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भूजल संरक्षण में जनभागीदारी सुनिश्चित करेंगे जलमित्र

विशेषज्ञों का कहना है कि 1970 के दशक में हरित क्रांति की शुरुआत के दौरान भूमिगत जल के प्रयोग में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है, जो लगातार जारी है।

Author नई दिल्ली | April 22, 2016 1:19 AM
(Express Photo by Partha Paul, Dhumchipara. 11.11.2015)

देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और अर्थव्यवस्था में भूमिगत जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए सरकार ने गिरते भूजल स्तर की समस्या से निपटने के लिए दीर्घकालिक उपायों के साथ ही कुओं व तालाबों के संरक्षण के महत्त्व, सिंचाई के स्रोतों के विकास और जल स्रोतों के पुनर्जीवन के बारे में ‘जल मित्रों’ के जरिए जनभागीदारी के साथ जागरूकता फैलाने की पहल की है। जल संसाधन मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि इसके तहत स्थानीय जल पेशेवरों को जल संबंधी मुद्दों के संबंध में जन जागरूकता फैलाने और जल से जुड़ी समस्याओं के निराकरण के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण देकर उन्हें ‘जल मित्र’ बनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इसके तहत संबंधित महिला पंचायत सदस्यों को ‘जल नारी’ बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। प्रत्येक जल ग्राम में सुजलम कार्ड के रूप में ‘एक जल स्वास्थ्य कार्ड तैयार किया जाएगा, जो गांव के लिए उपलब्ध पेयजल स्रोतों की गुणवत्ता के बारे में वार्षिक सूचना प्रदान करेगा।

जल ग्राम योजना के तहत जल ग्राम का चयन इसके कार्यान्वयन के लिए गठित जिला स्तरीय समिति द्वारा किया जाएगा। प्रत्येक गांव को एक इंडेक्स वैल्यू प्रदान किया जाएगा, जो जल की मांग और उपलब्धता के बीच अंतर के आधार पर तैयार होगा और सबसे अधिक इंडेक्स वैल्यू वाले गांव को जल क्रांति अभियान कार्यक्रम में शामिल किया जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि 1970 के दशक में हरित क्रांति की शुरुआत के दौरान भूमिगत जल के प्रयोग में महत्त्वपूर्ण वृद्धि हुई है, जो लगातार जारी है। जिसके फलस्वरूप जलस्तर घटने, खेतों में कुओं की कमी और सिंचाई स्रोतों की दीर्घकालिकता में हृास के रूप में पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इसके अलावा देश में कई जगहों पर प्राकृतिक गुण और मानवोद्भव कारणों से संपर्क प्रभाव के कारण भूमिगत जल पीने योग्य नहीं रह गया है।

मंत्रालय ने प्रत्येक जल ग्राम के लिए ब्लॉक स्तरीय समितियों द्वारा ग्राम में जल के स्रोत, मात्रा व गुणवत्ता के उपलब्ध आंकड़ों व अनुमानित आवश्यकताओं के आधार पर एकीकृत विकास योजना बनाई है। इस सिलसिले में मंत्रालय में केंद्रीय जल आयोग व केंद्रीय भूजल विभाग के अधिकारियों की समीक्षा बैठक में यह निर्देश दिया गया कि जिन राज्यों में जल ग्राम के चयन का काम धीमी रफ्तार से चल रहा है, उनसे इस बारे में चर्चा करके तेज करने की पहल की जाए।

अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय की उच्च स्तरीय बैठक में इस अभियान को अगले दो वर्ष तक जारी रखने का निर्णय किया गया। जल संसाधन, नदी विकास व गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने जून 2015 में इसकी शुरुआत तीन क्षेत्रों राजस्थान के जयपुर, उत्तर प्रदेश के झांसी और हिमाचल प्रदेश के शिमला से की थी। समीक्षा बैठक में इस कार्यक्रम के विभिन्न आयामों पर विचार किया गया। इसमें यह बात सामने आई कि हर राज्य के प्रत्येक जिले में दो जल ग्रामों की पहचान का कार्य किया जा रहा है और इनमें से कुछ राज्यों में यह कार्य पूरा कर लिया गया है। भूजल की गुणवत्ता में गिरावट और उत्पादक जल स्रोतों में कमी के दोहरे खतरों से निपटने और विभिन्न पक्षों के बीच व्यापक विचार-विमर्श के माध्यम से बेहतर भूजल प्रशासन और प्रबंधन हेतु रणनीति तैयार करने के लिए, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा के कायाकल्प मंत्रालय ने जल क्रांति अभियान शुरू किया है।

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में सचिव डॉ अमरजीत सिंह ने बताया कि पानी की कमी वाला देश इजराइल किस प्रकार 98 फीसद वर्षा के पानी का उपयोग करता है। वैज्ञानिकों व प्रबंधकों को अपने देश में भी यह संभव बनाने के लिए प्रौद्योगिकी में सुधार करने की जरूरत है। सरकार की ओर से उठाए जा रहे कदमों में मानव के स्वास्थ्य पर मानवजनित प्रदूषण से पड़ने वाले प्रभाव को बेहतर ढंग से समझने के लिए अध्ययन करने की पहल शामिल है।

इसके साथ ही भूजल प्रदूषण को दूर करने के लिए पायलट अध्ययन और अधिक तेजी से पूरा करने की पहल की गई है। जन जागरूकता व क्षमता निर्माण अभियान के जरिए भूजल प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करना और पूरे देश में बड़े पैमाने पर मानचित्रण का कार्य करने के लिए विद्युत प्रतिरोधकता टोमोग्राफी और हैली जनित सर्वेक्षण जैसे उन्नत भूभौतिकीय अध्ययन करने की पहल शामिल है। अधिकारियों ने कहा कि इस कार्य में सुदूर संवेदन तकनीक भूजल री-चार्ज और ड्राफ्ट की कंप्युटिंग की वर्तमान पद्धति की पूरक हो सकती है। कृत्रिम पुनर्भरण तकनीक की योजना के तहत स्रोत जल के लिए समुद्र और वैकल्पिक जल स्रोतों का उपयोग करना शामिल है।

मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, सतह और भूमिगत जल के संयुक्त उपयोग के लिए दो प्रायोगिक परियोजनाओं का क्रियान्वयन दो बड़े नहर कमांड क्षेत्रों में करने की पहल की गई है, जिसके लिए अध्ययन पहले ही पूरा किया जा चुका है। सरकार का मानना है कि देश के पूर्वी राज्यों में बड़े पैमाने पर भूजल विकास संभव है और भारत में खाद्य सुरक्षा हासिल करने के लिए इन क्षेत्रों में एक दूसरी ‘हरित क्रांति’ की आवश्यकता है। साथ ही सफल कृषि पारिस्थितिकी के श्रेष्ठ कार्यों को दोहराए जाने की जरूरत है, जो पूर्वोत्तर में सफल रहे हैं। देश के भूजल संसाधनों की भरपाई करने के लिए उपयुक्त डिजाइन वाली जल संरक्षण संरचनाओं के कार्यान्वयन के जरिए पहाड़ी क्षेत्रों में झरनों के संरक्षण और मैदानी इलाकों में बोरवेल के अंधाधुंध निर्माण कार्यों को सीमित करके भूजल के संरक्षण के कार्यों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक के माध्यम से भूजल की क्षमता में सुधार करना शामिल है।

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