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क्या शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे पिता की सियासी विरासत को खो देने से डरते थे!

मातोश्री के वफ़ादार नेताओं को ऐसा लगता था कि राणे इतने ताकतवर होते जा रहे थे कि पार्टी के ऊपर पारिवारिक नियंत्रण के लिए ख़तरा बनते जा रहे थे, और इसलिए उन लोगों ने उनके पंख काटने की कोशिश की।”

शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे के बेटे और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे क्या पिता की राजनीतिक विरासत को खो देने की आशंका से पीड़ित रहते थे, या उन्हें यह भय था कि कहीं शिवसेना पर ठाकरे परिवार के बाहर के नेता का दबदबा कायम हो सकता है। क्या वह एक राजनीतिक दल के रूप में शिवसेना के प्रति रक्षात्मक सोच रखते थे। उनके राजनीतिक जीवन के कई पहलुओं और शिवसेना में उनके साथ रहे कई नेताओं के साथ उनके रिश्तों पर रोज-रोज नई-नई कहानियां निकल आ रही हैं।

हाल ही में शिवसेना से बगावत कर महाराष्ट्र के सीएम बने एकनाथ शिंदे ने यह आरोप लगाया था कि उद्धव ठाकरे अपने ही दल के लोगों से दूरी बनाकर रखते थे। खुद शिंदे को भी मिलने के लिए समय नहीं देते थे। लेखक धवल कुलकर्णी ने अपनी किताब ‘ठाकरे भाऊ’ में उद्धव ठाकरे के ऐसी ही कई बातों को उजागर किया है।

धवल कुलकर्णी किताब में एक जगह लिखते हैं कि “2004 आते-आते उद्धव के पिता स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय भूमिका से दूर होने लगे और राज ठाकरे को किनारे किया जाने लगा, तब उद्धव ने पूरी तरह कमान संभाल रखी थी। धीरे-धीरे इस तरह की बातें सुनाई देने लगीं कि उद्धव पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की पहुंच से बाहर रहते थे। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और पत्रकारों का तो यह भी कहना था कि यहां तक कि प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे जैसे नेताओं के लिए भी शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष तक पहुंच पाना मुश्किल हो जाता था।”

वे बताते हैं कि “उद्धव ठाकरे और नारायण राणे के बीच के रिश्ते पहले से भी अच्छे नहीं थे, लेकिन अब और ख़राब हो गए थे। अंदरूनी सूत्रों का यह कहना था कि राणे को हल्के-फुल्के तरीक़े से यह जता दिया जाता था कि उनका महत्त्व नहीं रह गया था। जैसे, पार्टी अध्यक्ष या उनके बेटे से मिलने के पहले उनको इंतज़ार करने के लिए कहा जाता था या उनका फ़ोन नहीं उठाया जाता था।”

अब जब महाराष्ट्र में शिवसेना के बागी गुट और भाजपा ने मिलकर सरकार बना ली तो यह आशंका जताई जाने लगी है कि कहीं शिंदे गुट बाल ठाकरे की विरासत पर कब्जा न कर ले और उद्धव ठाकरे अलग-थलग न पड़ जाएं।

धवल कुलकर्णी किताब में लिखते हैं, “वरिष्ठ पत्रकार वागीश सारस्वत उस समय संवाददाता थे। उनका कहना है कि शिवसेना के कार्यकर्ताओं को अलिखित निर्देश था कि वे किसी कार्यक्रम में नारायण राणे या राज ठाकरे को न बुलाएं। शिवसेना की संरचना इतनी एकायामी थी कि पार्टी प्रमुख पार्टी को चलाने के लिए क्षेत्रीय और उप क्षेत्रीय क्षत्रपों के ऊपर निर्भर रहते थे। मातोश्री के वफ़ादार नेताओं को ऐसा लगता था कि राणे इतने ताकतवर होते जा रहे थे कि पार्टी के ऊपर पारिवारिक नियंत्रण के लिए ख़तरा बनते जा रहे थे, और इसलिए उन लोगों ने उनके पंख काटने की कोशिश की।”

उनके मुताबिक “कांग्रेस के नेता विजय वडेट्टीवार, जो उस समय राणे के ख़ास थे और उन्होंने राणे के साथ शिवसेना छोड़ी थी, उनका कहना था कि उद्धव के विश्वस्तों को इस बात का डर था कि नारायण राणे और राज ठाकरे कहीं सेना के ऊपर क़ब्ज़ा न कर लें। अपनी आत्मकथा में राणे ने इस बात को स्वीकार किया है कि पार्टी के ऊपर सरकार गिराने के अभियान के पहले से ही नियंत्रण ख़त्म हो गया था और उनको महत्त्वपूर्ण बैठकों में लाया नहीं जाता था। उनका आरोप था कि उद्धव, मनोहर और सुभाष देसाई की तिकड़ी उनको नीचा दिखाना चाहती थी।”

किताब में बताया गया है कि “उद्धव के निजी सचिव मिलिंद नारवेकर लोगों को मिलने का समय देने न देने को लेकर मातोश्री में सत्ता केंद्र के रूप में उभर कर आए थे। उद्धव जल्दी ऐसे लोगों के साथ नहीं मिलते-जुलते थे, जो उनके आसपास के नहीं होते थे, इसलिए नारवेकर उनके लिए दीवार की तरह से हो गए। लम्बे और दुबले-पतले नारवेकर लिबर्टी गार्डेंस, मलाड में गटप्रमुख थे, जो पार्टी संगठन में सबसे नीचे का पद होता था। उनके बारे में कहा जाता था कि वे अपने बॉस से 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों में शाखा प्रमुख बनाए जाने की मांग को लेकर मिलने गए थे। हालांकि उनको उद्धव ने अपना निजी सहायक बना लिया।”

चूंकि कई बार उनके बॉस सिर्फ़ अपने साथ यानी अकेले रहना ही पसंद करते थे, इसलिए पार्टी में नारवेकर का दबदबा बढ़ता गया। भास्कर जाधव (2004), नारायण राणे (2005) और मोहन रावले (2014) जैसे नेताओं का तो यह भी कहना था कि नारवेकर के कारण ही उन लोगों ने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया।

नारवेकर आज भी सार्वजनिक रूप से उद्धव के पीछे-पीछे रहते हैं लेकिन सेना के अंदरूनी सूत्रों का यह कहना है कि अब उनकी शक्ति वैसी नहीं रह गई है, जैसी कि एक दशक पहले तक थी। इसका कारण यह है कि मातोश्री में सत्ता के कई केंद्र और उभर आए हैं। कहा जाता है कि नारवेकर राज्यसभा या राज्य विधानपरिषद की सदस्यता की होड़ में थे लेकिन जनवरी 2018 में उनको पार्टी का सचिव बना दिया गया।

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