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पूर्वोत्तर में बीजेपी ने कैसे लहराया जीत का परचम, ये हैं 7 बड़े कारण

त्रिपुरा में बीजेपी ने IPFT के साथ गठबंधन कर जीत के समीकरण पर मुहर लगा दिया। इस गठबंधन की वजह से बीजेपी को त्रिपुरा में आदिवासियों तक पहुंचने में कामयाबी मिली। आदिवासियों की जनसंख्या त्रिपुरा में 31 फीसदी है। बीजेपी ने यहां की जनता को रोजगार का सपना दिखाया दिया। जबकि यहां पर वामपंथी सरकार नौकरी के मुद्दे को एड्रेस करने में फेल रही थी।

त्रिपुरा की राजधानी अगरतला में बीजेपी की जीत का जश्न मनाते पार्टी कार्यकर्ता (फोटो-रायटर्स)

पूर्वोत्तर में बीजेपी ने शानदार कामयाबी हासिल की है। नॉर्थ ईस्ट के तीन राज्यों के नतीजे शनिवार को आए। इनमें से त्रिपुरा में भाजपा-इंडीजनस पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफटी) गठबंधन ने 25 साल से लगातार चले आ रहे वाम शासन को उखाड़ फेंका है। नागालैंड में भी बीजेपी को अच्छी खासी कामयाबी मिली है। मेघालय में बीजेपी खाता जरूर खोला है लेकिन उसके विधायक ज्यादा नहीं है। हालांकि बीजेपी के लिए सबसे दमदार है त्रिपुरा की जीत। बीजेपी ने इस राज्य में अपने कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंदी सीपीएम को जोरदार पटखनी दी है। चुनाव नतीजे के बाद अब पूर्वोत्तर के राज्यों में के उभार के कारणों पर चर्चा जरूरी है।

1. त्रिपुरा में सीपीएम की 25 साल पुरानी सरकार के खिलाफ एंटी एनकंबेंसी फैक्टर चरम पर था। लेफ्ट सीएम माणिक सरकार को भले ही गरीबों का सीएम होने का तमगा हासिल था, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक निचले स्तर पर वह करप्शन रोकने में नाकाम रहे। इसलिए सरकार के खिलाफ लोगों में नाराजगी थी। लोगों का ये गुस्सा बीजेपी के पक्ष में काम कर गया।

2. त्रिपुरा में बीजेपी ने IPFT के साथ गठबंधन कर जीत के समीकरण पर मुहर लगा दिया। इस गठबंधन की वजह से बीजेपी को त्रिपुरा में आदिवासियों तक पहुंचने में कामयाबी मिली। आदिवासियों की जनसंख्या त्रिपुरा में 31 फीसदी है। बीजेपी ने यहां की जनता को रोजगार का सपना दिखाया दिया। जबकि यहां पर वामपंथी सरकार नौकरी के मुद्दे को एड्रेस करने में फेल रही थी। बीजेपी ने आदिवासियों के लिए , बांस आधारित विशेष आर्थिक जोन, टेक्सटाइल्स, फूड प्रोसेसिंग जैसे यूनिट लगाने का वादा किया। इसके अलावा बीजेपी ने इन राज्यों के लिए ऑटोनामस स्टेट काउंसिल गठन करने का वादा किया। इस काउंसिल को केन्द्र से मिले फंड तक पहुंच होगी।

3- कांग्रेस पूर्वोत्तर के राज्यों में लगातार पिछड़ती रही, कमजोर होती गई। बीजेपी ने इसका फायदा उठाया। इन राज्यों में कांग्रेस के चुनाव जीतने में सक्षम कई नेता बीजेपी में आ गये, कांग्रेस के पास यहां कोई कद्दावर चेहरा नहीं बचा। कांग्रेस मेघालय में 2003 से शासन कर रही है, पार्टी ने इसका इस्तेमाल अपना जनाधार मजबूत करने में नहीं किया। कांग्रेस मतदाताओं के मिजाज को गंभीरता पूर्वक नहीं ले सकी। नागालैंड में कांग्रेस में लगातार टूट से पार्टी कमजोर हुई।

4-बीजेपी की सक्रियता, पूर्वोत्तर में पीएम मोदी की निजी रूचि से कांग्रेस का वोट बैंक खिसका, इस वोट बैंक बीजेपी अपने पक्ष में करने में सफल रही।

5- पूर्वोत्तर में पार्टी को मजबूत करने के लिए बीजेपी ने पूरी ताकत झोंक दी। सुनील देवधर त्रिपुरा में प्रभारी बनाकर भेजे गये तो उन्होंने जीरो से शुरुआत की, वह अपने मिशन में लगातार जुटे रहे। बीजेपी ने आरएसएस पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले राम माधव को नॉर्थ ईस्ट प्रभारी बनाया। इसके अलावा पूर्वोत्तर में कांग्रेस की नब्ज से वाकिफ हेमंत विश्व शर्मा ने पूर्वोत्तर में बीजेपी को स्थापित करने में पूरजोर भूमिका नहीं। बीजेपी के केन्द्र मंत्री किरण रिजिजू भी उत्तर-पूर्व में लगातार सक्रिय रहे।

6- पूर्वोत्तर में बीजेपी ने जरूरत के मुताबिक हिन्दुत्व का कार्ड भी चला। त्रिपुरा में पार्टी ने कट्टर छवि रखने वाले योगी आदित्यनाथ को प्रचार करने भेजा। त्रिपुरा में नाथ संप्रदाय के लोगों की आबादी बड़ी संख्या में है। बीजेपी के लिए योगी का जादू काम आया। आदित्यनाथ ने जिन 9 सीटों पर प्रचार किया उसमें से ज्यादातर सीटें बीजेपी जीत गईं।

7- पूर्वोत्तर की जनता के भोजन की आदतों में बीफ शुमार रहा है। लेकिन बीजेपी ने इस विधानसभा चुनाव में कभी भी इसे मुद्दा नहीं बनने दिया। बीजेपी पूर्वोत्तर के लोगों को यह बताने में कामयाब रही कि वह उनकी आदतों और परंपराओं का सम्मान करती है। इससे बीजेपी को मिलने वाले वोटों में बिखराव नहीं हुआ।

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