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लैंगिक असमानता के खिलाफ सफर

लैंगिक असमानता को समझने, समझाने और एक अलख जगाने का जज्बा। दो पहियों पर देश को समझने निकला जुनूनी।

Author नई दिल्ली | September 8, 2017 1:51 AM
राकेश ने कहा कि जब हरियाणा के गांवों के पुरुष सो रहे होते हैं महिलाएं सिर पर पानी की मटकी भर के ला चुकी होती हैं, खेतों से लौट चुकी होती हैं।

सुमन केशव सिंह
लैंगिक असमानता को समझने, समझाने और एक अलख जगाने का जज्बा। दो पहियों पर देश को समझने निकला जुनूनी। फिलहाल कोई ठौर नहीं। लेकिन वो जहां जाता है लोगों को अपना बना लेता है। बिहार के छपरा में जन्मे राकेश कुमार सिंह अभी राइडर राकेश के नाम से जाने जाते हैं। सीएसडीएस की नौकरी छोड़ कर भारतीय परिवेश में लैंगिक असमानता को समझने के लिए साइकिल से भारत भ्रमण पर निकले हैं। राइडर राकेश कहते हैं, ‘यह हमारी महान परंपरा ही है, जिसने आदि काल से हमें बेटों का महत्त्व समझाया है। जिसमें यह बताया गया कि बेटे वंश बढ़ाते हैं, जिसने बेटी के जन्म पर उसे लक्ष्मी कहा लेकिन उसी ने बेटी को दान की वस्तु भी बता दिया। ये हमारी ही परंपरा ही है जिसमें साल में दो बार नौ दिन शक्ति पूजा होती है लेकिन उसी शक्ति के स्वरूप को नौ दिन भी खुली हवा में टहलने से रोका जाता है। मैं इसी बात को समझने की कोशिश कर रहा हूं कि वह कौन सी लैंगिक मजबूरी है जो लड़कियों, समलैंगिकों और तीसरी श्रेणी वालों को जन्म से ही एक अलग नजरिए से देखने पर मजबूर कर देती है’।

राकेश करीब 41 महीनों से ऐसे ही सवालों के जवाब की तलाश में 18700 किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने लगभग पांच लाख लोगों से बातचीत की। वे 2000 सभाएं कर चुके हैं। उन्होंने कहा कि केरल, तमिलाडु, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, ओडीशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों लैंगिक भेदभाव और असमानताएं कमोवेश एक सी हैं। हां, कम शिक्षित स्तर वाले बिहार की स्थिति इन बाकी सूबों से कहीं बेहतर हैं। हरियाणा की महिलाएं पढ़ी-लिखी होने के बावजूद साड़ी और दुपट्टे के परदे से पूरा मुंह ढंकने को मजबूर हैं।

राकेश ने कहा कि जब हरियाणा के गांवों के पुरुष सो रहे होते हैं महिलाएं सिर पर पानी की मटकी भर के ला चुकी होती हैं, खेतों से लौट चुकी होती हैं। इसके उलट पुरुष उठ कर मुंह-हाथ धोने में ही कई मटके पानी बर्बाद कर देने को अपनी जिम्मेदारी समझता है। राकेश कहते हैं कि आजादी एक मन: स्थिति है जो एक प्रक्रिया के तहत निर्मित होती है। यह 26 जनवरी, 15 अगस्त से कहीं आगे का मसला है। संविधान के अनुसार हमें चुनने की आजादी है, पढ़ने का अधिकार है और तरक्की के तमाम पैमाने हम नाप-नाप कर बता रहे हैं। सरकार वजीफों में क्यों कटौती कर रही है। क्या इसलिए कि लोग न पढ़ें। इस तरह तो हम कभी भी आजाद नहीं होगे।

‘कोई लड़की ये कहे कि मैं आज तुम्हारे साथ नहीं जा पाऊंगी तो लड़के को उसकी ना से दिक्कत क्यों है? क्यों हम जिस सेक्स में पैदा होते हैं उससे हमारा व्यवहार तय होता है और सेक्स जेंडर कैसे बन जाता है? यही समझना मेरी यात्रा का मकसद है’।
-राइडर राकेश

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