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ऊना हिंसा: पीड़ित दलितों ने राष्ट्रपति से मांगी इच्छामृत्यु, लगाया आरोप-गुजरात सरकार ने नहीं पूरा किया वादा

परिवार की तरफ से लिखी चिट्ठी में वशराम सर्वया ने कहा कि तत्कालीन सीएम आनंदीबेन पटेल ने उनके परिवार और रिश्तेदारों पर हुए हमले के बाद जो वादा किया था, उसे गुजरात सरकार पूरा करने में नाकाम रही।

Author Updated: November 28, 2018 11:17 AM
una dalit violenceउना के पीड़ित दलितों ने राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की मांग की है।

2016 में गुजरात के ऊना में हिंसा के शिकार हुए दलित पीड़ितों का आरोप है कि गुजरात सरकार ने उनसे किया वादा पूरा नहीं किया। मंगलवार को इन पीड़ितों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा और इच्छामृत्यु की इजाजत मांगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनमें से एक 7 दिसंबर से दिल्ली में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठेगा। परिवार की तरफ से लिखी चिट्ठी में वशराम सर्वया ने कहा कि तत्कालीन सीएम आनंदीबेन पटेल ने उनके परिवार और रिश्तेदारों पर हुए हमले के बाद जो वादा किया था, उसे गुजरात सरकार पूरा करने में नाकाम रही। वशराम ने चिट्ठी में लिखा है, ‘उन्होंने (आनंदीबेन पटेल) आश्वासन दिया था कि राज्य सरकार हर पीड़ित को 5 एकड़ जमीन देगी। पीड़ितों को उनकी योग्यता के मुताबिक सरकारी नौकरियां मिलेंगी और मोटा समधियाला को विकसित गांव बनाया जाएगा। घटना के गुजरे दो साल 4 महीने हो चुके हैं लेकिन सरकार ने कोई वादा पूरा नहीं किया और न ही इस दिशा में कोई प्रयास किया।’

वशराम, उनके छोटे भाई रमेश और उनके पिता बालू और मां कुंवर उन 8 दलितों में शामिल थे, जिन्हें कथित गोरक्षकों ने निशाना बनाया था। यह घटना गिर सोमनाथ जिले के उना तालुका स्थित मोटा समधियाला गांव में 11 जुलाई 2016 को हुई थी। हमलावरों का आरोप था कि दलित गोकशी में शामिल थे, लेकिन बाद में पुलिस जांच में सामने आया कि वे तो बस पशुओं के शव से चमड़ा उतार रहे थे। इस हमले का वीडियो वायरल हो गया था, जिसके बाद दलितों ने राज्यव्यापी प्रदर्शन किया। कुछ लोगों ने आत्महत्या का भी प्रयास किया था और एक शख्स की मौत भी हो गई थी।

वशराम का कहना है कि हमले की वजह से उन्हें चमड़े का पुश्तैनी धंधा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसकी वजह से उनके पास रोजी-रोटी कमाने का कोई साधन नहीं बचा। उन्होंने आशंका जताई कि भविष्य में वे भुखमरी का भी शिकार हो सकते हैं। वशराम के मुताबिक, उन्होंने गुजरात सरकार से इस बारे में लिखित और मौखिक तौर पर कई बार शिकायत की, लेकिन उनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। वशराम ने अपनी चिट्ठी में लिखा कि वह और बाकी पीड़ित इस बात से आहत हैं कि सरकार ने वारदात के विरोध में हुए हिंसक प्रदर्शनों के मामले में दलितों पर दर्ज किए गए 74 केस वापस नहीं लिए। वशराम का कहना है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ फर्जी केस दर्ज किए। वशराम ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने उन्हें समुचित सुरक्षा मुहैया नहीं कराई। उन्होंने कहा कि वह और उनका परिवार अपना जीवन समाप्त करना चाहता है।

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