राजस्थान में भाजपा सरकार बने दो साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक बड़ी संख्या में राजनीतिक नियुक्तियां नहीं होने से पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में नाराजगी बढ़ने लगी है। राज्य की 52 से ज्यादा आयोगों और बोर्डों में अध्यक्ष पद खाली पड़े हैं और भाजपा के कई वरिष्ठ नेता, चुनाव हार चुके उम्मीदवार और लंबे समय से संगठन में काम कर रहे कार्यकर्ता अब राजनीतिक समायोजन का इंतजार कर रहे हैं।
भाजपा के कई ऐसे नेता, जिन्होंने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी के लिए सक्रिय भूमिका निभाई, उम्मीद लगाए बैठे हैं कि उन्हें किसी बोर्ड, आयोग या स्थानीय निकाय में जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन लंबे इंतजार के कारण कार्यकर्ताओं में बेचैनी बढ़ रही है।
लोकसभा चुनाव 2024 से पहले भाजपा सरकार ने सात नेताओं को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया था। इसके बाद नियुक्तियों की प्रक्रिया लगभग रुक गई। आखिरी प्रमुख नियुक्ति अरुण चतुर्वेदी की हुई थी, जिन्हें वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। फिलहाल राज्य में लोकायुक्त का पद भी खाली है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि पार्टी पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में होने वाले चुनावों के खत्म होने का इंतजार कर रही है। उन्होंने कहा कि उपयुक्त नामों पर चर्चा चल रही है और सरकार बनने के बाद सूची को अंतिम रूप दिया जाएगा।
राजस्थान में कुल 309 शहरी निकाय हैं। इनमें 10 नगर निगम हैं, जबकि बाकी नगर परिषद और नगर पालिकाएं हैं। पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान करीब 2,000 नामित पार्षद और सदस्य नियुक्त किए गए थे। लेकिन 10 जनवरी 2024 को भाजपा सरकार ने कांग्रेस शासन में किए गए इन सभी मनोनयनों को रद्द कर दिया था।
इसके बाद उम्मीद थी कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को इन निकायों में मौका देगी, लेकिन अब तक चुनाव ही नहीं हो पाए हैं। फिलहाल सरकार का ध्यान आयोगों और बोर्डों में नियुक्तियों पर है।
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पश्चिम बंगाल चुनाव में काम करने वाले नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है। उन्होंने कहा कि कई नेता वहां चुनाव प्रबंधन के लिए भेजे गए थे। इनमें राजेंद्र राठौड़ और अरुण चतुर्वेदी जैसे नाम शामिल हैं। चूंकि अरुण चतुर्वेदी को पहले ही वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया जा चुका है, इसलिए अन्य नेताओं को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।
राजनीतिक नियुक्तियों में स्थानीय विधायक, सांसद और जिला अध्यक्षों की भूमिका भी अहम मानी जाती है। अक्टूबर 2024 में 78 शहरी निकायों में 550 नामित सदस्यों की नियुक्ति के आदेश जारी किए गए थे, लेकिन कुछ ही घंटों में इन्हें रोक दिया गया। माना गया कि कई विधायकों और नेताओं की पसंद के नाम सूची में शामिल नहीं थे, जिसके कारण विवाद पैदा हो गया।
भाजपा के एक अन्य नेता ने कहा कि कार्यकर्ता सही समय पर नियुक्तियां नहीं मिलने से निराश हैं। उनका कहना है कि पंचायत चुनावों से पहले संगठन को मजबूत करने के लिए राजनीतिक नियुक्तियां जरूरी हैं। कई कार्यकर्ताओं ने पांच साल विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन किए और पुलिस की लाठियां तक खाईं, लेकिन उन्हें अब तक कोई जिम्मेदारी नहीं मिली।
इन नियुक्तियों का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि कई आयोगों और बोर्डों के अध्यक्षों को राज्यमंत्री का दर्जा, वेतन, सरकारी दफ्तर, स्टाफ और वाहन जैसी सुविधाएं मिलती हैं। हालांकि अब तक जिन नेताओं को नियुक्तियां मिली हैं, उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा नहीं दिया गया है, जिससे उनमें भी नाराजगी बताई जा रही है।
कांग्रेस सरकार में भी अशोक गहलोत ने चुनावों से ठीक पहले राजनीतिक नियुक्तियां की थीं। उस समय गहलोत और सचिन पायलट के बीच खींचतान के कारण नियुक्तियों में देरी हुई थी। इस बार भाजपा में भी वसुंधरा राजे समर्थकों समेत कई गुटों को संतुलित करना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
यह भी पढ़ें: Bihar Cabinet Expansion: बिहार में कैबिनेट विस्तार आज, यह रही संभावित मंत्रियों की लिस्ट, निशांत पर सस्पेंस खत्म
पटना के गांधी मैदान मेंआज बिहार कैबिनेट का विस्तार होगा। इस शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन समेत तमाम नेता इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल भाजपा और जदयू से 16-16 मंत्री शपथ लेंगे। इसी बीच जानकारी आ रही है कि NDA सरकार में शामिल होने वाले मंत्रियों को शपथ ग्रहण के लिए सूचना मिलनी शुरू हो गई है। बीजेपी, जेडीयू, एलजेपी(आर) और HAM के कोटे से कुल 31 विधायकों को आज मंत्री पद की शपथ लेने की सूचना मिल चुकी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
