिक विवाद फिर से हवा दे दी है। मायावती ने ही दिसंबर 1997 में भदोही का नाम बदलकर संत रविदास नगर रखा था। अखिलेश यादव ने 2014 में पुराना नाम बहाल कर दिया था। अब संत रविदास नगर का नाम वापस लाकर योगी ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है, जिसमें उन्होंने समाजवादी पार्टी पर दलित प्रतीक को मिटाने का आरोप लगाया है और भाजपा को इसे बहाल करने के लिए तैयार पार्टी के रूप में पेश किया है।
मायावती ने सार्वजनिक रूप से इस फैसले का स्वागत किया, जो सत्तारूढ़ दल के साथ सहमति का एक दुर्लभ क्षण था। हालांकि, उन्होंने मतदाताओं को यह याद दिलाने में भी जल्दी की कि जिले का नाम सबसे पहले उन्हीं की सरकार ने बदला था और अखिलेश के शासनकाल में इस फैसले को बाद में पलट दिया गया था।
पार्टी को इस बात का एहसास है कि दलितों के वोट हासिल किए जा सकते हैं, इसलिए वह उन्हें लुभाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। पार्टी का ‘समरसता संकल्प अभियान’ अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे दो महत्वपूर्ण राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के साथ ही शुरू करने की योजना बनाई गई है।
इन दोनों राज्यों में दलितों की अच्छी खासी आबादी है, जो कई निर्वाचन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 2022 के विधानसभा चुनावों में, भाजपा और उसके सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने मिलकर 63 अनुसूचित जाति (एससी) सीटें जीतीं, जबकि तत्कालीन समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को केवल 20 सीटें मिली थीं। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों ने परिदृश्य बदल दिया, जिसमें सपा और कांग्रेस ने राज्य की 80 सीटों में से 43 सीटें जीतकर भाजपा को आक्रामक रूप से प्रचार करने के लिए मजबूर कर दिया। फैजाबाद सीट का सपा के अवधेश प्रसाद, जो एक पासी नेता हैं। उनके हाथों हारना विशेष रूप से महत्वपूर्ण था और इसने अखिलेश यादव को अपने सार्वजनिक जीवन में बदलाव लाने के अभियान को और भी मजबूत करने का मौका दिया।
इस साल की शुरुआत में योगी आदित्यनाथ सरकार ने “डॉ. बी.आर. आंबेडकर मूर्ति विकास योजना” को मंजूरी दी, जिसके तहत राज्य के 403 विधानसभा क्षेत्रों में से प्रत्येक को समाज सुधारकों की मूर्तियों के सौंदर्यीकरण और विकास के लिए 1 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएंगे।
दलितों को लुभाने के लिए भाजपा के प्रयास हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिए हैं। योगी सरकार में शामिल किए गए छह नए मंत्रियों में से दो दलित थे। पासी समुदाय से कृष्ण पासवान और वाल्मीकि समुदाय से सुरेंद्र सिंह दलेर। तीन अन्य मंत्री ओबीसी समुदाय से थे। दो गैर-यादव ओबीसी मंत्रियों को स्वतंत्र प्रभार भी दिया गया।
2027 से पहले भाजपा का प्राथमिक कार्य पिछले एक दशक में हासिल किए गए गैर-जाटव दलित समर्थन को बरकरार रखना और 2024 की पुनरावृत्ति को रोकना होगा।
सपा की दलितों तक पहुंच
2024 के लोकसभा चुनावों ने यह भी दिखाया कि उत्तर प्रदेश के दलित अन्य राजनीतिक दलों का समर्थन करने के लिए तैयार थे, जिन्होंने उन्हें लुभाने की कोशिश की। दलितों के समर्थन ने अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी की शानदार सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने 2024 में 37 सीटें जीतीं।
अपने सहयोगी कांग्रेस के साथ मिलकर, इंडिया ब्लॉक ने राज्य की 80 सीटों में से 43 सीटें जीतकर भाजपा को बैकफुट पर धकेल दिया। अखिलेश यादव, जिन्होंने अपनी राजनीति को पीडीए (पिछड़े, दलित और अपलसंख्याक) के इर्द-गिर्द केंद्रित किया है। उन्होंने 2024 के चुनावों में दलितों के बीच अपनी मजबूत पकड़ का लाभ उठाया। उनकी समाजवादी पार्टी ने सामान्य सीटों से दो दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। इनमें से एक ने महत्वपूर्ण फैजाबाद सीट जीत ली, जबकि दूसरे को मेरठ में भाजपा से मात्र 10,585 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले अखिलेश ने सामान्य सीटों पर 14 दलित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की योजना की घोषणा कर दी है। उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 84 सीटें और अनुसूचित जनजाति के लिए दो सीटें आरक्षित हैं। सामान्य सीटों पर 14 और उम्मीदवारों के साथ, सपा के लिए आरक्षित उम्मीदवारों की कुल संख्या बढ़कर 100 हो जाएगी। इससे दलितों के बीच उनकी सार्वजनिक विकास नीति के अनुरूप संदेश को और मजबूत करने में मदद मिलेगी। यह कदम सपा को मुस्लिम-यादव पार्टी होने की छवि से भी छुटकारा दिलाने में सहायक होगा।
खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है कांग्रेस
राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कांग्रेस में दलितों की ‘केंद्रीय भूमिका’ होगी। 1990 के दशक में मायावती और बसपा द्वारा दलितों का विशाल वोट बैंक बनाने से पहले, उत्तर प्रदेश के दलितों की पहली पसंद कांग्रेस ही थी। उसके बाद लगभग तीन दशकों तक कांग्रेस उत्तर प्रदेश की राजनीति से लगभग बाहर ही रही।
राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश चुनाव की अपनी यात्रा की शुरुआत इस बात को स्वीकार करते हुए की है कि पार्टी 1980 और 1990 के दशक में दलित समुदाय के लिए सही कदम उठाने में विफल रही थी। उन्होंने दलितों को एकजुट करने और समुदाय को आत्मविश्वास दिलाने के लिए कांशी राम की प्रशंसा भी की।
राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय के अपने भाषण में संविधान को एक अहम मुद्दा बना लिया है। उन्हें अक्सर संविधान की लाल किताब लिए हुए देखा जाता है। साथ ही वे चेतावनी देते हैं कि संवैधानिक अधिकार और आरक्षण खतरे में हैं। इसी भाषण में उन्होंने बार-बार बी.आर. आंबेडकर का जिक्र किया है और दावा किया है कि कांग्रेस खुद को संविधान के संरक्षक के रूप में स्थापित करना चाहती है।
पार्टी ने उत्तर प्रदेश की कमान एक दलित नेता को सौंपी है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रमुख राजेंद्र पाल गौतम को 2027 के चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि गौतम ने इसी साल की शुरुआत में मायावती के लखनऊ स्थित आवास पर उनसे मिलने का असफल प्रयास भी किया था।यह देखना बाकी है कि पार्टी इस प्रचार-प्रसार को वोटों में तब्दील कर पाएगी या नहीं।
चंद्रशेखर आजाद एक और दावेदार
फिर हैं चंद्रशेखर आजाद, जिन्होंने 2024 में नगीना से जीत हासिल करके उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में एक प्रमुख चेहरा बन गए। भाजपा, सपा या कांग्रेस के विपरीत, आजाद बसपा से अलग एक स्वतंत्र मंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अब उनके सामने चुनौती यह है कि वे अपनी लोकप्रियता को एक निर्वाचन क्षेत्र से आगे ले जाएं और 2027 में पूरे राज्य में अपनी ताकत दिखाने के लिए एक मजबूत संगठन का निर्माण करें।
यही बात उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को दिलचस्प बनाती है। दशकों से उत्तर प्रदेश की राजनीति जाति के इर्द-गिर्द घूमती रही है। राजनीतिक दल अपनी चुनावी रणनीतियों को सामाजिक गठबंधनों, समुदायों की वफादारी और पारंपरिक वोट बैंक के आधार पर बनाते हैं।
मायावती को अब दलितों का उतना समर्थन प्राप्त नहीं है जितना पहले हुआ करता था, लेकिन उनका वोट बैंक खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि मायावती 2027 के विधानसभा चुनाव में अपने कोर वोट बैंक का कितना फीसदी हासिल कर पाती हैं।
मायावती ने एक और नेता को पार्टी से निकाला, कार्यकर्ताओं से बोलीं- मिशन में पूरे जी जान से लगे रहना
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे अनन्त कुमार मिश्रा को पार्टी से निकाल दिया है। उन्होंने खुद X पर एक पोस्ट के जरिए यह जानकारी दी। मायावती ने X पर पोस्ट कहा, “उत्तर प्रदेश में बीएसपी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे श्री अनन्त कुमार मिश्रा उर्फ अन्टू मिश्रा को उनकी पार्टी विरोधी गतिविधियों आदि के फलस्वरूप आज तत्काल प्रभाव से उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है।” पढ़ें पूरी खबर।
