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मुजफ्फरनगर दंगे से बने हालात को भुनाने की कोशिश में पार्टियां

इस बार विधानसभा चुनाव में पश्चिम यूपी में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल मुजफ्फरनगर दंगे से उपजे हालात को भुनाने की की कोशिश की है।

Author नई दिल्ली | February 3, 2017 2:46 AM
अगस्त और सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर और उसके आसपास के क्षेत्रों में सांप्रदायिक झड़पों में 60 लोगों की मौत हो गयी थी जबकि 40,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे। (फाइल फोटो)

विष्णु मोहन

इस बार विधानसभा चुनाव में पश्चिम यूपी में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल मुजफ्फरनगर दंगे से उपजे हालात को भुनाने की की कोशिश की है। इनमें से अधिकांश के उम्मीदवार किसी न किसी रूप से दंगे या उसके बाद के हालात से जुड़े हैं। किसी पर दंगा भड़काने जैसे आरोप हैं तो कोई बाद के हालात को प्रभावित करने का आरोपी है। लगभग सभी दल दंगे के बाद यहां हुए जातीय ध्रुवीकरण के समीकरण को भुनाने के प्रयास में हैं। राजनीतिक दलों की इसी कोशिश का नतीजा है कि इस बार पिछले चुनावों के दौरान ज्वलंत रहने वाले स्थानीय मुद्दे गायब हैं। अपनी इन्हीं कोशिशों को लेकर भाजपा, बसपा व सपा-कांग्रेस गठबंधन सभी को उम्मीद है कि 11 फरवरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुल 15 जिलों की 73 सीटों पर होने वाले मतदान में उनके प्रत्याशियों को कामयाबी मिलेगी। माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में मुजफ्फरनगर दंगे के अलावा पश्चिमी यूपी में छाए रहे बिसाहड़ा हिंसा, मथुरा जवाहरबाग हिंसा, लव जिहाद व कैराना पलायन आदि मुद्दे भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। जिस लिहाज से पार्टियों ने अपने प्रत्याशियों का चयन किया है उससे तो यही जाहिर हो रहा है कि पार्टियों के सामने बाकी सभी मुद्दे गौण हैं। कोई भी दल किसानों से जुड़े मुद्दों मसलन खेती के लिए पानी, बिजली, खाद बीज पर चर्चा नहीं कर रहा है।

यह पश्चिम यूपी के बदले हालात ही थे कि 2012 के विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर में एक भी सीट हासिल न कर पाने वाली भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर के साथ-साथ सहारनपुर, बिजनौर, कैराना, मेरठ, बुलंदशहर समेत बागपत तक में जीत हासिल कर सबको चौंका दिया था। यहां एक बार फिर अपनी पैठ बनाने की कोशिश में भाजपा ने इस बार दंगे के आरोपी रहे मौजूदा विधायक संगीत सोम व सुरेश राणा को उम्मीदवार बनाया है। पार्टी ने इसके साथ ही दंगे के समय हिंसा के आरोप में रासुका में निरुद्ध किए गए विक्रम सैनी के अलावा दंगे में नामजद हुए उमेश मलिक व एक अन्य आरोपी कपिल देव को उम्मीदवार बनाया है। जबकि बसपा ने भी दंगे के समय खालापार में अल्पसंख्यकों की रैली करने में नामजद हुए विधायक नूरसलीम राणा को चरथावल से उम्मीदवार बनाया है। ऐसे ही बहुजन समाज पार्टी ने दंगे के समय अपने भाषणों को लेकर चर्चा में आए सांसद कादिर राणा की पत्नी सैयदा राणा को बुढ़ाना से टिकट दिया है। कादिर राणा के खिलाफ इस मामले में मुकदमा भी दर्ज हुआ था।

यह बात भी कमोबेश साफ हो चुकी है कि दंगे के बाद जाट और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो चुका है। शायद यही वजह है कि इस बार बसपा के साथ ही सपा ने भी पश्चिम यूपी में बड़ी संख्या में मुसलिम उम्मीदवारों पर दांव लगाया है। । सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन कर पश्चिम यूपी के मुसलमान वोटों को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की है। इसका कारण है कि बिजनौर, शामली, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर में इस समुदाय के वोट 40 फीसद से अधिक जबकि मेरठ में 34 फीसद से अधिक हैं। गाजियाबाद और बागपत में 25 फीसद से ज्यादा और अलीगढ़ में लगभग 20 फीसद मुसलिम मतदाता हैं।

पश्चिम यूपी के कुल 26 जिलों में जातिगत वोटों का फीसद
– लगभग 25.90 फीसद मुसलिम
– लगभग 17 फीसद जाट आबादी

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